﻿WEBVTT Oi448

00:01:03.393 --> 00:01:21.876
उनमें एक समयसार
और एक ये नियमसार
ये द्रव्यानुयोग की पराकाष्ठा के शास्त्र हैं।

00:01:21.900 --> 00:01:27.693
जिसमें मुख्यपने
दृष्टि का विषय देने में आया है।

00:01:27.717 --> 00:01:38.729
अनंतकाल से जीव ने ज्ञान के
विषयभूत शास्त्रों का अवलंबन किया;

00:01:38.753 --> 00:01:51.756
दृष्टि प्राप्त होने के बाद जानने के
जो विषय थे उनको मुख्य करके,

00:01:51.780 --> 00:02:04.573
और दृष्टि के विषयभूत जो तत्त्व
और उनको बतानेवाले जो शास्त्र,
उनको गौण करके (किया),

00:02:04.597 --> 00:02:20.529
बाकी सब शास्त्र- धवल, महाधवल आदि
हजारों शास्त्र हैं, परंतु वो दृष्टि प्राप्त
होने के बाद उन्हें ज्ञान का ज्ञेय कहते हैं।

00:02:20.553 --> 00:02:32.738
दृष्टि प्राप्त होने से पहले
परपदार्थ को जानने में रुक जाये,
पर्याय के भेदों को जानने में रुके,

00:02:32.762 --> 00:02:39.756
तो उसको मिथ्यात्व सहित का ज्ञान होता है
परंतु मिथ्यात्व नहीं जाता।

00:02:39.780 --> 00:02:44.067
पंडित होता है परंतु ज्ञानी नहीं होता।

00:02:44.091 --> 00:02:59.200
ज्ञानी होने के लिए तो, दृष्टि निर्मल
होने के लिए तो, दृष्टि का विषय
जो शुद्धात्मा अनादि-अनंत एकरूप है,

00:02:59.224 --> 00:03:06.836
जिसमें पर्यायमात्र का अभाव है,
ऐसा एक सामान्यतत्त्व है।

00:03:06.860 --> 00:03:16.209
जो शुद्धात्मा, जो जीवतत्त्व सामान्य
जिसमें ज्ञान है, दर्शन है, सुख है,
वीर्य है, प्रभुत्व, विभुत्व,

00:03:16.233 --> 00:03:27.969
अनंत-अनंत-अनंत शक्तिओं से
विराजमान परमात्मा अंदर में विराजमान है,
विद्यमान है अभी, अभी हाजराहजूर है।

00:03:27.993 --> 00:03:39.373
जैसे अभी स्वर्ग के देव तो आते नहीं
पंचमकाल में, परंतु यह (मेरा आत्मा)
देवों का भी देव प्रगट हाजराहजूर है।

00:03:39.397 --> 00:03:47.178
परंतु उसको जानने के लोभ में
मिथ्यात्व दृढ़ हो जाता है।

00:03:47.202 --> 00:03:53.898
परंतु आदर करने योग्य भाव
एक आत्मा ही है,
वह ही आश्रय करने योग्य है,

00:03:53.922 --> 00:04:01.125
उसका लक्ष करने योग्य है,
वही एक उपादेय तत्त्व है;
बाकी सब हेय हैं।

00:04:01.149 --> 00:04:09.773
ऐसा जहाँ तक भेदज्ञान न हो
तब तक दृष्टि निर्मल नहीं होती
और दृष्टि निर्मल न हो

00:04:09.797 --> 00:04:16.756
तब तक मोक्षमार्ग के जो दो अवयव हैं,
वो भी प्रगट हो सकते नहीं।

00:04:16.780 --> 00:04:23.640
मोक्षमार्ग का सूत्र है
<b>सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग:</b> 
(तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय १ गाथा १)

00:04:23.664 --> 00:04:28.765
जिसमें प्रथम ही शब्द है
- सम्यग्दर्शन है।

00:04:28.789 --> 00:04:35.498
यदि सम्यग्दर्शन है तो ज्ञान
और चारित्र सम्यक् कहलाते हैं

00:04:35.522 --> 00:04:47.747
परंतु यदि सम्यग्दर्शन नहीं है तो
यह ज्ञान भी अज्ञान है और यह चारित्र
भी कुचारित्र है, सम्यक्चारित्र नहीं है।

00:04:47.771 --> 00:04:55.307
ऐसी अपूर्व बात कुंदकुंदाचार्य
भगवान की देन है यह। आहाहा!

00:04:55.331 --> 00:05:04.516
भगवान महावीर के निर्वाण के बाद;
कल जन्म हुआ था,
आज निर्वाण हुआ, ऐसा समझो;

00:05:04.540 --> 00:05:15.067
तो निर्वाण के बाद के पाँच सौ वर्ष बाद
कुंदकंदाचार्य भगवान का
इस भूमि पर जन्म हुआ।

00:05:15.091 --> 00:05:21.751
तब तो छोटी उम्र में
उन्होंने दीक्षा ली, पूर्व के संस्कार थे।

00:05:21.775 --> 00:05:31.187
इतिहास उनका ऐसा है (कि) कम उम्र
में दीक्षा लेने के बाद उन्हें छोटी
उम्र में आचार्य पद प्राप्त हुआ।

00:05:31.211 --> 00:05:37.933
साधु-संघ ने उन्हें आचार्य पद्वी
प्रदान की, ऐसे समर्थ आचार्य हुए।

00:05:37.957 --> 00:05:43.658
उनके काल में,
भगवान महावीर के निर्वाण के बाद,

00:05:43.682 --> 00:05:55.520
भगवान महावीर के समकालीन उस
समय भी बौद्ध धर्म निकल गया था,
जो पर्याय को ही आत्मा मानते हैं।

00:05:55.544 --> 00:05:58.458
आत्मा जन्म लेता है
और आत्मा मर जाता है, बस!

00:05:58.482 --> 00:06:11.089
पर्याय है उतना ही आत्मा है -
ऐसा माननेवाला क्षणिकवादी ऐसा एक धर्म
निकल चुका था भगवान महावीर के काल में।

00:06:11.113 --> 00:06:20.809
और एक सांख्यमत तो प्रवर्तता ही था,
जिस सांख्यमत की नींव डाली थी
मारिची के जीव ने।

00:06:20.833 --> 00:06:25.356
वो महावीर का (ही) जीव था,
ऋषभदेव भगवान के समय में।

00:06:25.380 --> 00:06:35.813
ऐसा सांख्यमत भी था और बौद्धमत भी था,
ये दो तो थे भगवान महावीर के काल में।

00:06:35.837 --> 00:06:45.400
लेकिन कुंदकुंदाचार्य भगवान के काल
में एक श्वेताम्बर मत भी निकल चुका था।

00:06:45.424 --> 00:06:54.560
उनके काल में उन्होंने देखा कि घोर अँधेरा है।
मोक्षमार्ग का बहुत लोप होता हुआ दिखता था।

00:06:54.584 --> 00:07:04.773
स्वयं को आत्मज्ञान था, आत्मभान था,
निरंतर अतींद्रिय आनंद का भोजन करनेवाले थे।

00:07:04.797 --> 00:07:12.365
लेकिन (उनका) द्रव्य ही कोई इस
प्रकार का था कि उनको करुणा आ गयी,

00:07:12.389 --> 00:07:22.942
बहुत ज़्यादा करुणा आ गयी कि
यह भारत के जीव सत्य के उपदेश बिना
मोक्ष के मार्ग को प्राप्त नहीं कर सकेंगे।

00:07:22.966 --> 00:07:31.205
अभी इस काल में केवली नहीं हैं,
श्रुतकेवली भी नहीं हैं, बारह अंगधारी भी गए,

00:07:31.229 --> 00:07:40.440
दो सौ ढाई सौ वर्ष में तो
बारह अंग (धारियों का) भी विच्छेद
हो गया, उनके काल में। आहाहा!

