﻿WEBVTT LA078

00:00:42.088 --> 00:00:47.676
(व्यवहार की रुचिवाले जीव)
समाज में बहुत हैं, बहुत से बहुत हैं;

00:00:47.700 --> 00:00:55.969
और निश्चय की रुचिवाले जीव हमेशा,
तीनों काल कम रहते हैं।

00:00:55.993 --> 00:01:00.799
दो प्रकार के जीव हैं - व्यवहार की
रुचिवाले और निश्चय की रुचिवाले।

00:01:00.823 --> 00:01:08.485
निश्चय की रुचिवाले जीव बहुत कम रहते हैं।
क्या करें?

00:01:08.509 --> 00:01:27.936
निश्चय की रुचिवाला (आत्मा को) प्राप्त करता है,
व्यवहार की रुचिवाला प्राप्त नहीं करता है।

00:01:27.960 --> 00:01:35.319
मुमुक्षु: निश्चय की रुचि माने क्या?
पू. लालचंदभाई: निश्चय की रुचि माने
परिणाम मात्र से मेरा आत्मा भिन्न है।

00:01:35.343 --> 00:01:51.755
इसलिए मैं परिणाम का करनेवाला नहीं हूँ
- मैं कर्ता नहीं हूँ। ऐसा निश्चय की
रुचिवाला निश्चय में आ जाता है।

00:01:51.779 --> 00:02:04.629
दूसरा निश्चय का एक पाठ और है।
बाद में वो आगे बढ़ता है,
निश्चय की रुचिवाला।

00:02:04.653 --> 00:02:14.073
ये जो परिणाम से मेरा आत्मा भिन्न है
तो परिणाम को जानने से
भगवान आत्मा जानने में नहीं आता है,

00:02:14.097 --> 00:02:21.899
तो परिणाम को जानने की
जो रुचि है वो छोड़ देता है।

00:02:21.923 --> 00:02:30.976
व्यवहार की रुचि छूटी, जानने की रुचि छूटी
तो भगवान आत्मा उसको जणित
(जानने में आ) जाता है।

00:02:31.000 --> 00:02:36.732
निश्चय की रुचिवाला यहाँ (अंदर) आता है,
परिणाम मात्र से मेरा आत्मा भिन्न है।

00:02:36.756 --> 00:02:43.460
ऐसे परिणाम करने से,
कर्ताबुद्धि रखने से
आत्मा दृष्टि में नहीं आता है;

00:02:43.484 --> 00:02:51.760
और परिणाम को जानने में रुक जाऊँ
तो भी दृष्टि का विषय दृष्टि में,
ज्ञान में, अनुभव में नहीं आता है।

00:02:51.784 --> 00:02:59.159
वह बात सुनकर
वो निश्चय की रुचिवाला उन दोनों
भावों का त्याग कर देता है दृष्टि में से।

00:02:59.183 --> 00:03:04.351
परिणाम का त्याग नहीं होता है,
परिणाम के कर्तृत्व का त्याग होता हैl

00:03:04.375 --> 00:03:11.495
परिणाम का त्याग नहीं होता है,
परिणाम ज्ञेय बनता था,
वो उसको ज्ञेय बनाना छोड़ दिया

00:03:11.519 --> 00:03:17.678
और ज्ञायक को ज्ञेय बनाया तो उसका
नाम निश्चय की रुचिवाला कहा जाता है।

00:03:17.702 --> 00:03:24.773
और निश्चय की रुचि जिसको है
उसको आत्म-अनुभव का अवकाश है, पूरा।

00:03:24.797 --> 00:03:32.553
अवकाश समझे ना? chance (अवसर) है।
और व्यवहार की रुचिवाले जीव को
chance नहीं है।

00:03:32.577 --> 00:03:37.232
मैं परिणाम से सहित हूँ
इसलिए मैं परिणाम का करनेवाला हूँ;

00:03:37.256 --> 00:03:43.568
और दूसरा परिणाम को जाननेवाला हूँ।
समझे?

00:03:43.592 --> 00:03:52.279
वो सब व्यवहार की रुचिवाले का पक्ष है,
वो परिणाम मात्र से भिन्न
ज्ञानानंद परमात्मा पूर्णानंद आत्मा है

00:03:52.303 --> 00:03:55.749
(वह) उसको दृष्टि में, ज्ञान में,
अनुभव में नहीं आता है।

00:03:55.773 --> 00:04:04.085
उसको दृष्टि में परिणाम दिखता है,
परिणाम को ही आत्मा मानता है अनंतकाल से।

00:04:04.109 --> 00:04:10.838
मैं ज्ञानानंद स्वभावी हूँ
यह दृष्टि में त्याग कर,
धर्म का त्याग कर,

00:04:10.862 --> 00:04:17.047
धर्मी को छोड़कर धर्म का त्याग कर
परिणाम मात्र जो रागादि उत्पन्न होता है,
पुण्यभाव,

00:04:17.071 --> 00:04:21.212
वो मेरा है - ऐसा मानता है
वो अज्ञानी मिथ्यादृष्टि है।

00:04:21.236 --> 00:04:29.128
वो आस्रव में अजीव तत्त्व का,
अजीव में जीव की मान्यता कर लेता है।

00:04:29.152 --> 00:04:34.351
आत्मा की रुचि होती है तो पुण्य और
पुण्य के फल की रुचि छूट जाती है।

00:04:34.375 --> 00:04:39.228
पुण्य नहीं छूटता है,
पुण्य का फल नहीं छूटता है,
उसकी रुचि छूट जाती है।

00:04:39.252 --> 00:04:43.416
महिमा छूटती है,
पुण्य की महिमा छूट जाती है,

00:04:43.440 --> 00:04:47.799
पुण्य का फल जो है
उसकी माहिमा नहीं आती है;
महिमा आत्मा की आती है।

00:04:47.823 --> 00:04:53.704
जब आत्मा की महिमा आई
तो समझो कि निश्चय की रुचिवाले हो।

00:04:53.728 --> 00:05:02.934
भले! बाहर में चाहे तो कितना भी वैभव हो,
बड़ा बंगला हो आठ मंजिल का,
परंतु रुचि नहीं हो, वो मेरा नहीं है।

00:05:02.958 --> 00:05:09.558
मेरा तो एक ज्ञानमय आत्मा है,
बस।

00:05:09.582 --> 00:05:16.690
बंगले को वो दान में नहीं देता है।

00:05:16.714 --> 00:05:22.737
बंगले का दान नहीं करता है
मगर बंगला मेरा नहीं है,
ममत्व छूट जाता है, बंगला रह जाता है।

00:05:22.761 --> 00:05:33.373
बंगला बंगले में रह गया और
ज्ञान आत्मा में आ गया। ऐसी
स्थिति गृहस्थ की - ज्ञानी की होती है।

00:05:33.397 --> 00:05:36.035
मुमुक्षु: बंगला नड़े (बाधा डाले)
तो दान में दे ना? नड़ता ही कहाँ है?

00:05:36.059 --> 00:05:40.456
पू. लालचंदभाई: नड़ता कहाँ है?
वो तो पर है, भिन्न है।
मुमुक्षु: दान में नहीं दे सकता।

00:05:40.480 --> 00:05:47.491
उसका हो तो दान में दे न?
पू. लालचंदभाई: हाँ! उसका है ही नहीं।
दान कहाँ से दे देवे?

00:05:47.515 --> 00:05:50.176
उसका स्वामी तो पुद्गल है।
मुमुक्षु: पुद्गल है उसका स्वामी तो।

00:05:50.200 --> 00:05:53.241
पू. लालचंदभाई: पुद्गल कहता है कि
मेरी चीज है और तू दान करता है?

00:05:53.265 --> 00:05:56.917
मुमुक्षु: हाँ! यह तो पाप हो गया।
ये तो मेरी चीज को दान में देता है।

00:05:56.941 --> 00:06:00.354
पू. लालचंदभाई: दान में दे सकता है?
कोई नहीं दे सकता।

00:06:00.378 --> 00:06:04.703
ऐसी अलौकिक चीज गुरुदेव ने बताई है।
आहाहा!

00:06:04.727 --> 00:06:14.352
जिसको निश्चय की रुचि होगी उसको प्राप्त होगा।
व्यवहार की रुचिवाला ...। आहाहा!

00:06:14.376 --> 00:06:22.070
ऐसा देवचंदजी एक हो गए,
श्वेताम्बर में साधु।

00:06:22.094 --> 00:06:31.526
एक (बात) गुरुदेव बहुत कहते थे बारम्बार कि
व्यवहार की रुचिवाले जीवड़ा,
उपदेशक भी ऐसे मिले, क्या करे जीव नवीन?

00:06:31.550 --> 00:06:33.260
क्या करे जीव नवीन?

00:06:33.284 --> 00:06:39.865
व्यवहार की रुचि है और उपदेशक भी
ऐसा ही मिलता है, तो क्या करे नवीन वो?

00:06:39.889 --> 00:06:43.876
नवीन तो उसके पास है नहीं कुछ।
जैसी रुचि थी, ऐसा उपदेशक मिला।

00:06:43.900 --> 00:06:54.360
'हाँ! बराबर है! ऐसे क्रिया करना चाहिए,
ऐसा नहीं (किया) तो निश्चयाभासी हो जाएगा,
शुभभाव करते-करते धर्म होता है'

00:06:54.384 --> 00:07:03.541
- ऐसे-ऐसे हाँ में हाँ मिलाते हैं
- अज्ञानी जीव हाँ में हाँ मिला देता है।

00:07:03.565 --> 00:07:08.521
अभी शुभ-अशुभ भाव से
भिन्न परमानन्द आत्मा है। आहाहा!

00:07:08.545 --> 00:07:18.484
वो मेरी चीज है। उसका लक्ष,
अनुभव करने से धर्म की शुरुआत होती है।

00:07:18.508 --> 00:07:24.206
आत्मा ज्ञानमयी है, रागमयी नहीं है।
<b>‘घी का घड़ा' है </b>(समयसार गाथा ६७)
- घी का घड़ा होता ही नहीं है।

00:07:24.230 --> 00:07:30.514
घड़ा मिट्टी का होता है।
ऐसे आत्मा तीनों काल ज्ञानमयी ही है।

00:07:30.538 --> 00:07:37.911
रागमयी होता ही नहीं है।
यदि घड़ा घीमय होवे तो जीव रागमय हो जावे।

00:07:37.935 --> 00:07:43.995
मिट्टी का घड़ा तीन काल में
घीमय होता नहीं है।

00:07:44.019 --> 00:07:56.989
घी भिन्न है और मिट्टी का घड़ा भिन्न है;
ऐसे ज्ञान भिन्न है, राग भिन्न है।
राग और ज्ञान एक चीज नहीं है।

00:07:57.013 --> 00:08:05.638
ज्ञान में राग नहीं है
और राग में ज्ञान नहीं है;
ऐसे अस्ति-नास्ति अनेकांत है।

00:08:05.662 --> 00:08:11.923
ज्ञान है, ज्ञानमयी आत्मा।
ज्ञान में राग नहीं है
और राग में ज्ञान नहीं है।

00:08:11.947 --> 00:08:18.490
दर्पण में मोर नहीं है
और मोर में दर्पण नहीं है।

00:08:18.514 --> 00:08:27.130
स्फटिक मणि में फूल की लालाश नहीं है
और लालाश में, फूल की लालाश में
स्फटिक मणि नहीं है।

00:08:27.154 --> 00:08:30.103
एक में दूसरे का अभाव है।

00:08:30.127 --> 00:08:40.120
ऐसे स्वच्छ उपयोग में देहादि,
रागादि जणित (जानने में आ) जाता है,
मगर वो उपयोग में आता नहीं है।

00:08:40.144 --> 00:08:45.052
दर्पण में अग्नि आती नहीं है,
अग्नि तो बाहर रहती है।

00:08:45.076 --> 00:08:50.693
अग्नि दर्पण में कहाँ घुस जाती है?