00:07:40.464 --> 00:07:44.822
तब उन्हें तीर्थंकर भगवान का
विरह महसूस हुआ।

00:07:44.846 --> 00:07:55.993
उसमें कोई घटना ऐसी घटित हो गयी,
अपनी लब्धि से या ऊपर से देव आकर
के उनको वहाँ महाविदेहक्षेत्र में ले गए।

00:07:56.017 --> 00:08:07.831
अभी सीमंधर भगवान विराजते हैं।
उस समय (आचार्य कुंदकुंद)
वहाँ पधारें, ८ दिन रहे।

00:08:07.855 --> 00:08:12.485
चक्रवर्ती ने प्रश्न किया कि ये कौन हैं?

00:08:12.509 --> 00:08:22.045
दिव्यध्वनि में आया कि
ये भारत के समर्थ आचार्य कुंदकुंद हैं,

00:08:22.069 --> 00:08:30.596
और मूल धर्म की प्रभावना
उनके निमित्त से भारत में होगी।

00:08:30.620 --> 00:08:42.462
जिस वक्त ऐसी वाणी खिरी उस वक्त,
अभी भारत में आए हुए
कुछ जीव वहाँ से आए हुए हैं,

00:08:42.486 --> 00:08:50.236
महाविदेहक्षेत्र से यहाँ आए हुए जीव हैं,
वो भी वहाँ थे।

00:08:50.260 --> 00:08:57.565
उन्होंने भी स्वयं देखा है कि
ये कुंदकुंदाचार्य हैं,
ऐसा कोई चमत्कार हो गया।

00:08:57.589 --> 00:09:02.062
८ दिन वहाँ रहे,
दिव्यध्वनि भी साक्षात् सुनी

00:09:02.086 --> 00:09:07.325
और श्रुतकेवलियों के पास खुलासा
भी बहुत तत्त्व का किया।

00:09:07.349 --> 00:09:10.398
तत्त्व का खुलासा तो था,
तत्त्ववेदी तो थे,

00:09:10.422 --> 00:09:17.316
विशिष्ट प्रकार से ज्ञान का उघाड़ इतना
हो गया कि वहाँ से आकर (शास्त्र लिखे)।

00:09:17.340 --> 00:09:24.800
मद्रास से अस्सी मील दूर एक पोन्नूर-हिल है,
वह उनकी तपोभूमि है,

00:09:24.824 --> 00:09:32.662
वहाँ उनके पाद-चरण हैं,
उनके जैसे बड़े चरण अभी कहीं
भी नहीं हैं, इतने बड़े चरण हैं। आहाहा!

00:09:32.686 --> 00:09:40.120
उसके ऊपर एक पेड़ था
और उस पेड़ से फूल खिरते थे उनके ऊपर।
आहाहा!

00:09:40.144 --> 00:09:43.867
उस पेड़ से फूल खिरते थे
ये मैंने भी देखा है।

00:09:43.891 --> 00:09:54.329
बाद में वह पेड़ नष्ट हो गया,
अभी फूल खिरते नहीं हैं।
चम्पा का पेड़ था।

00:09:54.353 --> 00:10:01.258
फिर आकर उन्होंने शास्त्र लिखे
- समयसार, नियमसार, पंचास्तिकाय,

00:10:01.282 --> 00:10:10.413
प्रवचनसार, अष्टपाहुड़ आदि
चौंसठ पाहुड़ लिखे थे लेकिन
अभी मात्र थोड़े उपलब्ध हैं।

00:10:10.437 --> 00:10:19.893
उन द्रव्यानुयोग के शास्त्रों में, द्रव्यानुयोग
- जिसमें द्रव्य सामान्य, उपादेयरूप तत्त्व
की व्याख्या विशेष होती है -

00:10:19.917 --> 00:10:23.187
उसको द्रव्यानुयोग कहने में आता है।

00:10:23.211 --> 00:10:29.605
चरणानुयोग साधक की
व्यवहार चारित्र की मुख्यता से
लिखा गया है, वो चरणानुयोग है।

00:10:29.629 --> 00:10:36.462
करणानुयोग - जीव के सूक्ष्म परिणाम और
उसमें किस प्रकार के कर्म के निमित्त होते हैं,

00:10:36.486 --> 00:10:41.258
ऐसा निमित्त-नैमित्तिक बतानेवाले सूक्ष्म
परिणाम वह करणानुयोग कहलाता है।

00:10:41.282 --> 00:10:51.191
प्रथमानुयोग - जो महापुरुष हो गये उनके
जीवन-चारित्र के जैसे, वह पढ़कर भी
उसे प्रेरणा हो की मुझे भी ऐसा होना है!

00:10:51.215 --> 00:10:59.596
चारों अनुयोग उसमें भी द्रव्यानुयोग
उत्कृष्ट है, भेदज्ञान की भी
पराकाष्ठा जिसमें लिखी हुई है।

00:10:59.620 --> 00:11:10.653
जिसमें शुद्धात्मा का स्वरूप शुद्धरूप से
निरुपण किया है, मिलावट के बिना, ऐसा
द्रव्यानुयोग का यह नियमसार शास्त्र है।

00:11:10.677 --> 00:11:15.533
समयसार लिखने के बाद
नियमसार शास्त्र लिखा गया है।

00:11:15.557 --> 00:11:23.929
स्वयं लिखते हैं कि मैं <b>निजभावना</b>
के लिए यह <b>नियमसार शास्त्र</b>
की रचना करता हूँ (नियमसार गाथा १८७)।

00:11:23.953 --> 00:11:32.396
समयसार तो अप्रतिबुद्ध अज्ञानी जीवों
पर करुणा आयी और नवतत्त्वों
का विस्तार उसमें किया,

00:11:32.420 --> 00:11:37.782
उसमें तो बहुत जीवों को प्राप्ति होगी।
यह तो अपने लिए लिखा है।

00:11:37.806 --> 00:11:43.222
अपनी भावना के लिए जो शास्त्र लिखा है,
ये दूसरों को समझाने से ज़्यादा

00:11:43.246 --> 00:11:49.240
अपनी भावना का शास्त्र कोई अपेक्षा
से बहुत सूक्ष्म कहने में आया है।

00:11:49.264 --> 00:12:02.809
उसमें पर का लक्ष नहीं है,
उसमें दूसरों को समझाने का आशय नहीं है,
परंतु स्वयं के तत्त्व को स्वयं घूँटते हैं, ऐसा।

00:12:02.833 --> 00:12:09.636
मेरी भावना के लिए मैंने इस शास्त्र
की रचना की है, ये स्वयं लिख गए हैं।

00:12:09.660 --> 00:12:18.596
इस नियमसार शास्त्र में यह
एक शुद्धभाव अधिकार ऊँचे में ऊँचा है

00:12:18.620 --> 00:12:27.920
और एक पाँच रतन की गाथा है
- परमार्थ प्रतिक्रमण
- ये (दोनों) सार है, सार।

00:12:27.944 --> 00:12:32.832
जैसे गन्ना होता है बड़ा लंबा हो
और उसका मूल (गाँठ)

00:12:32.856 --> 00:12:40.463
और उसका आगे का भाग निकाल दें
तो बीच की जो कतली होती है,
वह एकदम मीठास से भरी हुई;

00:12:40.487 --> 00:12:44.507
पूरे-पूरा रस से भरपूर,
उसमें कषायला स्वाद भी नहीं होता

00:12:44.531 --> 00:12:49.374
और दूसरा स्वाद भी नहीं होता,
सीधी कतली (मिठास) उसकी;

00:12:49.398 --> 00:12:56.752
इस प्रकार पूरे नियमसार में एक
यह कतली है - शुद्धभाव अधिकार।

00:12:56.776 --> 00:13:08.449
शुद्धभाव अधिकार यानि शुद्धात्मा।
सब आत्मा शुद्ध ही हैं, तीनों काल शुद्ध हैं।

00:13:08.473 --> 00:13:16.458
भूतकाल में अशुद्ध हुआ नहीं,
वर्तमान काल में,
मिथ्यात्व की अवस्था के काल में,

00:13:16.482 --> 00:13:23.454
अशुद्ध पर्याय के सद्भाव में;
शुद्धात्मा ऐसा का ऐसा विराजमान है,
सिद्ध समान!