00:08:50.717 --> 00:08:59.152
ऐसे बार-बार आत्मा और
आस्रव का भेदज्ञान करने से,
आस्रव में आत्मबुद्धि छूट जाती है।

00:08:59.176 --> 00:09:10.496
आस्रव सर्वथा नहीं छूटता है,
आस्रव रह जाता है मगर आस्रव में
आत्मबुद्धिरूप मिथ्यात्व-अज्ञान छूट जाता है।

00:09:10.520 --> 00:09:15.363
बाद में आस्रव का वो ज्ञाता हो जाता है,
स्वामी नहीं बनता है।

00:09:15.387 --> 00:09:22.701
थोड़ा अस्थिरता का राग साधक को आता है,
वो व्यवहारनय से जीव का परिणाम कहा जाता है;

00:09:22.725 --> 00:10:14.372
मगर निश्चयनय से पुद्गल का
जिसने मान लिया, उसको नींद में भी
'राग मेरा है’ ऐसा नहीं (आता) है।

00:10:14.396 --> 00:10:42.233
मुमुक्षु: गाथा १३०-१३१।
पू. लालचंदभाई: १३०-१३१।

00:10:42.257 --> 00:11:02.595
<b>टीका:- जैसे पुद्गल स्वयं परिणामस्वभावी
होने पर भी, </b>सोना हो या लोहा हो,
वो दोनों जाति पुद्गल की है।

00:11:02.619 --> 00:11:06.737
जाति सामान्य
- पुद्गल अपेक्षा से एक जाति है।

00:11:06.761 --> 00:11:16.561
विशेष अपेक्षा से सोना और लोहा
- वो विशेष है, भेद है उसका।
अभी सामान्य से दोनों ही पुद्गल हैं।

00:11:16.585 --> 00:11:25.656
ऐसे <b>जैसे पुद्गल स्वयं</b> अपने आप
<b>परिणामस्वभावी होने पर भी, </b>

00:11:25.680 --> 00:11:36.019
पुद्गल को कोई परिणमाता नहीं है,
स्वयं परिणमन उसका स्वभाव है,
स्वभाव से परिणमता है।

00:11:36.043 --> 00:11:44.237
<b>कारण जैसे कार्य होनेसे, सुवर्णमय
भावमेंसे सुवर्णजातिका उल्लंघन न करते हुए</b>

00:11:44.261 --> 00:11:51.829
<b>सुवर्णमय कुण्डल आदि भाव ही होते हैं
किन्तु लौहमय कड़ा इत्यादि भाव नहीं होते;</b>

00:11:51.853 --> 00:12:04.251
ऐसा कहते हैं कि पुद्गल स्वयं,
अपने आप परिणमन स्वभाववाला होने से
स्वर्ण जातिरूप उसका परिणमन हो गया।

00:12:04.275 --> 00:12:17.061
स्वर्ण बन गया (वो)। पुद्गल तो रहा,
पुद्गल मिटकर चेतन नहीं हुआ मगर
पुद्गल की एक अवस्था स्वर्णमयी हो गई।

00:12:17.085 --> 00:12:27.258
वो स्वर्ण है, वो उसकी अवस्था है।
पुद्गल द्रव्य है। पुद्गल जाति द्रव्य है।

00:12:27.282 --> 00:12:32.500
उसका एक परिणाम स्वर्ण जाति का बन गया।

00:12:32.524 --> 00:12:38.821
और वो स्वर्ण जाति का बन गया तो
स्वर्णमय भाव में से स्वर्ण ही निकलता है।

00:12:38.845 --> 00:12:43.818
लोहे का कोई जेवर नहीं बनता है
उसमें से।

00:12:43.842 --> 00:12:51.283
तो उसके दो अर्थ निकल सकते हैं।

00:12:51.307 --> 00:13:01.996
एक तो जो सोना बन गया,
सोने का जो परिणाम हुआ,
तो कारण जैसा कार्य;

00:13:02.020 --> 00:13:08.189
तो पुद्गल जाति -
द्रव्य कारण और उसकी पर्याय कार्य।

00:13:08.213 --> 00:13:15.149
ऐसे प्रमाणज्ञान से लेवें तो
ऐसा ले सकते हैं
मगर उसमें विरोध आता है।

00:13:15.173 --> 00:13:26.621
इसलिए स्वर्ण जो जाति बनी
उसमें स्वर्ण की ही पर्याय उत्पन्न होती है
क्योंकि सामान्य तो एकरूप है - पुद्गल।

00:13:26.645 --> 00:13:29.560
और उसके दो भेद हैं
- एक स्वर्ण और एक लोहा।

00:13:29.584 --> 00:13:36.068
तो ये यदि पुद्गल को कारण मानो तो
उन दोनों में समान पर्याय होनी चाहिए।

00:13:36.092 --> 00:13:43.971
परंतु दो पर्याय तो समान होती नहीं हैं
तो कारण-कार्य स्वर्ण का स्वर्ण में है।

00:13:43.995 --> 00:13:49.874
मुमुक्षु: पर्याय तो पर्याय में ही है।
पू. लालचंदभाई: पर्याय में पर्याय का कारण है;
सामान्य पुद्गल नहीं है।

00:13:49.898 --> 00:13:59.812
तो भी, तो भी स्वर्ण को द्रव्य कह सकते हैं
और स्वर्ण के परिणाम,
उसको पर्याय कह सकते हैं।

00:13:59.836 --> 00:14:06.465
स्वर्ण को द्रव्य कहो और उसका परिणाम
स्वर्णमयी है - ऐसा भी कह सकते हैं।

00:14:06.489 --> 00:14:18.715
बाकी सचमुच तो सामान्य पुद्गल को जुदा लो
तो उस पर्याय का कारण पर्याय है।
नहीं तो लागू नहीं पड़े, लोहे में।

00:14:18.739 --> 00:14:28.262
लोहा और स्वर्ण पुद्गल की जाति होने पर भी
स्वर्ण-पर्याय में से स्वर्ण होता है
और लोहे की पर्याय में से लोहा।

00:14:28.286 --> 00:14:38.407
ऐसे ज्ञानमयी आत्मा, जो ज्ञानी है
उसका ज्ञानमयी परिणाम है और
अज्ञानी के सभी परिणाम अज्ञानमयी हैं।

00:14:38.431 --> 00:14:44.758
तो ज्ञानी और अज्ञानी
वो तो पर्याय विशेष हो गया उसका।

00:14:44.782 --> 00:14:49.415
दोनों में सामान्य तो एक समान है,
विशेष में फ़र्क़ है।

00:14:49.439 --> 00:14:55.067
तो जो कारण आप सामान्य को लो
तो दो सत्ता नहीं हैं।

00:14:55.091 --> 00:15:02.952
इसलिए अज्ञानमय परिणाम में से अज्ञान होता है
और ज्ञानमय परिणाम में से ज्ञानमयी भाव होता है।

00:15:02.976 --> 00:15:10.616
ऐसा पर्याय का कारण पर्याय (है),
कारण जैसा कार्य। तो कारण पर्याय
को लो तो ही कार्य सिद्ध होता है।

00:15:10.640 --> 00:15:15.732
यदि कारण त्रिकाली द्रव्य को लो,
आत्मा को, तो वो सिद्ध नहीं होता है।

00:15:15.756 --> 00:15:21.708
तो एक अज्ञानरूप से परिणमे और
एक ज्ञानरूप से परिणमे ऐसे अलग नहीं आता है;
एक समान दोनों का परिणमन होना चाहिए।

00:15:21.732 --> 00:15:25.211
मुमुक्षु: या तो फिर ज्ञान-ज्ञान ही आना चाहिए,
या फिर अज्ञान-अज्ञान-अज्ञान ही आना चाहिए।

00:15:25.235 --> 00:15:33.264
पू. लालचंदभाई: आना चाहिए!
मुमुक्षु: वो तो होता नहीं है।
पू. लालचंदभाई: वो तो, ऐसा होता नहीं है।

00:15:33.288 --> 00:15:38.316
<b>और लौहमय भावमेंसे,
लौहजातिका उल्लंघन न करते हुए
लौहमय कड़ा इत्यादि भाव ही होते हैं,</b>

00:15:38.340 --> 00:15:47.166
किन्तु सुवर्णमय कुण्डल आदि भाव नहीं होते;
इसीप्रकार जीव स्वयं परिणामस्वभावी होने पर भी,

00:15:47.190 --> 00:15:54.979
<b>कारण जैसे ही कार्य होनेसे,
कारणानुविधायीनि कार्याणी</b>
(समयसार गाथा ६८ संस्कृत आत्मख्याति टीका)।

00:15:55.003 --> 00:16:06.567
जब जड़ सिद्ध करना हो, जड़,
तो जड़ का परिणाम जड़ में होता है;
अभी स्वर्ण और लोहे को छोड़ दो।

00:16:06.591 --> 00:16:10.904
पुद्गल जड़ है कि नहीं?
तो जड़ का परिणाम जड़ रूप।

00:16:10.928 --> 00:16:14.239
सोने की पर्याय भी जड़
और लोहे की पर्याय भी जड़।

00:16:14.263 --> 00:16:18.201
दो कारण कार्य घटते हैं,
त्रिकाली द्रव्य के साथ।

00:16:18.225 --> 00:16:26.947
जब जड़ लेना है;
पुद्गल सामान्य जड़
और उसका परिणाम भी जड़।

00:16:26.971 --> 00:16:31.494
<b>जड़ भावे जड़ परिणमे, चेतन चेतन भाव </b>
(श्रीमद् राजचंद्र राजपद - पद २८)।

00:16:31.518 --> 00:16:35.589
तो वहाँ द्रव्य के साथ पर्याय ले सकते हैं,
जड़ का परिणाम जड़रूप।

00:16:35.613 --> 00:16:39.346
मगर इधर ज्ञानी-अज्ञानी के दो भेद करने हैं;

00:16:39.370 --> 00:16:47.481
इसलिए सामान्य को गौण करके विशेष में
जो सम्यग्ज्ञान हुआ तो सम्यग्ज्ञानी के
सब परिणाम सम्यग्ज्ञानरूप होते हैं;

00:16:47.505 --> 00:16:52.609
अज्ञानी के सब परिणाम अज्ञानरूप
होते हैं। तो कारण जैसा कार्य।

00:16:52.633 --> 00:16:58.501
त्रिकाली द्रव्य के साथ
कारण-कार्य नहीं घटता। समझे?

00:16:58.525 --> 00:17:08.091
<b>इसीप्रकार जीव स्वयं परिणामस्वभावी
होने पर भी, कारण जैसे ही कार्य होनेसे,
अज्ञानीके - जो कि स्वयं अज्ञानमय भाव है</b>,

00:17:08.115 --> 00:17:14.254
जो अज्ञानमय भाव हैं वे कारण हैं
और अज्ञान भाव उसका कार्य है।

00:17:14.278 --> 00:17:16.128
मुमुक्षु: इसका क्या मतलब?
खुलासा (करें) जरा।

00:17:16.152 --> 00:17:20.352
पू. लालचंदभाई: इसका मतलब ये
कि त्रिकाली जो स्वभाव है, कारण नहीं है।

00:17:20.376 --> 00:17:30.346
अज्ञान की पर्याय का कारण,
अज्ञान की पर्याय का कारण ज्ञायक
को बना दो, तो नित्य अज्ञानरूप परिणमता है,

00:17:30.370 --> 00:17:36.281
तो ज्ञानरूप परिणम सकता नहीं;
ऐसा तो होता नहीं है।

00:17:36.305 --> 00:17:44.014
सामान्य को सुरक्षित रखकर
विशेष अपेक्षा से कारण-कार्य लगाओ
तो घट सकता है; नहीं तो नहीं।

00:17:44.038 --> 00:17:49.936
<b>अज्ञानीके - जो कि स्वयं अज्ञानमय भाव है
उसके - अज्ञानमय भावमेंसे,
अज्ञानजातिका उल्लंघन न करते हुए</b>

00:17:49.960 --> 00:17:55.187
<b>अनेक प्रकारके अज्ञानमय भाव ही होते हैं
किन्तु ज्ञानमय भाव नहीं होते,</b>

00:17:55.211 --> 00:18:00.651
<b>तथा ज्ञानीके - जो कि स्वयं ज्ञानमय भाव हैं
उसके - ज्ञानमय भावमेंसे,</b>

00:18:00.675 --> 00:18:06.445
<b>ज्ञानकी जातिका उल्लंघन न करते हुए
समस्त ज्ञानमय भाव ही होते हैं
किन्तु अज्ञानमय भाव नहीं होते।</b>

00:18:06.469 --> 00:18:08.856
<b>भावार्थ:- ‘जैसा कारण होता है
वैसा ही कार्य होता है’</b>

00:18:08.880 --> 00:18:15.095
<b>इस न्यायसे जैसे लोहेमेंसे लौहमय कड़ा
इत्यादि वस्तुएँ होती हैं और सुवर्णमेंसे
सुवर्णमय आभूषण होते हैं,</b>

00:18:15.119 --> 00:18:20.562
<b>इसी प्रकार अज्ञानी स्वयं
अज्ञानमय भाव होनेसे उसके (अज्ञानमय
भावमेंसे) अज्ञानमय भाव ही होते हैं</b>

00:18:20.586 --> 00:18:38.455
<b>और ज्ञानी स्वयं ज्ञानमय भाव होनेसे उसके
(ज्ञानमय भावमेंसे) ज्ञानमय भाव ही होते हैं।</b>

00:18:38.479 --> 00:18:50.271
नहीं तो सामान्य-विशेष एक हो जाता है;
सामान्य-विशेष एक होने पर
वो दो बातें घटती नहीं हैं।

00:18:50.295 --> 00:19:01.603
सामान्य से विशेष जुदा है।
विशेष कारण और विशेष पर्याय कार्य
- तो बैठता है, नहीं तो बैठ नहीं सकता।

00:19:01.627 --> 00:19:10.805
बाकी हाँ!
स्थूल अपेक्षा से स्वर्ण को इधर द्रव्य कहा
और लोहे को भी इधर द्रव्य कहा।

00:19:10.829 --> 00:19:13.217
ऐसा अर्थ घट सकता है।

00:19:13.241 --> 00:19:26.247
जो हमने पर्याय में उतारा ना कारण-कार्य,
तो वहाँ कारण-कार्य; सोना द्रव्य - सोना है
उसको द्रव्य लेना, पर्याय नहीं लेना;

00:19:26.271 --> 00:19:35.363
पर्याय कुंडल आदि की पर्याय लेना;
तो द्रव्य जैसा है वैसी पर्याय होगी
- ऐसा हो सकता है।

00:19:35.387 --> 00:19:46.018
लोहे को, लोहे को द्रव्य बनाओ,
लोहा - तो उसकी पर्याय जो होती है,
तो वो उसकी पर्याय है - ऐसा कह सकते हैं।

00:19:46.042 --> 00:19:54.236
मगर सचमुच तो
पुद्गल द्रव्य स्वयं परिणमन स्वभावी होने
पर भी - यह main (मुख्य) बात है।

00:19:54.260 --> 00:19:59.900
इसलिए सामान्य को अलग रखो तो ही
पर्याय में कारण-कार्य घटित होता है।

00:19:59.924 --> 00:20:09.739
अगर आप मूल पदार्थ को कारण कहो तो
कारण एक और कार्य में दो प्रकार आए।

00:20:09.763 --> 00:20:16.587
कारण तो एक रखा ना ज्ञायकभाव।
दोनों में सामान्य समान है
और दोनों का विशेष फ़र्कवाला है।

00:20:16.611 --> 00:20:20.474
तो अगर सामान्य को कारण कहो आप,
तो कार्य एक प्रकार का आना चाहिए;

00:20:20.498 --> 00:20:29.939
या तो सब ज्ञानी हों या तो सब अज्ञानी हों।
समझ में आया कुछ?

00:20:29.963 --> 00:20:34.701
मुमुक्षु: मुझे ये लगा कि वो जो पर्याय है,
पर्याय सामान्य से भिन्न ही है।

00:20:34.725 --> 00:20:39.698
पर्याय को अगर सामान्य
के साथ लगाओगे तो वो सही ...

00:20:39.722 --> 00:20:44.160
पू. लालचंदभाई: तो वो घट नहीं सकता है
क्योंकि सामान्य तो शुद्ध है।

00:20:44.184 --> 00:20:47.909
और शुद्ध है
तो सबके जीव के पर्याय शुद्ध होनी चाहिए।

00:20:47.933 --> 00:20:53.143
किसी को शुद्ध और किसी को अशुद्ध,
ज्ञानी ... क्रिया का भेद नहीं होता है।

00:20:53.167 --> 00:20:56.940
बाकी शुद्धात्मा जो है सामान्य,
वो कारण नहीं है;

00:20:56.964 --> 00:21:04.316
शुद्ध पर्याय का कारण नहीं है और
अशुद्ध पर्याय का भी कारण नहीं है, सामान्य।

00:21:04.340 --> 00:21:13.524
पर्याय का कारण पर्याय है।
क्योंकि कथंचित् भिन्न है,
सामान्य से पर्याय कथंचित् भिन्न है।

00:21:13.548 --> 00:21:22.649
दृष्टि अपेक्षा से सर्वथा भिन्न है और
ज्ञान अपेक्षा से कथंचित् भिन्न-अभिन्न है।
उसमें भी ऐसा रहस्य है।

00:21:22.673 --> 00:21:27.400
मुमुक्षु: ३२० वीं गाथा में जयसेन आचार्य
की टीका में गुरुदेव ने बहुत स्पष्ट किया है।

00:21:27.424 --> 00:21:33.130
बहुत स्पष्ट किया है पर्याय के,
द्रव्य और पर्याय की,
मतलब practical (प्रायोगिक) इतना है

00:21:33.154 --> 00:21:41.119
कि हम कथंचित् भिन्न, कथंचित् अभिन्न,
सर्वथा भिन्न, सर्वथा अभिन्न ऐसा
उसमें द्रव्य-पर्याय का ही खेल है।

00:21:41.143 --> 00:21:45.844
जहाँ धर्म क्रिया है,
पर्याय और द्रव्य ही है।
दूसरी, कोई तीसरी वस्तु नहीं है।

00:21:45.868 --> 00:21:48.952
पू. लालचंदभाई: (हाँ, कोई तीसरी वस्तु) नहीं।
मुमुक्षु: यह स्पष्टीकरण हो जाता है
तो निर्णय हो जाता है।

00:21:48.976 --> 00:21:53.524
पू. लालचंदभाई: हाँ! यही समझने जैसा;
इतना ही है द्रव्य-पर्याय।

00:21:53.548 --> 00:21:59.756
सर्वथा भिन्न है,
कथंचित् भिन्न-अभिन्न है, कि क्या है?
वो समझने जैसी बात इतनी ही है। बस!

00:21:59.780 --> 00:22:06.932
जैनदर्शन का सार सर्वथा भिन्न,
कथंचित् भिन्न-अभिन्न।

00:22:06.956 --> 00:22:11.859
ज्ञान अपेक्षा से सर्वथा नहीं आता है,
ज्ञान अपेक्षा से कथंचित् लागू पड़ता है;

00:22:11.883 --> 00:22:19.595
और दृष्टि अपेक्षा में
कथंचित् लागू नहीं पड़ता है,
सर्वथा लागू है।

00:22:19.619 --> 00:22:27.061
उस सर्वथा के साथ,
सर्वथा का जब जन्म होता है,
सम्यग्दर्शन का,

00:22:27.085 --> 00:22:36.002
तभी (सम्यक्) ज्ञान का भी
साथ में जन्म हो जाता है,
तो वो ज्ञान जानता है कथंचित्।

00:22:36.026 --> 00:22:39.254
मुमुक्षु: ज्ञान जान लेता है।
पू. लालचंदभाई: ज्ञान जान लेता है

00:22:39.278 --> 00:22:45.480
कि यह पर्याय कथंचित् मेरे से
भिन्न और कथंचित् अभिन्न।
तो वो ज्ञान आ गया।

00:22:45.504 --> 00:22:53.058
ज्ञान में कथंचित् है और कथंचित् अनेकांत
का द्योतक कहनेवाला स्याद्वाद।

00:22:53.082 --> 00:23:03.376
वो स्याद्वाद ज्ञान में है, अनेकांत ज्ञान में है;
श्रद्धा में एकांत है, अनेकांत नहीं है,
स्याद्वाद नहीं है (सिद्धांतों कि सरवाणी बोल ५)।

00:23:03.400 --> 00:23:19.301
मुमुक्षु: सम्यक् एकांत है।
पू. लालचंदभाई: सम्यक् एकांत है।
वही जैनदर्शन का रहस्य।

00:23:19.325 --> 00:23:28.529
बस एकांत-अनेकांत के बीच में रहस्य है।

00:23:28.553 --> 00:23:40.091
सम्यक् एकांत का जन्म होता है
तब अनेकांत का जन्म साथ में होता है।

00:23:40.115 --> 00:23:46.021
मुमुक्षु: निश्चय समझना पड़ेगा।
व्यवहार समझने की कोशिश छोड़ दो।

00:23:46.045 --> 00:23:50.276
पू. लालचंदभाई: पहले निश्चय समझो
तो व्यवहार का ज्ञान अपने आप हो जाएगा।
मुमुक्षु: अपने आप होता है वो।

00:23:50.300 --> 00:23:52.976
पू. लालचंदभाई: अपने आप, उसमें क्या?
पुरुषार्थ करने की ज़रूरत नहीं है।

00:23:53.000 --> 00:23:59.907
मुमुक्षु: .... तो उसमें
ये निश्चय-व्यवहार का (एक) विषय है।

00:23:59.931 --> 00:24:11.165
ऐसा विचार आया था कि
जैसे भाषा कोई बनती है ना भाषा।

00:24:11.189 --> 00:24:18.390
कोई भी भाषा नयी लिखी जाती है
तो पहले भाषा बनती है। उसके बाद व्याकरण
उसका बन जाता है, बनाया नहीं जाता।

00:24:18.414 --> 00:24:23.762
उसी तरह निश्चय पहले ख्याल में आता है
तो उसका व्यवहार तो अपने आप चलता है,

00:24:23.786 --> 00:24:29.795
वह तो ज्ञान-वैराग्य है तो अपने आप
वो सारा कार्य संतुलित हो जाता है और
अपने आप सारा व्यवहार प्रगट हो जाता है।

00:24:29.819 --> 00:24:37.531
उस तरह से फिर किसी ने व्यवहार देखा
वो व्यवहार शास्त्र में लिख दिया।
उसमें कोई बात नहीं है।

00:24:37.555 --> 00:24:40.976
निश्चय सत्यार्थ होने पर
व्यवहार अपने आप चलता है।

00:24:41.000 --> 00:24:44.681
व्यवहार तो पीछे-पीछे साथ रहता है,
जाता ही नहीं है।
१४वें गुणस्थान तक रहता है।

00:24:44.705 --> 00:24:46.927
पू. लालचंदभाई: रहता है।
मुमुक्षु: उसकी कहाँ मना है?