00:13:23.478 --> 00:13:31.445
किंचित् मात्र मैला हुआ नहीं,
अशुद्ध हुआ नहीं। आहाहा!

00:13:31.469 --> 00:13:43.503
यह तो पर्याय का लक्ष छोड़े
और द्रव्य का लक्ष करे उसको
साक्षात् खबर पड़े - ऐसी बात है।

00:13:43.527 --> 00:13:53.552
जैसे ये नियमसार शास्त्र अपनी
भावना के अर्थ लिखने में आया है,

00:13:53.576 --> 00:14:02.356
वैसे हमारा आवागमन हिम्मतनगर में,
हमारे स्वाध्याय के लिए हम आयें है।

00:14:02.380 --> 00:14:08.654
हमारा कोई ऐसा आशय नहीं कि
हम किसी को समझा दें, व्याख्यान दें,

00:14:08.678 --> 00:14:13.800
मगर यहाँ हैं तो सामान्य तरीके से
ऐसा भाव भी आता है।

00:14:13.824 --> 00:14:19.334
तो (एक) घंटा मैं वाँचू, (एक) घंटा बहन वाँचें;
सब बातें हमारे राजकोट में हो गयी हैं

00:14:19.358 --> 00:14:28.032
और मीठाभाई को कहा था कि
‘देखो भाई!
हम तो हमारे स्वाध्याय के लिए आते हैं।

00:14:28.056 --> 00:14:33.316
आपका किसी भी प्रकार आग्रह होगा
तो हम चले जायेंगे।’

00:14:33.340 --> 00:14:42.658
(तो मीठाभाई ने कहा) 'आपकी अनुकूलता
हो तो आप दो घंटा देना और न दे सकें
तो भी कुछ नहीं, लेकिन आप आओ'।

00:14:42.682 --> 00:14:48.503
इसलिए हम भी हमारे हित के लिए स्वाध्याय
के लिए, घोलन के लिए यहाँ (आयें है)।

00:14:48.527 --> 00:14:56.160
यहाँ लायक जीव है, वातावरण, मंडल,
मुमुक्षु-मंडल, वातावरण बहुत अच्छा है,

00:14:56.184 --> 00:15:01.592
हमने कई बार आकर के देखा है,
इसलिए हमें यहाँ आने का भाव होता है।

00:15:01.616 --> 00:15:06.534
मुमुक्षु: साहब! आपकी हाज़िरी में
अभी भी हमको तत्त्व स्फुरायमान
रहता है, आपकी हाज़िरी में ही।

00:15:06.558 --> 00:15:10.938
उसका भी हमको गौरव है।

00:15:10.962 --> 00:15:14.543
पू. लालचंदभाई: अर्थात् किसी
दूसरी अपेक्षा से हम आए नहीं हैं।

00:15:14.567 --> 00:15:21.736
बाहर से भाई आना चाहें
अपने हित के लिए, तो ख़ुशी से
पधारें, हमें कोई परेशानी नहीं है,

00:15:21.760 --> 00:15:27.147
हमारी सबको (आने की) छुट्टी है।
हज़ारों लाखों लोग भले आयें
कोई सवाल नहीं है।

00:15:27.171 --> 00:15:33.845
परंतु हम तो हमारे स्वाध्याय के लिए
(आए हैं), दूसरा कोई आशय हमारा नहीं है।

00:15:33.869 --> 00:15:43.576
इतना प्रभावना का भाव आ जाता है
कि ये गुरुदेव ने ४५ साल मेहनत करके,

00:15:43.600 --> 00:15:50.786
नादुरस्त स्वास्थ्य होने पर भी
४५ साल तक जो बोध दिया है,

00:15:50.810 --> 00:16:05.849
यह बोध तत्काल - त्वरा से नष्ट न हो
और लम्बे समय (तक) थोड़ा चले -
ये भावना से वाणी खिरती है।

00:16:05.873 --> 00:16:12.059
मुमुक्षु: हाँ जी! पंचम आरे (काल) के अंत
तक चलेगा इसकी नींव आपने डाल दी।

00:16:12.083 --> 00:16:15.029
पू. लालचंदभाई: उनका कहा हुआ 
तत्त्व ही हम कहते हैं।

00:16:15.053 --> 00:16:19.399
हमारे घर की कोई बात
आज तक हमने की नहीं।

00:16:19.423 --> 00:16:25.376
बाद में हम कहे और फिर कोई न माने,
न (अच्छी) लगे तो वह तो उसकी योग्यता है।

00:16:25.400 --> 00:16:30.220
बाद में वही जीव जब (प्रवचन रत्नाकर
के) ग्यारह भाग पढ़ता है,
तब (वही जीव) अभी कहता है हो,

00:16:30.244 --> 00:16:35.124
कि भले हमने पूर्व में, लालूभाई
की टीका पूर्व हमने करते थे
लेकिन ये तो गुरुदेव ने कहा है,

00:16:35.148 --> 00:16:39.082
देखो इस भाग में यह लिखा है,
देखो इस भाग में ऐसा,
स्वयं कबूल करते हैं।

00:16:39.106 --> 00:16:45.417
ये तो जो विरोध करनेवाले हों न,
वे भी अगर सज्जन हों न, सज्जन आहाहा!

00:16:45.441 --> 00:16:50.549
यह तो गुरुदेव कह गए थे वो ही
लालूभाई कहते हैं, संध्याबेन कहती हैं,

00:16:50.573 --> 00:16:55.827
कोई घर का तो कहते नहीं हैं,
ऐसा विश्वास हो जाये। आहाहा!