00:24:46.951 --> 00:24:50.925
निश्चय ही, जो सर्वथा निश्चय है,
उस पर्याय से जो भिन्न द्रव्य हूँ।

00:24:50.949 --> 00:24:59.392
जहाँ उस द्रव्य का अनुभव हुआ तो सारी
पर्याय, सारा व्यवहार भले ही A, B, C
ना जानते हों तो भी सब खिल जाता है।

00:24:59.416 --> 00:25:02.592
पू. लालचंदभाई: (हाँ) ऐसा ही है।

00:25:02.616 --> 00:25:15.941
मुमुक्षु: व्यवहार और निश्चय का भेद
करना है तो उन्होंने मोक्ष की पर्याय को
लेकर के आगे-पीछे की पर्याय की बात की।

00:25:15.965 --> 00:25:23.976
तो छठवें गुणस्थान को लेकर आगे-पीछे
की पर्याय को.... तो वैसे निश्चय का ही
जोर था उनका, वैसे व्यवहार का नहीं था।

00:25:24.000 --> 00:25:28.585
लेकिन वास्तविक तो यह है कि
तुम व्यवहार को पकड़ते ही क्यों हो?

00:25:28.609 --> 00:25:36.616
व्यवहार में जाते ही क्यों हो?
आपकी बुद्धि जाती क्यों है?

00:25:36.640 --> 00:25:42.971
पू. लालचंदभाई: ये कहते हैं कि
व्यवहार की तरफ आपकी नज़र क्यों जाती है?
निश्चय पर क्यों नहीं टिकते हो आप?

00:25:42.998 --> 00:25:46.915
मुमुक्षु: हाँ! वो निश्चय थोड़ी न है।
गुरुदेव के मार्ग में तो निश्चय ही है।

00:25:46.939 --> 00:25:49.841
व्यवहार तो समझ में आ जाता है।
गुरुदेव ने कहीं भी व्यवहार को ...

00:25:49.865 --> 00:25:53.024
पू. लालचंदभाई: कौन ना बोलता है?
व्यवहार नहीं है ऐसा कौन बोलता है?
अपने आप आ जाता है।

00:25:53.048 --> 00:25:55.618
मुमुक्षु: अपने आप आ जाता है।
उसको लाने की जरूरत नहीं है।

00:25:55.642 --> 00:26:05.194
जैसे आपको दृष्टि मिली है
तो आपको संतुलनपना अपने आप
समझ में आ जाता है। क्या जरूरत है ....

00:26:05.218 --> 00:26:09.308
पू. लालचंदभाई: द्रव्य को जिसने जाना
वो पर्याय को जानता है।

00:26:09.332 --> 00:26:15.309
मुमुक्षु: जानता है।
और वो द्रव्यों से उसकी हेयबुद्धि हो जाती है
और सब .... वैसे ही सब बन जाता है।

00:26:15.333 --> 00:26:22.707
भले लक्ष्मी का ढेर लगा ले
तो क्या करूँगा मैं?
पू. लालचंदभाई: कुछ नहीं।

00:26:22.731 --> 00:26:26.520
मुमुक्षु: इनका ऐसा कहना है कि
बिना मेहनत व्यवहार होता है तो व्यवहार
के लिए मेहनत करने की क्या ज़रूरत है?

00:26:26.544 --> 00:26:29.756
पू. लालचंदभाई: यही,
इनका कहने का आशय यही है।
मुमुक्षु: निश्चय के पीछे व्यवहार है।

00:26:29.780 --> 00:26:33.736
पू. लालचंदभाई: व्यवहार की सिद्धि
के लिए पुरुषार्थ नहीं लगाओ।

00:26:33.760 --> 00:26:42.316
निश्चय समझो ऐसा पुरुषार्थ लगाओ।
व्यवहार तो अपने आप खड़ा हो जाएगा।
मुमुक्षु: द्रव्य के बारे में सोचे।

00:26:42.340 --> 00:26:46.814
पू. लालचंदभाई: पैसा पहले कमाओ,
ब्याज तो अपने आप आ जाएगा।

00:26:46.838 --> 00:26:52.821
मुमुक्षु: वो तो अपने आप बढ़ेगा।
उसमें क्या? ब्याज भी, वो तो पैसा हो
तो अपने आप बढ़ता है।

00:26:52.845 --> 00:26:54.240
पू. लालचंदभाई: बस! अपने आप बढ़ता है।

00:26:54.264 --> 00:26:58.869
मुमुक्षु: हाँ! वो तो उसको बढ़ाना नहीं पड़ता है। 
वो तो अपने आप circulate (घूमना) हो जाता है।

00:26:58.893 --> 00:27:06.267
पू. लालचंदभाई: इधर द्रव्यदृष्टि हो गई,
चौदह गुणस्थान आ जाते हैं, सहज में।

00:27:06.291 --> 00:27:11.115
मुमुक्षु: उनकी एक बात आई थी
उसमें कि गेंद को जोर से मारोगे
तो गेंद हाथ में आएगी।

00:27:11.139 --> 00:27:14.199
धीरे से मारोगे तो कुछ नहीं आता।

00:27:14.223 --> 00:27:18.610
पू. लालचंदभाई: क्या मारा?
मुमुक्षु: गेंद ball।
पू. लालचंदभाई: गेंद। Ball ball।

00:27:18.634 --> 00:27:21.122
मुमुक्षु: आप क्या कहते हो?
पू. लालचंदभाई: Rebound (गेंद
टकराकर वापस आ जाता है) हो जाएगा।

00:27:21.146 --> 00:27:26.355
मुमुक्षु: हमने आपके कैसेट ना,
गुरुदेव के कैसेट, इनके के कैसेट.....
बीच में गुरुदेव के कैसेट सुनते थे।

00:27:26.379 --> 00:27:29.653
तो साथ में मिलान करते थे कि
ये बात कहाँ गड़बड़ पड़ रही है?

00:27:29.677 --> 00:27:35.680
कहीं गड़बड़ तो नहीं लग रही।
हमने सब मिलान किया है साहब।
पू. लालचंदभाई: अच्छा! तो मिलान हो गया?

00:27:35.704 --> 00:27:41.843
मुमुक्षु: हाँ! गुरुदेव की कैसेट रोज
साथ में सुनते थे क्रमबद्धपर्याय ....
की चर्चा हैं वो सुनीं उनकी कैसेट में।

00:27:41.867 --> 00:27:45.594
बीच में फिर कुछ १३ वीं गाथा
की उसमें ही बात आती है।

00:27:45.618 --> 00:27:52.283
फिर उसमें ३२० गाथा के भावार्थ के अंदर में,
उनको बराबर रखकर इनके कैसेट (को)
बीच में रखकर सुनना फिर उसको सुनना।

00:27:52.307 --> 00:28:01.875
वहाँ पुरुषार्थ लगाया थोड़ा तो कोई काम।

00:28:01.899 --> 00:28:05.793
इनकी बात हमको इसलिए पसंद आई 
(क्यों)कि ये शुद्ध हिन्दी भाषी हैं।

00:28:05.817 --> 00:28:09.376
और गुरुदेव की बात मिठासमय है।

00:28:09.400 --> 00:28:14.877
इनकी बात में कड़कपन से बात आई
सामने तो बात समझ में आ गई।

00:28:14.901 --> 00:28:18.065
मुमुक्षु: और ये शुद्ध बात,
शुद्धनय की ही बात करती हैं।

00:28:18.089 --> 00:28:24.431
मुमुक्षु: वो कड़क नहीं है मगर
बात कड़क तरीके से कहना चाहिए।
आपका दिमाग भी छोटा नहीं है।

00:28:24.455 --> 00:28:31.807
ढीलापन में नहीं जमे।
सुनता है, कड़क माल होता है ना।
गाली देना पड़े दे दो। ठीक है!

00:28:31.831 --> 00:28:34.372
मुमुक्षु: Shock treatment (झटके
का उपचार) है, Shock treatment.

00:28:34.396 --> 00:28:41.576
मुमुक्षु: Shock (झटका) देना चाहिए,
बिजली की करंट की तरह दो।

00:28:41.600 --> 00:29:01.739
... आप जो भी बहुत मंथन और 
... जोरदार ... उससे भी ...।

00:29:01.763 --> 00:29:16.835
पू. लालचंदभाई: सर्वथा भिन्न बिना
कथंचित् लागू पड़ता नहीं है
(सिद्धांतों कि सरवाणी बोल ७)।

00:29:16.859 --> 00:29:24.096
कथंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न
इसमें निर्णय क्या आया?
कोई निर्णय नहीं आया।

00:29:24.120 --> 00:29:26.918
इसमें पुरुषार्थ कुछ नहीं आया।

00:29:26.942 --> 00:29:30.267
मुमुक्षु: घड़ी के लोलक जैसा रहा,
दोनों बाजू फिरता है।

00:29:30.291 --> 00:29:39.216
पू. लालचंदभाई: पर्याय कथंचित् भिन्न
और कथंचित् अभिन्न, इसमें
आत्मलाभ क्या हुआ? कुछ नहीं।

00:29:39.240 --> 00:29:42.511
मुमुक्षु: हाँ! निर्णय नहीं हुआ।

00:29:42.535 --> 00:29:44.899
पू. लालचंदभाई: भिन्न है कि अभिन्न
- तो निर्णय तो नहीं हुआ।

00:29:44.923 --> 00:29:49.431
ठीक है!
कथंचित् भिन्न है कथंचित् अभिन्न है,
भैया! परंतु इसमें निर्णय क्या हुआ?

00:29:49.455 --> 00:30:01.289
मुमुक्षु: हाँ! मार्मिक बात है ये।

00:30:01.313 --> 00:30:06.876
पू. लालचंदभाई: राग है,
आत्मा से कथंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न,
उसमें निर्णय क्या हुआ?

00:30:06.900 --> 00:30:14.958
आत्मलाभ क्या हुआ?
वस्तु क्या है, भिन्न है कि अभिन्न?
वस्तु भिन्न-अभिन्न है। आहाहा!

00:30:14.982 --> 00:30:22.351
गया! वो व्यवहार का पक्ष है,
वो व्यवहार का पक्ष है।

00:30:22.375 --> 00:30:29.098
इसलिए आत्मा में स्याद्वाद नहीं है
- ऐसा देवसेन आचार्य भगवान ने कहा,

00:30:29.122 --> 00:30:34.720
तो <b>भी निश्चयाभास होता नहीं है</b>
(पृष्ठ ३१, नयचक्र), वो बात है।

00:30:34.744 --> 00:30:44.976
मुमुक्षु: <b>स्यात् पद से रहित होनेपर
भी उसमें निश्चयाभास होता नहीं है</b>।
पू. लालचंदभाई: आता नहीं।

00:30:45.000 --> 00:30:54.130
सर्वथा के बिना
जीव को सम्यग्दर्शन नहीं होता है।

00:30:54.154 --> 00:31:02.207
कथंचित् वस्तु का निर्णय नहीं कराता,
सर्वथा निर्णय कराता है कि
देह से आत्मा सर्वथा भिन्न है;

00:31:02.231 --> 00:31:10.205
आठ कर्म से सर्वथा भिन्न है;
राग से सर्वथा भिन्न है; केवलज्ञान की
पर्याय से सर्वथा भिन्न है, भगवान आत्मा।

00:31:10.229 --> 00:31:12.635
चौदह गुणस्थान से सर्वथा भिन्न है।

00:31:12.659 --> 00:31:18.671
सर्वथा भिन्न लाओ,
बाद में कथंचित् भिन्न-अभिन्न का ज्ञान
अपने आप, अपने आप हो जाता है।

00:31:18.695 --> 00:31:21.128
कौन ना बोलता है?
ना नहीं बोलते हैं।

00:31:21.152 --> 00:31:33.377
हमको स्वीकार है परंतु पहले सर्वथा लाओ;
सर्वथा के बिना कथंचित् आता नहीं है।

00:31:33.401 --> 00:31:38.725
मुमुक्षु: ऐसे सोनगढ़ में ही घोटाला करते हैं।
पू. लालचंदभाई: सोनगढ़ में खुलासा होता (है),
क्या घोटाला चलता है?

00:31:38.749 --> 00:31:43.595
मुमुक्षु: कोई भी एक वस्तु प्रमाण का
विषय बनाकर, ........ करके छोड़ देते हैं

00:31:43.619 --> 00:31:48.325
और न द्रव्य हाथ में आता है
और न पर्याय आती है।

00:31:48.349 --> 00:31:57.392
सर्वथा भिन्न ही है बस, यही माने तो सम्यग्दर्शन
होता है और बाद में पर्याय का ज्ञान,
नय का ज्ञान सबमें प्रमाण हो जाता है।

00:31:57.416 --> 00:32:12.224
Clear (स्पष्ट) होता है न!
किसी को हमको द्वेष नहीं है ......
अपना कल्याण करना है।

00:32:12.248 --> 00:32:26.696
पू. लालचंदभाई: हाँ! अपना कल्याण करना है।

00:32:26.720 --> 00:32:34.532
देखो, सोना और लोहा,
उसको (यदि) विशेष नहीं लेने में आए
तो सामान्य तो पुद्गल है।

00:32:34.556 --> 00:32:45.959
ऐसे जीव सामान्य तो शुद्ध है।
तो सामान्य कारण और विशेष कार्य
ये जो ऐसा घटाओ, तो दोष आ जाए।

00:32:45.983 --> 00:32:52.972
क्योंकि जो सामान्य शुद्ध है
तो उसका विशेष शुद्ध ही होना चाहिए;
तो अज्ञान सिद्ध होता नहीं।

00:32:52.996 --> 00:33:04.186
इसलिए अज्ञान सिद्ध कब होता है?
कि सामान्य कारण और विशेष कार्य नहीं है।

00:33:04.210 --> 00:33:13.654
नहीं तो-तो कारण जैसा कार्य जो घटाओ
तो द्रव्य और पर्याय में, तो तो अज्ञान
बैठता नहीं है, ज्ञान में बैठ जाता है।

00:33:13.678 --> 00:33:20.601
ज्ञान तो सादि है, अनादि नहीं है।
और शुद्ध तो अनादि-अनंत है
और ज्ञान तो सादि नया प्रगट होता है।

00:33:20.625 --> 00:33:27.755
तो ज्ञान के पहले क्या हुआ?
तो कारण जैसा कार्य कहो - ऐसा नहीं
लागू पड़ता है। पर्याय का कारण पर्याय है।

00:33:27.779 --> 00:33:35.541
मुमुक्षु: पर्याय को कारण कौन?
पू. लालचंदभाई: अज्ञान है, एक समय की पर्याय;
ज्ञायक कारण नहीं है।

00:33:35.565 --> 00:33:41.763
मुमुक्षु: और ज्ञान का?
पू. लालचंदभाई: ज्ञान का कारण ज्ञान की पर्याय है,
त्रिकाली द्रव्य कारण नहीं है।

00:33:41.787 --> 00:33:46.817
ऐसा लिया है (समयसार, तात्पर्यवृत्ति
टीका, जयसेनाचार्य) ३२० गाथा में,
<b>कारण नहीं है</b>।

00:33:46.841 --> 00:33:49.017
<b>मोक्ष का कारण आत्मा नहीं है</b>।

00:33:49.041 --> 00:33:56.026
ऐसा न्याय दिया कि मोक्ष का कारण
जो आत्मा हो तो आत्मा तो प्रथम से ही है,
तो मोक्ष होना चाहिए सबका।

00:33:56.050 --> 00:34:03.320
तो मोक्ष का कारण आत्मा,
भगवान आत्मा नहीं है
- कर्ता भी नहीं है और कारण भी नहीं है।

00:34:03.344 --> 00:34:07.671
ऐसा लेवें तो दृष्टि का विषय हाथ में आए;
बाद में ज्ञान में आओ।

00:34:07.695 --> 00:34:15.588
ज्ञान, सम्यग्ज्ञान हो जाता है,
वो सम्यग्ज्ञान जानता है सब।

00:34:15.612 --> 00:34:19.158
सम्यग्दर्शन होता है
तो सम्यग्ज्ञान प्रगट होता है।

00:34:19.182 --> 00:34:23.104
सम्यग्दर्शन के बिना
सम्यग्ज्ञान आता ही नहीं है।

00:34:23.128 --> 00:34:30.307
११ अंग पढ़ डालो न, ज्ञान नहीं है,
अज्ञान है वो; सम्यग्दर्शन के बिना का।

00:34:30.331 --> 00:34:48.557
सर्वथा का ठिकाना नहीं है
तो कथंचित् कहाँ से आ गया?

00:34:48.581 --> 00:34:55.358
'सर्वथा' शब्द समयसार में
बहुत जगह पर लिया है।

00:34:55.382 --> 00:35:01.884
बहुत जगह पर, बहुत प्रकरण में,
बहुत गाथायें हैं - सर्वथा,
सर्वथा शब्द लिया है।

00:35:01.908 --> 00:35:10.056
नवतत्त्व से सर्वथा भिन्न है,
इंद्रियज्ञान से सर्वथा भिन्न है,
राग से सर्वथा भिन्न है।

00:35:10.080 --> 00:35:12.849
बहुत सर्वथा शब्द का प्रयोग किया है।

00:35:12.873 --> 00:35:20.986
बाकी दृष्टि का विषय,
जो कथंचित् में रुक गया
उसको दृष्टि का विषय हाथ में नहीं आता है,

00:35:21.010 --> 00:35:33.668
क्योंकि 'कथंचित्' प्रमाण का विषय हो गया।
'सर्वथा' नय का विषय होता है।

00:35:33.692 --> 00:35:41.184
कथंचित् कर्ता और कथंचित् अकर्ता
वो तो प्रमाणज्ञान का विषय आ गया।

00:35:41.208 --> 00:35:50.443
सर्वथा अकर्ता है और कर्ता नहीं है
- इसका नाम अनेकांत है।

00:35:50.467 --> 00:35:54.711
नय का अनेकांत जुदा
और प्रमाण का अनेकांत जुदा है।

00:35:54.735 --> 00:36:00.420
प्रमाण का अनेकांत तो जानने के लिए है;
नय का अनेकांत प्रयोजन सिद्ध करने के लिए है।

00:36:00.444 --> 00:36:06.830
मुमुक्षु: भेदज्ञान के लिए है।
पू. लालचंदभाई: हाँ! द्रव्य में पर्याय (नहीं है);
द्रव्य द्रव्यरूप है और पर्यायरूप नहीं है।

00:36:06.854 --> 00:36:10.893
वो सम्यक् एकांत की सिद्धि उसमें होती है,
नय से।

00:36:10.917 --> 00:36:15.845
बाद में अनुभव हुआ कि
वस्तु द्रव्य-पर्याय स्वरूप है।
हाँ है!

00:36:15.869 --> 00:36:19.257
तो वो अनेकांत हो गया,
प्रमाण का अनेकांत हो गया।

00:36:19.281 --> 00:36:29.593
प्रमाण के अनेकांत में द्रव्य-पर्याय स्वरूप
पूरी वस्तु आती है और नय में
(ऐसा है कि) द्रव्य में पर्याय नहीं है।

00:36:29.617 --> 00:36:33.718
नयपूर्वक प्रमाण होता है;
प्रमाणपूर्वक नय नहीं होता है।

00:36:33.742 --> 00:36:43.723
जब अनुभव-सम्यग्दृष्टि का जन्म होता है न,
होता है, तब नयपूर्वक प्रमाण होता है;
प्रमाणपूर्वक नय नहीं होता है।

00:36:43.747 --> 00:36:56.731
सविकल्प प्रमाण में आकर व्यवहार का निषेध
करे उसमें, पर्याय मेरी नहीं है, पर्याय
मेरे में नहीं है; पर्याय दिखती नहीं है।

00:36:56.755 --> 00:37:08.516
कर्ता तो नहीं है, मेरी तो नहीं है, 
मगर मेरे को पर्याय दिखती (ही) नहीं है। 
अभेद में भेद दिखता नहीं है। आहाहा!

00:37:08.540 --> 00:37:11.752
एक सर्वोपरी तत्त्व 
चैतन्य परमात्मा दिखता है।

00:37:11.776 --> 00:37:20.064
कोई चौदह गुणस्थान का भेद दिखता नहीं है 
क्योंकि पुरुष से भेद भिन्न हैं, 
आत्मा से भेद भिन्न हैं।

00:37:20.088 --> 00:37:28.785
इसलिए जब पुरुष को देखता है उसको 
भेद दिखाई नहीं देते हैं, अभेद में भेद 
दिखाई नहीं देते हैं, उसका नाम सम्यग्दर्शन है।

00:37:28.809 --> 00:37:35.018
सम्यग्दर्शन के साथ सम्यग्ज्ञान होता है, 
वो भेद को जान लेता है, भेद हैं बस।

00:37:35.042 --> 00:37:39.686
मुमुक्षु: ज्ञान की पर्याय जाएगी कहाँ? 
पू. लालचंदभाई: हाँ! जानेगी।

00:37:39.710 --> 00:37:43.696
मुमुक्षु: वो तो जानेगी। कहाँ जाएगी? 
वो तो वहीं पड़ी है ना, वहीं जानेगी।

00:37:43.720 --> 00:37:46.387
पू. लालचंदभाई: सम्यग्दर्शन के 
साथ ही जन्म होता है सम्यग्ज्ञान का।

00:37:46.411 --> 00:37:58.531
तो वो ज्ञान द्रव्य को द्रव्यरूप जानता है, 
पर्याय को पर्यायरूप जानता है। बस!