00:16:55.851 --> 00:17:06.943
हमें तो उनसे मिला है और हम हमारा
घोलन मौन से करते हैं और इस वाणी
द्वारा भी हमारा स्वाध्याय करते हैं।

00:17:06.967 --> 00:17:13.496
दूसरे सुने तो भले सुने
और प्राप्त कर ले।

00:17:13.520 --> 00:17:25.728
अपूर्व शास्त्र, अपूर्व अधिकार!
शास्त्र भी अपूर्व और शुद्धभाव भी अपूर्व है।

00:17:25.752 --> 00:17:34.196
जैसे समयसार का अजीव अधिकार है,
समयसार का जीव और अजीव अधिकार है।

00:17:34.220 --> 00:17:38.166
समयसार के जीव अधिकार
अस्ति से कहने में आया है

00:17:38.190 --> 00:17:44.842
जीव का स्वरूप, जीव का स्वरूप
कहने में आया ३८ गाथा तक,

00:17:44.866 --> 00:17:52.814
और बाद में ३९ गाथा से ६८ गाथा तक
जीव का ही स्वरूप कहने में आया
लेकिन नास्ति से।

00:17:52.838 --> 00:17:58.911
एक विधि से - अस्ति से
और दूसरा अधिकार है नास्ति से।

00:17:58.935 --> 00:18:04.184
ऐसा अजीव अधिकार है कि ये सब
अजीव हैं, अजीव हैं, अजीव हैं, अजीव हैं।

00:18:04.208 --> 00:18:11.399
यह ही बात इस शुद्धभाव अधिकार में है
कि जीव में यह नहीं, जीव में
यह नहीं, जीव में यह नहीं।

00:18:11.423 --> 00:18:16.176
ऐसा ही इसका अधिकार है।
अजीव अधिकार भी ऊँचा है।

00:18:16.200 --> 00:18:21.771
अजीव में जीवपने की भ्रांति
रह जाती हो, तो जो अजीव को जाने,

00:18:21.795 --> 00:18:25.838
अजीव को (यदि) अजीवपने जाने
तो जीव की भ्रांति निकल जाती है।

00:18:25.862 --> 00:18:28.431
अजीव को जीव माना है।

00:18:28.455 --> 00:18:33.183
अनंतकाल से देह को जीव मानता है,
कर्म को जीव मानता है,
राग को जीव मानता है,

00:18:33.207 --> 00:18:39.246
पर्याय को जीव मानता है;
परद्रव्य को जीव मानता है।
पर्याय यानि परद्रव्य। आहाहा!

00:18:39.270 --> 00:18:48.022
अलौकिक! महाभाग्य हो तो कुंदकुंद
की वाणी कान पर आती है। आहाहा!

00:18:48.046 --> 00:18:54.299
सब तुझे मिलेगा मगर जिनेंद्र
भगवान की वाणी, कुंदकुंद की वाणी,

00:18:54.323 --> 00:19:03.252
उसका योग मिलना वो भी
चक्रवर्ती के पुण्य से भी पुण्य बढ़ जाए
तब यह वाणी कान पर आती है,

00:19:03.276 --> 00:19:07.526
जो कि परम हित में निमित्त होती है।
आहाहा!

00:19:07.550 --> 00:19:15.086
भव का अंत आ जाए ऐसी वाणी है।
कुंदकुंद की वाणी यानि ख़तम।
आहाहा!

00:19:15.110 --> 00:19:17.819
भगवान महावीर के बाद अँधेरा हो गया था।

00:19:17.843 --> 00:19:23.509
पाँच सौ साल के बाद उदय हुआ
जैसे सूर्य का उदय होता है,
वैसे कुंदकुंद भगवान का उदय हुआ।

00:19:23.533 --> 00:19:28.219
अपने लिए उदय हुआ,
अपने लिए (वाणी) वह लेकर आए

00:19:28.243 --> 00:19:36.766
और हम (सीधे) समझ न सकें इसके लिए
गुरुदेव को यहाँ भेजा सीमन्धर भगवान ने

00:19:36.790 --> 00:19:42.458
कि ‘जाओ! वहाँ कुंदकुंद की वाणी का
धर्म फैलाओ' (ऐसा) वाणी में से वहाँ आया।

00:19:42.482 --> 00:19:50.517
सुननेवाले थे वहाँ, (उनमें से) एक से ज़्यादा,
एक से ज़्यादा जीव (महाविदेह से)
अभी यहाँ आए हैं आहाहा!

00:19:50.541 --> 00:19:58.059
श्रद्धा न आवे, क्या हो?
एक से ज़्यादा जीव..

00:19:58.083 --> 00:20:05.771
कुंदकुंद भगवान वहाँ पधारे थे
तब गुरुदेव वहाँ थे,
स्वयं राजकुमार थे। आहाहा!

00:20:05.795 --> 00:20:11.901
और दिव्यध्वनि में आया।
चक्रवर्ती ने पूछा

00:20:11.925 --> 00:20:18.221
कि इस वक्त इस सभा में कोई
भावी तीर्थंकर होनेवाला जीव है कि नहीं?

00:20:18.245 --> 00:20:25.989
तब वाणी में आया राजकुमार
सूर्यकीर्ति नामक तीर्थंकर होंगे।

00:20:26.013 --> 00:20:34.179
यह शत-प्रतिशत सत्य बात है। आहाहा!
मानो या न मानो ये तो सत्य ही है।

00:20:34.203 --> 00:20:40.886
ऐसे गुरुदेव यहाँ पधारे
और उन्होंने समयसार का इतना
विस्तार किया तो हम समझ सके।

00:20:40.910 --> 00:20:45.741
नहीं तो समयसार और उसकी
संस्कृत टीका हम समझ नहीं सकते थे।

00:20:45.765 --> 00:20:49.832
अठारह सौ वर्ष तक तो
उसका अनुवाद नहीं हुआ।

00:20:49.856 --> 00:21:01.494
यह दो सौ वर्ष में ही उसका अनुवाद हुआ,
हिंदी में, जयचंद पंडित ने जयपुर में अनुवाद
किया, उनका भी हम पर उपकार है।

00:21:01.518 --> 00:21:06.866
और इसका अनुवाद अपने
पंडित हिम्मतभाई ने गुजराती में किया,

00:21:06.890 --> 00:21:11.334
उनका भी गुजराती समाज
ऊपर उपकार है, अपने ऊपर,

00:21:11.358 --> 00:21:18.465
क्योंकि जितना मातृभाषा में
जो भावभासन होता है, वह अन्य
भाषाओं में उतना भावभासन नहीं होता।

00:21:18.489 --> 00:21:22.802
जैसे हिंदीभाषी, भाई कहते हैं कि
हिंदी बोलो, हिंदी बोलो, उसका अर्थ क्या?

00:21:22.826 --> 00:21:28.391
कि गुजराती में ख्याल नहीं आता है
मगर हिंदी में ज़्यादा ख्याल में आता है।

00:21:28.415 --> 00:21:32.846
यह तो स्वाभाविक है।
वो तो स्वाभाविक (बात है की)
मातृभाषा में ज़्यादा ख्याल आ जाता है।

00:21:32.870 --> 00:21:40.123
तो इसमें ये शुद्धभाव अधिकार
बढ़िया से बढ़िया अधिकार है। आहाहा!

00:21:40.147 --> 00:21:56.272
सम्यग्दर्शन का हेतु हो जाए, आहाहा!
या तो सम्यग्दर्शन की पात्रता बन
जाए, दो भाव इसमें हैं। आहाहा!