00:37:58.555 --> 00:38:09.078
सर्वथा और कथंचित् में सब -सारा रहस्य है। 
मुमुक्षु: श्रद्धा में तो 
सर्वथा है ही परंतु ज्ञान में भी ....

00:38:09.102 --> 00:38:17.331
पू. लालचंदभाई: शुद्धनय, 
शुद्धनय में सर्वथा है। 
शुद्धनय जो लो साथ में तो सर्वथा है।

00:38:17.355 --> 00:38:27.357
मगर जब सम्यग्दर्शन का विषय चलता है 
उसमें सर्वथा भिन्न है, तो उसमें शुद्धनय 
से सर्वथा भिन्न आ गया, विभाग में। समझे?

00:38:27.381 --> 00:38:33.366
मगर जब दृष्टि अपेक्षा से सर्वथा भिन्न है 
तो ज्ञान अपेक्षा से कथंचित् भिन्न-अभिन्न,

00:38:33.390 --> 00:38:38.923
तो शुद्धनयपूर्वक जो ज्ञान प्रगट होता है 
प्रमाणज्ञान, वो बात उसमें आ गई।

00:38:38.947 --> 00:38:43.065
उसमें शुद्धनय का विषय 
और श्रद्धा का विषय एक है।

00:38:43.089 --> 00:38:49.312
शुद्धनय का विषय और श्रद्धा का 
विषय दो जुदा नहीं हैं, एक हैं।

00:38:49.336 --> 00:38:54.937
जो त्रिकाली द्रव्य ज्ञायक है 
वो ही शुद्धनय का विषय है 
और श्रद्धा का विषय वही है।

00:38:54.961 --> 00:39:06.044
जब शुद्धनय प्रगट होता है तो साथ में उस 
पर्याय का ज्ञान करनेवाला एक व्यवहारनय 
भी प्रगट होता है क्योंकि ज्ञान सविकल्प है।

00:39:06.068 --> 00:39:20.232
ज्ञान में दो पड़खे बनते हैं, 
श्रद्धा में दो पड़खे नहीं बनते।

00:39:20.256 --> 00:39:26.454
शुद्धनय का विषय और 
दृष्टि का विषय एक है, 
उसमें फ़र्क नहीं है।

00:39:26.478 --> 00:39:33.857
मगर शुद्धनय का विषय जो सामान्य आया 
- वो सामान्य मैं हूँ ऐसा शुद्धनय से जाना,

00:39:33.881 --> 00:39:40.368
तो उसके साथ जो आनंद का 
परिणाम प्रगट हुआ उस ही समय,

00:39:40.392 --> 00:39:45.790
उस आनंद को जाननेवाला ज्ञान 
भी प्रगट हो गया उस ही समय में।

00:39:45.814 --> 00:39:50.822
उस आनंद की पर्याय को जाननेवाला 
ज्ञान प्रगट हुआ, उसका नाम व्यवहार है।

00:39:50.846 --> 00:39:54.654
अंदर का निश्चय और अंदर का 
व्यवहार प्रगट होता है निर्विकल्पध्यान में।

00:39:54.678 --> 00:40:05.116
मुमुक्षु: अंदर का स्वपरप्रकाशक? 
पू. लालचंदभाई: हाँ! अंदर का स्वपरप्रकाशक।

00:40:05.140 --> 00:40:12.416
पर्याय को जाननेवाला ज्ञान प्रगट होता है। 
द्रव्य को जाना तो पर्याय को जाननेवाला 
ज्ञान भी साथ में प्रगट होता है।

00:40:12.440 --> 00:40:25.464
आनंद आया उसको जानता है ज्ञान। 
आनंदमूर्ति को जाना तो आनंद को 
जाननेवाला ज्ञान भी प्रगट हो जाता है।

00:40:25.488 --> 00:40:33.009
जो आनंद प्रगट हुआ ना, वो आनंद प्रगट 
हुआ उसको समझो ज्ञान ने जाना नहीं,

00:40:33.033 --> 00:40:38.476
तो सविकल्पदशा में, 
मेरे को सम्यग्दर्शन हुआ किसको पूछे? 
कौन जाने?

00:40:38.500 --> 00:40:42.454
कि नहीं ज्ञान ने बता दिया। 
ज्ञान ने क्यों बता दिया?

00:40:42.478 --> 00:40:45.048
कि आनंद की पर्याय को 
ज्ञान ने जान लिया था।

00:40:45.072 --> 00:40:52.482
आनंदमूर्ति को तो जाना और आनंद पर्याय 
को भी जाना तो सविकल्प में कहा 
कि आज भव का अंत आ गया।

00:40:52.506 --> 00:41:04.221
ऐसा आनंद की पर्याय को ज्ञान जानता 
नहीं है बिल्कुल, सर्वथा - ऐसा नहीं है।

00:41:04.245 --> 00:41:08.428
मुमुक्षु: पर्याय को जानता है 
तो भी पर्यायदृष्टि नहीं होती है? 
पू. लालचंदभाई: नहीं होती है

00:41:08.452 --> 00:41:12.535
क्योंकि पर्याय में आत्मबुद्धि नहीं है, 
पर्याय का लक्ष नहीं है।

00:41:12.559 --> 00:41:16.741
द्रव्य का लक्ष छूटता नहीं है 
और पर्याय का ज्ञान रह जाता है।

00:41:16.765 --> 00:41:23.025
द्रव्य का लक्ष छूटे नहीं और पर्याय 
का ज्ञान हो जाता है। इसमें क्या है?

00:41:23.049 --> 00:41:30.380
पर्याय का ज्ञान करने में पुरुषार्थ नहीं है, 
द्रव्य का ज्ञान करने में पुरुषार्थ है।

00:41:30.404 --> 00:41:40.370
वो तो सहज परिणाम को जानता है ज्ञान। 
उसमें क्या है? 
उसके लिए पुरुषार्थ नहीं बनाता है।

00:41:40.394 --> 00:41:46.556
मुमुक्षु: अंदर में घुसने के लिए पुरुषार्थ चाहिए? 
पू. लालचंदभाई: द्रव्य स्वभाव को जानना 
वो अनंत पुरुषार्थ है भैया!

00:41:46.580 --> 00:42:02.505
पर्याय को जानने में पुरुषार्थ कहाँ है? 
सहज में वो जानता है।

00:42:02.529 --> 00:42:13.080
कुंदकुंद भगवान की जो वाणी, 
ऐसी ही वाणी गुरुदेव की है। बस! 
प्रमत्त-अप्रमत्त से रहित भिन्न ज्ञायक मैं हूँ।

00:42:13.104 --> 00:42:29.596
उसमें कथंचित् भिन्न नहीं लिखा। भिन्न है। 
प्रमत्त-अप्रमत्त नहीं है आत्मा में। बोलो!

00:42:29.620 --> 00:42:37.812
<b>नहिं अप्रमत्त प्रमत्त नहीं, 
जो एक ज्ञायक भाव है </b>
(समयसार गाथा ६)। आहाहा!

00:42:37.836 --> 00:42:47.843
कि आत्मा एकरूप है, १४ रूप नहीं। 
प्रमत्त-अप्रमत्त जो चौदह गुणस्थान हैं 
वो स्वांग हैं। स्वभाव कहाँ है आत्मा का।

00:42:47.867 --> 00:42:59.007
अरे! एक अपेक्षा से वो कर्मजन्य भाव है। 
कर्म के सद्भाव और अभाव की अपेक्षा आती है, 
सापेक्ष हो गया।

00:42:59.031 --> 00:43:06.537
भगवान ज्ञायक तत्त्व निरपेक्ष है; 
कर्म से तो निरपेक्ष है मगर 
चौदह गुणस्थान से भी निरपेक्ष है।

00:43:06.561 --> 00:43:16.567
वो मैं हूँ। बस! 
उसमें अनुभूति होती है।

00:43:16.591 --> 00:43:23.307
गुरुदेव की वाणी फिरनेवाली नहीं है। 
मुमुक्षु: नहीं है। 
पू. लालचंदभाई: हाँ!

00:43:23.331 --> 00:43:27.370
जिसकी लायकात न हो उसको न बैठे। 
न बैठे तो न बैठे।

00:43:27.394 --> 00:43:33.214
मगर सत् कहीं फिरता है? 
तीन काल में सत् तो एकरूप रहता है।

00:43:33.238 --> 00:44:05.501
आत्मा का रूप बदलता ही नहीं है तीनों काल, 
एकरूप ही आत्मा है, बहुरूपी नहीं है।

00:44:05.525 --> 00:44:14.041
ये ज्ञानी की वाणी है न, वाणी, 
ये बाँझ नहीं होती है। समझ में आया? 
मुमुक्षु: बराबर!

00:44:14.065 --> 00:44:20.267
पू. लालचंदभाई: समझ में आया? 
ज्ञानी की जो वाणी छूटती है, 
कोई न कोई पात्र जीव...

00:44:20.291 --> 00:44:27.105
मुमुक्षु: पकड़ता ही है। 
पू. लालचंदभाई: हाँ! पकड़ता ही है। 
मुमुक्षु: बाँझनी का मतलब समझते नहीं हैं।

00:44:27.129 --> 00:44:30.883
मुमुक्षु: बाँझ नहीं होती है। 
बाँझ नहीं होती है ज्ञानी की वाणी।

00:44:30.907 --> 00:44:33.753
कोई न कोई उसमें से प्राप्ति.... 
कोई न कोई प्राप्ति

00:44:33.777 --> 00:44:39.089
पू. लालचंदभाई: कोई न कोई जीव 
प्राप्त कर लेता है। यानि 
बेकार नहीं जाती है वाणी।

00:44:39.113 --> 00:44:46.465
मुमुक्षु: वाणी खिरती ही नहीं है 
अगर बेकार जाए तो। 
पू. लालचंदभाई: हाँ! तो खिरे ही नहीं।

00:44:46.489 --> 00:44:58.936
खिरती है तो मालूम होता है कि 
कोई ग्रहण करनेवाला बैठा है।

00:44:58.960 --> 00:45:02.260
ऐसा ही योगानुयोग 
निमित्त-नैमित्तिक संबंध बन जाता है।

00:45:02.284 --> 00:45:07.867
भगवान महावीर की वाणी ६६ दिन नहीं खिरी 
क्योंकि कोई झेलनेवाला नहीं था।

00:45:07.891 --> 00:45:14.138
जहाँ गणधर भगवान आए गौतम, 
वाणी की मूसलाधार छूटी। आहाहा!

00:45:14.162 --> 00:45:34.669
उनका तो काम हुआ और उनके निमित्त 
से कई जीवों को प्राप्ति हो गई। आहाहा!

00:45:34.693 --> 00:46:03.942
वाणी बेकार नहीं जाती है, 
कोई जीव सभा में ग्रहण करनेवाला, 
लायक भव्य प्राणी, उस सभा में बैठा ही है।

00:46:03.966 --> 00:46:19.636
सर्वथा और कथंचित् में मर्म है। 
सारे जिनागम का सार: 
सर्वथा नंबर- १, कथंचित् नंबर- २।

00:46:19.660 --> 00:46:24.795
मुमुक्षु: दृष्टि के विषय में सर्वथा 
और ज्ञान के विषय में कथंचित्।

00:46:24.819 --> 00:46:32.100
पू. लालचंदभाई: भले हो! कोई बात नहीं। 
हो तो हो, कौन ना बोलता है? 
कौन ना बोलता है?