00:21:56.296 --> 00:22:01.373
क्या कहा? या तो प्रत्यक्ष सम्यग्दर्शन
होता है, इसमें निमित्त हो;

00:22:01.397 --> 00:22:06.847
और या कोई अपूर्व निर्णय आ जाए
उसके बाद में सम्यग्दर्शन होता है।

00:22:06.871 --> 00:22:13.374
इन दोनों भाव में निमित्त होनेवाला
यह एक शास्त्र और उसमें भी
यह शुद्धभाव अधिकार है।

00:22:13.398 --> 00:22:25.482
मैं मुंबई जब कुछ वर्षों के लिए गया;
उसके बाद मेरा मुंबई छोड़कर
राजकोट (वापस) आने का हुआ;

00:22:25.506 --> 00:22:31.266
तब यह शुद्धभाव अधिकार लिया था
वहाँ मुंबई में।

00:22:31.290 --> 00:22:38.421
इस शुद्धभाव अधिकार के दस
व्याख्यान (हुए, उसकी) टेप हो गयी है।

00:22:38.445 --> 00:22:49.590
शांतिभाई झवेरी का पुत्र तत्त्व-रसिक है,
पंकज, उसने दस टेप सम्भाल कर रखी है।
हीरे का व्यापारी है।

00:22:49.614 --> 00:22:55.709
(पंकज:) 'मैं हीरे की दरकार नहीं करता,
इतनी ये टेप तिजोरी में संभालकर रखी है।
यह टेप मैं किसी को देता नहीं (हूँ)'।

00:22:55.733 --> 00:23:03.271
कोई कहे कि सुनने के लिए (दो, तो)
(पंकज:) 'नहीं। मैं कॉपी करके दे
सकता हूँ। परंतु यह पूँजी मेरी है'।

00:23:03.295 --> 00:23:08.520
इतना तो तिजोरी में रखकर सम्हाल
करता है, बोलो। ऐसा अधिकार!

00:23:08.544 --> 00:23:12.361
कोई एक क्षण था, एक क्षण था।
आहाहा! 

00:23:12.385 --> 00:23:18.947
इस शब्द का कर्ता आत्मा तो है नहीं,
जिस काल में जो पर्याय होने योग्य
हो शब्द की, वह होती है।

00:23:18.971 --> 00:23:25.543
भाव भी होने योग्य होता है,
उसका भी कर्ता नहीं तो शब्द की पर्याय
का तो आत्मा कहाँ से कर्ता होवे?

00:23:25.567 --> 00:23:32.427
(ऐसा) अपूर्व अधिकार है!
पूरा अधिकार बहुत ऊँचा है,
इसका बहुमान करना।

00:23:32.451 --> 00:23:35.036
मैं जानता हूँ
- यह निकाल देना मन में से।

00:23:35.060 --> 00:23:43.216
कुछ जानता नहीं तो यह जानने में
आएगा और किसी भी प्रकार से
कोने में व्यवहार का पक्ष हो

00:23:43.240 --> 00:23:48.165
तो अभी कुछ समय के लिए उसको
deposit (जमा) रखना, बाहर में। आहाहा!

00:23:48.189 --> 00:23:52.983
पीछे ठीक लगे तो फेंक देना
समुद्र में, बाद में। आहाहा!

00:23:53.007 --> 00:23:57.903
परंतु अभी तो आप deposit
रखना अपनी मान्यता को। आहाहा!

00:23:57.927 --> 00:24:02.800
(अपनी) कल्पना को deposit रखना
कि शुभभाव करते-करते धर्म होता है

00:24:02.824 --> 00:24:06.378
और ऐसा होता है और ऐसा होता है
और पर्याय सहित ही द्रव्य होता है

00:24:06.402 --> 00:24:08.856
और रहित नहीं होता
- ये सब कल्पनायें छोड़ देना।

00:24:08.880 --> 00:24:14.169
यह कुंदकुंद की वाणी है,
यह साक्षात् तीर्थंकर भगवान की वाणी है,

00:24:14.193 --> 00:24:21.218
सीमंधर भगवान की वाणी है
इसका बहुमान करना। जो बहुमान
करेगा उसका भी काम होगा।

00:24:21.242 --> 00:24:26.018
आत्मा का बहुमान होगा तो तो
साक्षात् अभी काम हो जाएगा।

00:24:26.042 --> 00:24:33.596
परंतु जिसको इस कुंदकुंद भगवान की
वाणी का बहुमान आएगा, वो तो पात्र जीव है।

00:24:33.620 --> 00:24:37.920
यह अधिकार
अब हम शुरू करते हैं आहाहा!

00:24:37.944 --> 00:24:44.725
प्रथम तो जो हमें बोध देते हैं
उनका उपकार हमें मानना चाहिए।

00:24:44.749 --> 00:24:50.192
सज्जन उपकार को भूलता नहीं।
आहाहा!

00:24:50.216 --> 00:24:57.769
तीर्थंकर भगवान की वाणी, गणधर,
कुंदकुंद भगवान और गुरुदेव तक
सभी हमारे उपकारी हैं आहाहा!

00:24:57.793 --> 00:25:01.956
कोई प्रत्यक्ष उपकारी,
कोई परोक्ष उपकारी।

00:25:01.980 --> 00:25:07.303
कोई इस भव में उपकारी,
कोई पूर्व भव में उपकारी।
आहाहा! ऐसी परंपरा (चालू है)।

00:25:07.327 --> 00:25:13.414
आत्मा तो अनादि का है न?
आज का कहाँ है? आहाहा! 

00:25:13.438 --> 00:25:23.494
यहाँ ३८ गाथा लेते हैं।
<b>अब शुद्धभाव अधिकार कहा जाता है।</b>
शुद्धभाव यानि शुद्धात्मा।

00:25:23.518 --> 00:25:28.987
आत्मा तीनोंकाल शुद्ध है।
कभी अशुद्ध हुआ ही नहीं।

00:25:29.011 --> 00:25:35.716
पहले अशुद्ध था और
अभी शुद्ध हुआ है - ऐसा नहीं है।

00:25:35.740 --> 00:25:48.098
परिणाम में अशुद्धता होने पर भी,
पानी की मलिन पर्याय होने पर भी, पानी का
जो मूल स्वभाव है, जल का, वो तो स्वच्छ ही है।

00:25:48.122 --> 00:25:52.143
पचास प्रतिशत मलिन और
पचास प्रतिशत स्वच्छ - ऐसा नहीं है।

00:25:52.167 --> 00:25:59.654
पूरे सौ प्रतिशत पानी का जो
मूलस्वभाव जल का है वो स्वच्छ ही है

00:25:59.678 --> 00:26:08.427
और पानी की, जल की जो
एक समय की पर्याय मिट्टी के संग
से उत्पन्न हुई योग्यतानुसार,

00:26:08.451 --> 00:26:13.009
वो भी एक समय के लिए है,
दूसरे समय में वो भी निर्मल हो जाती है।

00:26:13.033 --> 00:26:21.938
ऐसी मलिन पर्याय के सद्भाव में भी पानी,
जल, नीर स्वच्छ-स्वच्छ बेहद स्वच्छ होता है।

00:26:21.962 --> 00:26:30.605
ऐसे भगवान आत्मा अनादिकाल से
अपने आत्मा को भूलकर, देह मेरा, कुटुम्ब
मेरा, लड़का मेरा, ये मेरा, राग मेरा।

00:26:30.629 --> 00:26:36.925
भले मेरा मेरा करे परिणाम अशुद्ध हो गया,
भले अशुद्ध हो गया, चिंता मत कर।

00:26:36.949 --> 00:26:42.938
तू परिणाम की चिंता छोड़ दे,
परिणाम तेरे में है ही नहीं है। आहाहा!

00:26:42.962 --> 00:26:46.489
जो तेरे में नहीं है
उसकी चिंता तू क्यों करता है?

00:26:46.513 --> 00:26:57.360
और जो तेरे में हैं उसकी
तू फ़िकर कर कि मैं क्या हूँ।
आहाहा! अपूर्व अधिकार है।

00:26:57.384 --> 00:27:03.089
परिणाम की चिंता करता है,
परिणाम को देखो भाई,
परिणाम को (देखो)। आहाहा!

00:27:03.113 --> 00:27:08.947
परिणाम को देखने से, बार-बार देखने
से मिथ्यात्व दृढ़ हो जाता है! आहाहा!

00:27:08.971 --> 00:27:16.889
मिथ्यात्व उत्पन्न तो होता ही है,
मगर बार-बार देखने से मिथ्यात्व
दृढ़ हो जाता है! आहाहा!

00:27:16.913 --> 00:27:23.289
और परिणाम को गौण करके,
परिणाम की चिंता छोड़कर के,

00:27:23.313 --> 00:27:29.240
परिणाम को ज्ञान में ज्ञेय बनाना
छोड़कर करके अपने मानसिकज्ञान में,

00:27:29.264 --> 00:27:35.596
आत्मिकज्ञान तो बाद में होता है,
मानसिकज्ञान में (ऐसा ले कि)
मेरा आत्मा तो शुद्ध ही है न।

00:27:35.620 --> 00:27:40.814
मैं तो परमात्मा हूँ न?
अभी परमात्मा हूँ। मैं कृत्कृत्य हूँ।

00:27:40.838 --> 00:27:48.567
करने का तो प्रश्न है नहीं,
मेरे में नहीं है। आहाहा!
मैं तो अभी शुद्ध परमात्मा हूँ।

00:27:48.591 --> 00:27:56.872
ऐसे बार-बार द्रव्य स्वभाव का विचार
करने से मिथ्यात्व गलता है और
अनुभव से टल जाता है। आहाहा!

00:27:56.896 --> 00:28:01.425
और इधर अनुभव होने के बाद
तू पर्याय में देख! देख!

00:28:01.449 --> 00:28:07.614
मिथ्यात्व कहाँ गया? मिथ्यात्व
पर्याय में दिखाई ही नहीं देता है।

00:28:07.638 --> 00:28:12.016
धुआँ है ना धुआँ, 
धुआँ थोड़ा आता है अग्नि में,

00:28:12.040 --> 00:28:17.676
थोड़े देर के बाद धुआँ कहाँ गया? 
धुआँ तो दिखता नहीं है, गुम हो गया।

00:28:17.700 --> 00:28:29.209
ऐसे मिथ्यात्व के परिणाम, अशुद्धपरिणाम,
द्रव्य पर दृष्टि देने के बाद पर्याय को देख, तो
सम्यग्दर्शन है - ऐसा ज्ञान में ज्ञेय हो जाएगा।

00:28:29.233 --> 00:28:39.716
मिथ्यात्व ज्ञान का ज्ञेय नहीं होगा।
राग ज्ञेय बनना छूट गया, परमात्मा
उपादेयभूत ज्ञेय बन गया आहाहा!

00:28:39.740 --> 00:28:43.849
तो पर्याय को देखता है
तो पर्याय भी निर्मल है।

00:28:43.873 --> 00:28:48.056
द्रव्य निर्मल और पर्याय भी निर्मल,
द्रव्य शुद्ध और पर्याय भी शुद्ध,

00:28:48.080 --> 00:28:51.707
<b>कारणतत्त्व</b> शुद्ध 
<b>और कार्यतत्त्व</b> भी 
<b>शुद्ध है</b> (नियमसार कलश ७२);

00:28:51.731 --> 00:28:58.529
ऐसा ज्ञानी बनने के बाद दोनों
तत्त्व शुद्ध दिखाई देते हैं। आहाहा!

00:28:58.553 --> 00:29:06.605
ऐसा अपूर्व अधिकार है।
जितनी भी प्रशंसा करें उतनी कम है।
ओहोहो!

00:29:06.629 --> 00:29:14.305
शब्दों से प्रशंसा हो सकती नहीं है,
वो तो भाव से होती है। आहाहा!

00:29:14.329 --> 00:29:24.089
ये शुद्धभाव अधिकार
बढ़िया से बढ़िया अधिकार है।

00:29:24.113 --> 00:29:34.032
<b>जीवादिबहित्तच्चं हेयमुवादेयमप्पणो अप्पा।</b>
<b>कम्मोपाधिसमुब्भवगुणपज्जाएहिं वदिरित्तो॥३८॥</b>

00:29:34.056 --> 00:30:04.776
साथ में बोलो!
<b>है हेय सब बहितत्त्व ये जीवादि, आत्मा ग्राह्य है।</b>
<b>अरु कर्मसे उत्पन्न गुणपर्यायसे वह बाह्य है॥३८॥</b>

00:30:04.800 --> 00:30:15.529
ओहोहो!
समर्थ आचार्य के सिवा कौन कह सके? ..

00:30:15.553 --> 00:30:30.434
मूल गाथा (<b>अन्वयार्थ</b>)-
<b>जीवादि</b> जीव, अजीव,
आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष

00:30:30.458 --> 00:30:38.094
ये जीवादि सात तत्त्व,
पुण्य-पाप मिला दो तो नौ पदार्थ हो जाते हैं।
मगर इधर सात तत्त्व की बात करते हैं।

00:30:38.118 --> 00:30:51.816
<b>जीवादि बाह्यतत्त्व</b> 
यानि शुद्धात्मा से बाहर हैं, शुद्धात्मा
में सात तत्त्वों का प्रवेश नहीं है।

00:30:51.840 --> 00:30:59.618
मोक्ष की पर्याय का जहाँ प्रवेश नहीं है,
तो मिथ्यात्व का प्रवेश तो कहाँ से आ जावे?

00:30:59.642 --> 00:31:10.409
स्वजाति का परिणाम भी अंदर में प्रवेश
नहीं कर सकता है तो विजाति का परिणाम
का तो अंदर में प्रवेश होता ही नहीं है।

00:31:10.433 --> 00:31:19.463
बाह्यतत्त्व है, बहिर्तत्त्व है, बाहर रहता है;
शुद्धात्मा में अंदर में वो परिणाम आता नहीं है;

00:31:19.487 --> 00:31:27.560
नित्य में अनित्य पर्याय अंदर में आती नहीं है
और कर्म-सापेक्ष जो परिणाम है,

00:31:27.584 --> 00:31:33.165
वह कर्म-निरपेक्ष परमात्मा के स्वभाव
के अंदर आ सकती नहीं है।

00:31:33.189 --> 00:31:42.814
शांति से विचारने जैसी बात है।
एक था राजा और एक थी रानी - ऐसा नहीं है।

00:31:42.838 --> 00:31:55.005
थोड़ा शांति से अपने हित के लिए,
एकाग्रचित्त से स्वाध्याय करने से
बड़ा लाभ होगा। आहाहा!

00:31:55.029 --> 00:32:05.747
एक घंटे के लिए तो सब बाहर का
विचार बंद करना चाहिए, इतनी तो
मानसिक एकाग्रता चाहिए, मानसिक एकाग्रता।

00:32:05.771 --> 00:32:15.254
आत्मिक एकाग्रता तो बाद में आती है। कोई
दुकान का विचार, घर का विचार, कोई बीमार
हो - कोई विचार नहीं आवे। आहाहा!