00:46:32.124 --> 00:46:39.567
एकांत को जानते-मानते हैं? 
कि हाँ! हम अनेकांत को जानते हैं। 
तुम एकांत को जानते हो?

00:46:39.591 --> 00:46:43.832
बोलो! हमारा प्रश्न है। 
आपके प्रश्न में हमने हाँ बोला। हें?

00:46:43.856 --> 00:46:46.256
कि आत्मा अनेकांतमयी है? 
कि हाँ!

00:46:46.280 --> 00:46:54.854
अभी मेरा प्रश्न सुनो कि 
आत्मा एकांतरूप है? 
कि नहीं है। झूठ है बात, जा!

00:46:54.878 --> 00:46:58.105
मुमुक्षु: क्योंकि 
सर्वथा अनेकांतरूप नहीं है; 
अनेकांत भी अनेकांतरूप ही है।

00:46:58.129 --> 00:47:01.713
पू. लालचंदभाई: 
<b>अनेकान्तोऽप्यनेकान्तः प्रमाण-नय-साधनः </b>
(स्त्रोत्र-त्रयी, स्वयंभूस्तोत्र श्लोक नं. १०३)

00:47:01.737 --> 00:47:07.744
प्रमाण से अनेकांत की सिद्धि नहीं होती है; 
प्रमाण और नय से अनेकांत की सिद्धि होती है।

00:47:07.768 --> 00:47:13.437
नय को छोड़ दो, 
अकेले प्रमाण से अनेकांत की सिद्धि करो, 
तीन काल में नहीं होती है।

00:47:13.461 --> 00:47:19.167
मिथ्या अनेकांत हो जाता है। 
नयपूर्वक प्रमाण होता है।

00:47:19.191 --> 00:47:23.446
अनेकांत की सिद्धि के लिए भी 
नय का सहारा लेना चाहिए।

00:47:23.470 --> 00:47:27.714
जैसे झाड़ है, वृक्ष। 
जैसे वृक्ष है ना वृक्ष।

00:47:27.738 --> 00:47:33.232
उसके अंदर पत्ता है, पान - हरा, 
डाली है, फल है, ऐसे बहुत हैं।

00:47:33.256 --> 00:47:39.069
सारे ये अनेकांतरूप हैं, सारा, 
प्रमाणज्ञान का विषय। ठीक है?

00:47:39.093 --> 00:47:42.663
वो प्रमाणज्ञान का विषय सिद्ध कब होता है?

00:47:42.687 --> 00:47:51.763
जब एक-एक पत्ते को देखो, 
इस पत्ते में दूसरे पान का अभाव है, 
इस पत्ते में दूसरे पत्ते का अभाव है।

00:47:51.787 --> 00:47:59.869
तो एक-एक नय से एक-एक पत्ते को देखो, 
युगपद् अनेक पत्तों को देखो तो प्रमाण होता है।

00:47:59.893 --> 00:48:09.918
मगर एक पत्ते को देखे बिना 
प्रमाणज्ञान की सिद्धि नहीं होती है।

00:48:09.942 --> 00:48:16.652
और प्रमाणज्ञान में हेय-उपादेय नहीं है; 
नय ज्ञान में हेय-उपादेय है।

00:48:16.676 --> 00:48:29.863
प्रमाण पूज्य नहीं है; 
निश्चयनय पूज्य है।

00:48:29.887 --> 00:48:36.646
उसमें गुरुदेव की वाणी फिरनेवाली नहीं है, 
बस। जो लायक है उसको बैठ जाता है।

00:48:36.670 --> 00:48:41.538
जिसकी होनहार नहीं हो, 
उसको क्या करे कोई? 
कोई क्या (करे)?

00:48:41.562 --> 00:48:45.223
मुमुक्षु: कोई क्या करे? 
पू. लालचंदभाई: कोई क्या करे? 
मुमुक्षु: दूसरा तो क्या करे?

00:48:45.247 --> 00:48:51.087
पू. लालचंदभाई: कोई क्या करे? बस! 
जानो कि अभी उसका काल नहीं पका है।

00:48:51.111 --> 00:48:58.576
बस जानो। दूसरा क्या? 
अपनी मर्यादा क्या? जानो, बस! 
आज नहीं समझता है, कल समझ जाएगा।

00:48:58.600 --> 00:49:34.571
वो भी आत्मा है भगवान, बस। 
उसकी चिंता क्यों करें हम?

00:49:34.595 --> 00:49:52.738
ऐसा <b>अनेकान्तोऽप्यनेकान्तः 
प्रमाण-नय-साधनः </b>उसके 
अंदर ये चार का लागू ... किया है।

00:49:52.762 --> 00:49:57.174
भगवान (तीर्थंकर) महावीर 
और उनका सर्वोदय (तीर्थ) वो.....

00:49:57.198 --> 00:50:05.798
मुमुक्षु: डॉक्टर भारिल्ल। 
पू. लालचंदभाई: हाँ! हाँ! 
डॉक्टर भारिल्ल, उसमें।

00:50:05.822 --> 00:50:10.425
मुमुक्षु: वो आपने जयपुर में लिया था, 
अनेकांत भी अनेकांत।

00:50:10.449 --> 00:50:16.501
उनको अच्छी, बहुत अच्छी लगी थी वो (बात)। 
सर्वथा अनेकांतवादी नहीं है जैनदर्शन। 
पू. लालचंदभाई: नहीं है।

00:50:16.525 --> 00:50:24.841
<b>अनेकान्तोऽप्यनेकान्तः </b>अनेकांत 
भी अनेकांतरूप है, एकांतरूप नहीं है। 
ये कोई समझे ही नहीं कि ये क्या!

00:50:24.865 --> 00:50:31.250
मुमुक्षु: कैसी बात है ये! 
सर्वथा अनेकांतवादी, ये भी एक एकांत है।

00:50:31.274 --> 00:50:36.787
पू. लालचंदभाई: एकांत हो गया। 
ऐसा अनेकांत का स्वरूप नहीं है।

00:50:36.811 --> 00:50:49.502
अनेकांत को ही माने द्रव्य-पर्याय स्वरूप 
वस्तु अनंत धर्मात्मक, तो वो तो अनेकांत 
ही नहीं रहा, मिथ्या अनेकांत हो गया।

00:50:49.526 --> 00:50:51.157
मुमुक्षु: ओहो! सम्यक् एकांत 
पूर्वक सम्यक् अनेकांत होता है।

00:50:51.181 --> 00:50:54.236
पू. लालचंदभाई: हाँ! और 
श्रीमद् जी ने एक लिखा है

00:50:54.260 --> 00:50:58.672
<b>अनेकान्तिक मार्ग</b> (ज्ञान)
 <b>भी सम्यक् एकांत ऐसे निजपद 
की प्राप्ति कराने के सिवाय</b>

00:50:58.696 --> 00:51:00.400
<b>दूसरे किसी अन्य हेतु से उपकारी नहीं है</b> 
(श्रीमद् राजचन्द्र वचनामृत पत्र ७०२)।

00:51:00.424 --> 00:51:05.802
समझो द्रव्य-पर्याय स्वरूप वस्तु में आ गया जीव, 
तो उसमें साध्य की सिद्धि नहीं होती है।

00:51:05.826 --> 00:51:11.527
अनेकांत का ज्ञान हुआ मगर 
आत्मा का ज्ञान नहीं हुआ।

00:51:11.551 --> 00:51:20.586
अनेकांत का अज्ञान हो गया, 
ज्ञान नहीं हुआ अनेकांत का। 
अनेकांत का अज्ञान हो गया।

00:51:20.610 --> 00:51:24.933
अनेकांत का पक्ष आ गया ना, 
तो अज्ञान हो गया; ज्ञान नहीं हुआ।

00:51:24.957 --> 00:51:30.108
अच्छा! अनेकांत में आने पर भी अज्ञान 
रह जाता है? कि हाँ! तो अभी क्या करना?

00:51:30.132 --> 00:51:35.107
कि अनेकांत में से एकांत निकालो। 
पर्याय को गौण करो, 
द्रव्य स्वभाव को निकालो।

00:51:35.131 --> 00:51:40.002
द्रव्य स्वभाव मैं हूँ - अविनाशी मैं हूँ; 
नाशवान पर्याय मेरी चीज नहीं है।

00:51:40.026 --> 00:51:47.256
अनेकांत में से एकांत निकालो 
बाद में जो अनेकांत हो गया, 
वो प्रमाणज्ञान बराबर है।

00:51:47.280 --> 00:51:55.730
मुमुक्षु: माने नयपूर्वक ही प्रमाण होता है। 
पू. लालचंदभाई: होता है, नियम से। नियम से।
मुमुक्षु: बात एकदम यथार्थ है।

00:51:55.754 --> 00:51:59.138
पू. लालचंदभाई: नय के बिना 
प्रमाण नहीं होता है

00:51:59.162 --> 00:52:06.076
क्योंकि अनेकांत की सिद्धि में 
दो बात लीं सिद्ध करने के लिए 
– प्रमाण, नय दो साधन हैं।

00:52:06.100 --> 00:52:14.226
अकेले प्रमाण से अनेकांत की सिद्धि 
नहीं होती है; दो साधन हैं अनेकांत की 
सिद्धि करने के लिए - प्रमाण और नय।

00:52:14.250 --> 00:52:18.261
दो साधन से अनेकांत की सिद्धि होती है।

00:52:18.285 --> 00:52:26.141
मुमुक्षु: केवल प्रमाण से नहीं? 
पू. लालचंदभाई: नहीं।

00:52:26.165 --> 00:52:37.031
जैसे ये सारा शरीर है, 
प्रमाणज्ञान का विषय, समझो! ये अवयव 
बहुत हैं इसमें, प्रमाणज्ञान का विषय है।

00:52:37.055 --> 00:52:44.054
मगर वो नय के द्वारा ये दायाँ हाथ, 
ये बायाँ हाथ, ये दायाँ पाँव, ये दायी आँख,

00:52:44.078 --> 00:52:50.305
ऐसे प्रत्येक प्रकार से आप एक-एक धर्म को, 
एक-एक धर्म को क्रम-क्रम से देखकर

00:52:50.329 --> 00:52:55.811
एक-एक धर्म की सिद्धि करो, 
फिर युगपद् सबको देखो 
तब अनेकांत होता है।

00:52:55.835 --> 00:53:02.169
परंतु अकेला तुम ये अनेकांत-अनेकांत 
तो हम कहें बायाँ हाथ कि दायाँ हाथ, 
तो उसकी खबर नहीं।

00:53:02.193 --> 00:53:11.897
शरीर को है, मैंने तो शरीर को देखा। 
तो ये अनेकांत झूठा है तुम्हारा। ऐसा है।

00:53:11.921 --> 00:53:15.846
बायें हाथ की खबर नहीं, 
दायें हाथ की खबर (नहीं); 
फिर अनेकांत कहाँ से प्रगट हुआ?

00:53:15.870 --> 00:53:20.061
कि द्रव्य-पर्याय को देखा है, 
द्रव्य कैसा है खबर है? वो खबर नहीं।

00:53:20.085 --> 00:53:28.136
पर्याय कैसी है ये खबर? वो खबर नहीं। 
अनेकांत कहाँ से आया? 
द्रव्यदृष्टि हुए बिना .....