00:32:15.278 --> 00:32:17.760
कि इधर से जाने के बाद
ઉઘરાણી (बकाया ऋणों की वसूली) करूँगा

00:32:17.784 --> 00:32:20.938
और बेंक में जाना,
बिल्कुल विचार मत करना।

00:32:20.962 --> 00:32:29.467
केवल आत्मा के समीप रहकर
आत्मा का विचार आये कि कुंदकुंदाचार्य
भगवान मेरे स्वरूप का वर्णन करते हैं,

00:32:29.491 --> 00:32:35.160
मेरा स्वरूप कैसा है (यह) समझने के
लिए मैं इधर स्वाध्याय भवन में आया हूँ।

00:32:35.184 --> 00:32:40.405
बस! एक घंटा यदि एकाग्रता होवे
तो बहुत प्राप्ति हो जाती है।

00:32:40.429 --> 00:32:48.534
<b>जीवादि</b> ये सात तत्त्व - जीव,
अजीव, आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष
- ये सात तत्त्व

00:32:48.558 --> 00:32:52.165
<b>बाह्यतत्त्व हेय हैं;</b>
उसका विस्तार अभी नीचे आएगा।

00:32:52.189 --> 00:32:56.376
<b>हेय हैं</b> यानि लक्ष करने
योग्य नहीं है, यानि उपादेय नहीं हैं;

00:32:56.400 --> 00:33:02.554
हेय का अर्थ द्वेषवाचक नहीं है;
हेय का अर्थ उपेक्षावाचक है।

00:33:02.578 --> 00:33:07.867
ये परिणाम तो नाशवान है
वो मैं नहीं हूँ, मैं तो अविनाशी हूँ।

00:33:07.891 --> 00:33:16.120
ये सातों तत्त्व हैं नाशवान, क्षणिक,
कर्म-सापेक्ष हैं; मैं तो अनादि-अनंत,
नित्य ध्रुव परमात्मा हूँ।

00:33:16.144 --> 00:33:25.232
यह <b>हेय हैं</b> और <b>कर्मोपाधिजनित</b> 
देखो! कर्म की उपाधि से, संयोग से जनित

00:33:25.256 --> 00:33:34.907
<b>गुणपर्यायोंसे</b> यह गुणों की
जो अवस्था होती है पर्याय, उससे
<b>व्यतिरिक्त</b> यानि रहित आत्मा हूँ।

00:33:34.931 --> 00:33:44.223
ये (जो) आत्मा है यह पर्याय मात्र से रहित है
- ऐसा <b>आत्मा, आत्माको उपादेय है।</b>

00:33:44.247 --> 00:33:52.134
<b>आत्मा</b> यानि त्रिकाली द्रव्य,
<b>आत्माको</b> यानि साधक को,
वो आत्मा <b>उपादेय है</b>।

00:33:52.158 --> 00:33:59.896
साधक को भी वो ही आत्मा उपादेय है
और साधक जिसको बनना हो
उसको भी वही आत्मा उपादेय है।

00:33:59.920 --> 00:34:04.943
मुनिराज को आत्मा उपादेय है,
सम्यग्दृष्टि को भी यही आत्मा उपादेय है

00:34:04.967 --> 00:34:14.385
और जिसको सम्यग्दर्शन प्रगट करना हो
उसको भी वो ही आत्मा उपादेय तत्त्व है।

00:34:14.409 --> 00:34:20.952
<b>टीका: यह, हेय और उपादेय</b>,
<b>हेय</b> यानि त्याज्य - छोड़ने योग्य;

00:34:20.976 --> 00:34:27.536
<b>उपादेय</b> यानि ग्राह्य - ग्रहण करने योग्य।
दृष्टि में शुद्धात्मा ग्रहण करने योग्य है;

00:34:27.560 --> 00:34:33.585
और दृष्टि में परिणाम हेय है, त्याज्य है,
छोड़ने योग्य है, लक्ष छोड़ने योग्य है;

00:34:33.609 --> 00:34:40.134
लक्ष करने की चीज नहीं है क्योंकि
अनात्मा है, आत्मा नहीं है, परद्रव्य है।

00:34:40.158 --> 00:34:47.680
<b>यह, हेय और उपादेय तत्त्वके स्वरूपका
कथन है</b>, टीकाकार टीका करते हैं।

00:34:47.704 --> 00:34:55.614
मूल कुंदकुंद भगवान की गाथा है,
उसके बाद अमृतचंद्र आचार्य के पीछे

00:34:55.638 --> 00:35:04.600
आज से ८०० वर्ष पहले
एक (मुनिराज) पद्मप्रभमलधारी देव हो गये हैं।

00:35:04.624 --> 00:35:08.876
बालब्रह्मचारी थे और <b>भावी</b>
तीर्थंकर होनेवाले हैं (नियमसार कलश २१२)।

00:35:08.900 --> 00:35:14.609
ऐसे समर्थ (मुनिराज), उन्होंने टीका की है।
टीका यानि विस्तार।

00:35:14.633 --> 00:35:19.209
जीवतत्त्व, अभी आगे एक-एक (तत्त्व)
का भी अभी विचार-विश्लेषण चलेगा।

00:35:19.233 --> 00:35:26.903
<b>जीवादि सात तत्त्वों</b>
पहले जीव शब्द है। दूसरा शब्द अजीव।

00:35:26.927 --> 00:35:37.112
अजीव के बाद आता है आस्रव,
आस्रव के बाद आता है संवर,
संवर के बाद आता है निर्जरा,

00:35:37.136 --> 00:35:43.849
निर्जरा के बाद आता है बंध,
बंध के बाद आता है मोक्षतत्त्व।

00:35:43.873 --> 00:35:50.818
वो जो सात हैं न, वो सातों ही पर्याय हैं।
जीव की पर्याय है, जीव द्रव्य नहीं लेना।

00:35:50.842 --> 00:36:01.343
<b>जीव</b> यानि जो दस प्रकार के
प्राण से जीव जीता है - व्यवहार जीव,
उसका नाम जीव है। आहाहा!

00:36:01.367 --> 00:36:07.458
शान्त (मुमुक्षु का नाम) ऐसे-ऐसे
(सिर ऊपर-नीचे) करता है शान्त,
अर्थात् पढ़ा तो है, इनका लड़का।

00:36:07.482 --> 00:36:15.996
<b>जीव</b> है न वो पर्याय है,
तो वो दस प्रकार के प्राण से जीता है,
संज्ञी पंचेंद्रिय।

00:36:16.020 --> 00:36:22.752
तो पाँच इंद्रियों का उघाड़, पाँच इन्द्रिय
का ज्ञान का उघाड़ जानने का होता है न,

00:36:22.776 --> 00:36:30.458
तो ये पाँच इंद्रियाँ हैं उसके पास, वो
व्यवहार प्राण है, व्यवहार जीव है, निश्चय
जीव नहीं है, क्योंकि वो तो नाश होनेवाला है।

00:36:30.482 --> 00:36:34.472
सिद्ध पर्याय प्रकट होगी
तो ये प्राण-फ्राण नहीं होते हैं।

00:36:34.496 --> 00:36:44.672
मनबल, वचनबल, कायबल, श्वासोच्छवास
और आयु - ये जो परिणाम है, वो जीव -
व्यवहार जीव है, निश्चय जीव नहीं है।

00:36:44.696 --> 00:36:48.752
तो व्यवहार जीव हेय है
और निश्चय जीव उपादेय है।

00:36:48.776 --> 00:36:55.045
उस परिणाम से भिन्न, अनंत गुणात्मक
भगवान आत्मा वह मेरे लिए उपादेय है।

00:36:55.069 --> 00:37:02.076
जीव से जीव का भेदज्ञान करना।
जीव से जीव भिन्न है।

00:37:02.100 --> 00:37:08.245
जीव से पुण्य-पाप तो भिन्न हैं ही।
क्या कहा?