00:53:28.160 --> 00:53:46.278
मुमुक्षु: हर-एक को देखना पड़ेगा। 
पू. लालचंदभाई: हाँ! फिर युगपद् 
सभी धर्मों को देखे तब प्रमाणज्ञान होता है।

00:53:46.302 --> 00:53:50.323
पर्याय को देखना बंद कर और 
द्रव्य को देख, ये सम्यक् एकांत हो गया।

00:53:50.347 --> 00:54:05.205
फिर द्रव्य-पर्याय दोनों को देख 
अनेकांत हो गया।

00:54:05.229 --> 00:54:11.473
ये जयसेन आचार्य भगवान ने 
समंतभद्र आचार्य का श्लोक रखा है 
<b>अनेकान्तोऽप्यनेकान्तः </b>

00:54:11.497 --> 00:54:17.240
बहुत अच्छी बात है, 
मीठी शक्कर जैसी।

00:54:17.264 --> 00:54:22.156
प्रमाण का पक्ष छूट जाए, 
नय के पक्ष में आ जाए, 
पक्षातिक्रांत हो जाए;

00:54:22.180 --> 00:54:47.338
तब प्रमाणज्ञान का ज्ञान हो जाये। 
ये ऐसी लाइन है।

00:54:47.362 --> 00:54:53.051
आशीष का चेहरा देखते हैं किशोरभाई! 
समझ गए?

00:54:53.075 --> 00:54:57.189
मुँह ढँका हो तो किशोर नहीं दिखता, 
किशोर नहीं, अरे आशीष।

00:54:57.213 --> 00:55:07.469
अभी आशीष का मुख देखा ये 
सम्यक् एकांत हो गया; और पूरा शरीर (देखा 
कि) अरे! ये तो आशीष है - ये अनेकांत हुआ।

00:55:07.493 --> 00:55:14.555
आशीष का चेहरा देखे बिना 
आशीष को नहीं पहचान सकते। 
चेहरा देखो तुम।

00:55:14.579 --> 00:55:19.655
ऐसे ज्ञायक को देखो तुम, 
बाद में उसके परिणाम जानने में आते हैं।

00:55:19.679 --> 00:55:23.187
मुमुक्षु: दूसरे भाग को देखो तो 
आशीष को confirm नहीं कर सकते।

00:55:23.211 --> 00:55:26.396
पू. लालचंदभाई: नहीं कर सकते, 
१०० टका आप। हाँ!

00:55:26.420 --> 00:55:35.180
मुमुक्षु: …… चेहरा देखने के बाद 
ही confirm (निश्चित) हो गया 
कि ये आशीष है। बराबर!

00:55:35.204 --> 00:55:39.931
पू. लालचंदभाई: हाँ! 
ऐसे आत्मा को देखो पहले; बाद में 
उसके परिणाम का ज्ञान सम्यक् होगा।

00:55:39.955 --> 00:55:45.020
आत्मा को देखने के सिवाय 
परिणाम का ज्ञान अज्ञान है।

00:55:45.044 --> 00:55:48.260
आशीष को देखना हो 
तो पहले चेहरा देखो कि हाँ ये आशीष आया।

00:55:48.284 --> 00:55:52.712
उसके बिना आपने कैसे नक्की किया भाई? 
कि हाथ से? पैर से? कपड़े से?

00:55:52.736 --> 00:55:58.105
कपड़े तो उसके जैसे दूसरे ने भी पहने हैं, 
आशीष के साथ। 
कपड़े से आशीष का निर्णय नहीं हो सकता।

00:55:58.129 --> 00:56:05.583
हाथ से निर्णय नहीं हो सकता, 
उसके boot (जूते) से निर्णय नहीं होता, 
उसकी चाल से निर्णय नहीं होता।

00:56:05.607 --> 00:56:08.210
मुमुक्षु: आशीष लड़के का नाम है। 
पू. लालचंदभाई: लड़के का नाम है आशीष।

00:56:08.234 --> 00:56:15.199
चेहरा ढाँक दो उसका, 
तो ये दोनों ही ऐसे आयें, 
कि ये भी आशीष, ये भी आशीष?

00:56:15.223 --> 00:56:21.196
कि आपके दो लड़के हैं आशीष? 
दो तो नहीं हैं। तो उसमें आशीष कौन है 
आप पहचान सकते हैं?

00:56:21.220 --> 00:56:24.830
कि चेहरा खोलो तो मैं बताऊँ। 
चेहरा खोल दिया दोनों का।

00:56:24.854 --> 00:56:30.461
अरे! ये आशीष है और ये आशीष नहीं है। 
तो आशीष के चेहरे से आशीष (की पहचान) हो गई।

00:56:30.485 --> 00:56:34.537
तो सारी देह को भी प्रमाण से आशीष, 
सारा आशीष है।

00:56:34.561 --> 00:56:38.406
कोई भाग आशीष बिना का नहीं है। 
सब भाग में आशीष व्यापक है।

00:56:38.430 --> 00:56:48.314
मुमुक्षु: चेहरा देख लिया तो 
बाकी का भी (ज्ञान हुआ कि) आशीष है। 
पू. लालचंदभाई: हाँ! सारा शरीर आशीष है। बोलो!

00:56:48.338 --> 00:56:56.304
मुमुक्षु: कमाल कर ...। 
द्रव्य को देख ले। 
पू. लालचंदभाई: द्रव्य को देख ले।

00:56:56.328 --> 00:56:59.641
मुमुक्षु: प्रमाणज्ञान में .. 
सब अंदर आ जायेगा।
पू. लालचंदभाई: अंदर आ जा।

00:56:59.665 --> 00:57:02.628
एक आत्मा को जाना सब जान लिया।

00:57:02.652 --> 00:57:19.941
अनंत गुण जान लिए, अनंत पर्यायें जान लीं, 
अनंत अपेक्षित धर्म जान लिए, सब जान लिया।

00:57:19.965 --> 00:57:26.076
मुमुक्षु: जैसे ये सूर्य है ना सूर्य। 
सूर्य को देखने से उसमें 
अनंत किरणें छूटती हैं, अनंत।

00:57:26.100 --> 00:57:30.268
पू. लालचंदभाई: बस! जान लेता है। 
मुमुक्षु: सूर्य देखने से 
उसका ज्ञान हो जाता है।

00:57:30.292 --> 00:57:37.872
पू. लालचंदभाई: बस! 
निश्चय को जानो तो व्यवहार 
- किरण को जानता है, अपने आप।

00:57:37.896 --> 00:57:41.486
आत्मा को जानो, 
प्रथम आत्मा को जानो। बस!

00:57:41.510 --> 00:57:47.027
उसके भेद-प्रभेद तो स्वयं जानने 
में आ जाता है। उसमें पुरुषार्थ नहीं है।

00:57:47.051 --> 00:58:00.615
भेद को जानने में पुरुषार्थ नहीं है, 
अभेद को जानने में पुरुषार्थ है।

00:58:00.639 --> 00:58:06.564
चेहरे को जाने बिना तुम लाख रुपया 
बैंक में भरने के लिए नहीं भेजोंगे उसको।

00:58:06.588 --> 00:58:10.832
चेहरा खोल तू, 
आशीष है कि नहीं ये देख लूँ। 
उसके बाद मैं तुझे बैंक में भेजूँ।

00:58:10.856 --> 00:58:25.009
मुमुक्षु: नहीं तो जोखम बड़ा ...... 
नुकसानी है।
पू. लालचंदभाई: नुकसानी है।

00:58:25.033 --> 00:58:35.736
चेहरे से ही नक्की होता है। चेहरा से ही 
उसकी पहचान होती है कि ये किशोरभाई हैं, 
ये कश्मीरीलाल जी हैं, ये बकुलभाई हैं।

00:58:35.760 --> 00:58:40.474
चेहरे से दिखता है। 
केवल हाथ-पैर से निर्णय नहीं होता।

00:58:40.498 --> 00:58:47.636
मुमुक्षु: कपड़े से निर्णय हो तो 
white (सफेद) कपड़ा भी पहनते हैं।
पू. लालचंदभाई: हाँ! तीनों white कपड़े पहनें हैं।

00:58:47.660 --> 00:58:53.844
एक घर में चार लड़के हैं 
तो चारों लड़कों की एक-एक पत्नी हैं। 
समझ गए?

00:58:53.868 --> 00:59:01.231
एक जैसी height (ऊँचाई) 
और एक जैसे कपड़े पहनें हों, 
घूँघट डालकर। समझ गए?

00:59:01.255 --> 00:59:14.378
तो कहें कि भाई 
चेहरा दिखाओ तो खबर पड़े कि 
ये इस लड़के की पत्नी, वो उस लड़के की पत्नी।

00:59:14.402 --> 00:59:22.384
नहीं तो मुश्किल हो जाएगी। 
चेहरा देखे बगैर कैसे (निर्णय) करें? 
आहाहा!

00:59:22.408 --> 00:59:28.254
ऐसे पर्याय को.... 
पर्याय से ढँक गया है घूँघट में। 
पर्याय को जरा दूर कर। आहाहा!

00:59:28.278 --> 00:59:44.269
ये तो मैं भगवान आत्मा हूँ वाह!
हो गया टाइम।

00:59:44.293 --> 01:00:08.134
मुमुक्षु: अनेकांत की सिद्धि नय 
और प्रमाण पूर्वक होती है 
ये चर्चा बहुत अच्छी न्याय आया।

01:00:08.158 --> 01:00:11.966
पू. लालचंदभाई: हमारे आशीष 
और किशोर समझ गए?

01:00:11.990 --> 01:00:21.822
मुमुक्षु: द्रव्य को जाने बिना 
प्रयोजन की सिद्धि नहीं होती। 
प्रमाणज्ञान से देखेगा तो जीव नहीं दिखेगा।

01:00:21.846 --> 01:00:28.939
पू. लालचंदभाई: कोई निर्णय ही नहीं होगा। 
यह भी आत्मा, और ऐसा भी आत्मा, और 
ऐसा आत्मा, और ऐसा आत्मा, और ऐसा आत्मा।

01:00:28.963 --> 01:00:33.502
मुमुक्षु: निश्चय से भाई शुरुआत होती है। 
विशेष सत् है, सामान्य को उसकी अपेक्षा नहीं।

01:00:33.526 --> 01:00:39.283
पू. लालचंदभाई: नहीं। 
विषेश को देखना बंद कर, 
तू सामान्य को देख ले।

01:00:39.307 --> 01:00:42.616
सामान्य को देखने के बाद ये सब 
उसकी पर्यायें हैं - ऐसा ज्ञान हो जाएगा।

01:00:42.640 --> 01:00:53.083
ज्ञान-दर्शन-चारित्र-सुख-वीर्य 
उसके परिणाम जीव के परिणाम हैं, 
ऐसा ख्याल में आ जाएगा।

01:00:53.107 --> 01:00:57.136
जीव एक प्रकार का है, 
परिणाम अनेक प्रकार के हैं;

01:00:57.160 --> 01:01:01.414
जीव अनेक प्रकार का नहीं, 
जीव एक प्रकार का है।

01:01:01.438 --> 01:01:13.680
जीव एक प्रकार का है, 
परिणाम अनेक प्रकार के हैं; 
जीव अनेक प्रकार का नहीं होता।