00:37:08.269 --> 00:37:20.369
जीव से पुण्य-पाप तो भिन्न हैं ही,
तीनों काल, मगर जीव से जीव भी भिन्न है।

00:37:20.393 --> 00:37:28.796
तो क्या दो जीव हैं?
जीव तो एक ही है मगर जीव का
निरुपण दो प्रकार से किया जाता है

00:37:28.820 --> 00:37:33.296
- एक जीव का स्वरूप निश्चयनय
से निरुपण से किया जाता है;

00:37:33.320 --> 00:37:37.889
उस ही जीव के स्वरूप का
निरुपण व्यवहारनय से किया जाता है।

00:37:37.913 --> 00:37:44.892
तो जो व्यवहारनय से निरुपण
करनेवाली व्यवहारनय है, वह
व्यवहारनय उसको जीव कहता है

00:37:44.916 --> 00:37:50.916
- दस प्रकार के प्राण, क्षयोपशम -
ज्ञान का उघाड़, आयुष्य आदि।

00:37:50.940 --> 00:37:57.918
तो ये जो-जो जीव है, व्यवहारनय
जिसको जीव कहता है, वो अभूतार्थ है।

00:37:57.942 --> 00:38:08.800
<b>व्यवहारनय</b> का <b>जो निरुपण</b> है,
वो सब <b>असत्यार्थ मानकर उसका श्रद्धान
छोड़ना</b> (मोक्षमार्ग प्रकाशक पेज २५०)।

00:38:08.824 --> 00:38:16.005
ये शान्त का लड़का कल आया था
मेरे पास, छोटा, लगभग छह-सात वर्ष
का आठ वर्ष का होगा।

00:38:16.029 --> 00:38:20.107
उसने वो वाक्य बोला,
मैं तो खुश हो गया। आहाहा!

00:38:20.131 --> 00:38:31.703
कि <b>व्यवहारनय से</b> जितना <b>निरुपण</b> शास्त्र में 
आये <b>उसे असत्यार्थ</b> जानकर <b>उसका श्रद्धान छोड़</b> देना।
(मोक्षमार्ग प्रकाशक पेज न. २५०)

00:38:31.727 --> 00:38:37.467
अर्थात् जो ये व्यवहार जीव का निरुपण
आवे, व्यवहारनय (उसको) जीव कहता है।

00:38:37.491 --> 00:38:44.776
जीव नहीं है और जीव कहे,
है अजीव और जीव कहे,
है परद्रव्य और जीव कहे;

00:38:44.800 --> 00:38:49.565
है विभाव और उसको जीव कहे।
ख्याल में आया?

00:38:49.589 --> 00:38:59.529
यह गाथा भैया ऊँची है,
ऐसे ही पढ़ लेने की गाथा नहीं है,
घोलन करने की गाथा है। आहाहा!

00:38:59.553 --> 00:39:03.152
मुमुक्षु: यह अधिकार लेकर 
आपने परम कृपा की है।

00:39:03.176 --> 00:39:07.872
पू. लालचंदभाई: हम तो हमारा घोलन 
करने के लिए आए हैं। आहाहा!

00:39:07.896 --> 00:39:15.536
मुमुक्षु: गुरुदेवश्री के मुखारविंद से 
बहुत बार सुना है कि नियमसार 
लालचंदभाई का बहुत प्रिय ग्रंथ है।

00:39:15.560 --> 00:39:19.787
पू. लालचंदभाई: यह तो गुरुदेव कहते थे, 
गुरुदेव की कृपादृष्टि थी।

00:39:19.811 --> 00:39:27.814
सभा में कहें कि नियमसार 
बहुत प्रिय है लालचंदभाई को। आहाहा! 

00:39:27.838 --> 00:39:34.716
क्या कहा? जीव है, 
तो जीव का दो प्रकार से निरुपण है।

00:39:34.740 --> 00:39:39.805
जीव तो एक ही प्रकार का है, 
जीव दो प्रकार का नहीं होता है।

00:39:39.829 --> 00:39:47.496
मगर जीव के साथ जिस भाव का संयोग 
होता है, जिसका वियोग होनेवाला है,

00:39:47.520 --> 00:39:55.374
अरे! (जो) वियोग स्वरूप ही है, 
वियोग होनेवाला है और 
अभी भी वियोग स्वरूप ही है।

00:39:55.398 --> 00:40:06.316
संयोग होने पर भी वो वियोग 
स्वरूप ही है वर्तमान में आहाहा! 
ध्यान रखे तो समझ में आये ऐसा है।

00:40:06.340 --> 00:40:12.596
ऐसे जो इंद्रिय प्राण है वो 
उसको व्यवहारनय जीव कहता है।

00:40:12.620 --> 00:40:21.360
है अजीव, है परभाव, है परद्रव्य, 
है क्षणिक, है कर्मकृत, 
है पर्यायार्थिक का पारिणामिक,

00:40:21.384 --> 00:40:25.212
वह नाशवान है; 
वह सचमुच जीव है नहीं।

00:40:25.236 --> 00:40:32.752
उसको जीव मानना, 
इंद्रियज्ञान को ज्ञान मानना वो अज्ञान है।

00:40:32.776 --> 00:40:47.432
इंद्रियज्ञान को ज्ञान मानना अज्ञान है; 
और इंद्रियज्ञान को जीव का परिणाम मानना 
वो मिथ्यात्व है। आहाहा! 

00:40:47.456 --> 00:40:56.045
यह जीव तो परिणाम बिना की चीज है, 
जीव को परिणाम होता ही नहीं है। आहाहा!

00:40:56.069 --> 00:41:06.174
ऐसा जो व्यवहारनय के निरुपण - कथन आया 
कि ये जो दसप्रकार के प्राण से जीता है 
उसका नाम जीव - वो व्यवहार जीव है।

00:41:06.198 --> 00:41:08.369
जीव का निरुपण दो प्रकार का है।

00:41:08.393 --> 00:41:14.165
जैसे मोक्षमार्ग एक ही प्रकार का है, 
मोक्षमार्ग का निरुपण दो प्रकार का है।

00:41:14.189 --> 00:41:16.923
है तो निश्चय मोक्षमार्ग एक ही प्रकार का।

00:41:16.947 --> 00:41:20.965
आत्मा के आश्रय से 
<b>सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग:</b>
(तत्त्वार्थ सूत्र प्रथम अध्याय सूत्र १)

00:41:20.989 --> 00:41:31.776
- जो वीतरागी पर्याय, जिसमें आनंद आता है 
वह मोक्षमार्ग है, मगर उसके साथ 
व्यवहार रत्नत्रय का संयोग संबंध है।

00:41:31.800 --> 00:41:43.049
तो व्यवहार मोक्षमार्ग -है बंधमार्ग, 
है बंधमार्ग, वो निकल जानेवाला है 
और अभी भी उसमें है ही नहीं;

00:41:43.073 --> 00:41:51.103
तो भी संयोग देखकर उसको 
मोक्षमार्ग कहा जाता है, कथनमात्र है।

00:41:51.127 --> 00:41:59.698
है बंधमार्ग, कहा जाता है मोक्षमार्ग; 
तो व्यवहारनय के सब कथन 
असत्यार्थ कथन समझना। आहाहा!

00:41:59.722 --> 00:42:05.685
ऐसे मोक्षमार्ग एक ही प्रकार का होने 
पर भी निश्चय रत्नत्रय और व्यवहार रत्नत्रय

00:42:05.709 --> 00:42:12.747
ऐसे दो प्रकार की मोक्षमार्ग की कथन 
पद्धति चलती है। ऐसे जीव एक ही 
प्रकार का है - ज्ञायकभाव वो जीव है।

00:42:12.771 --> 00:42:19.854
ज्ञायकभाव ही जीव है; 
दस प्रकार के प्राण जीव नहीं है 
मगर अजीव हैं।

00:42:19.878 --> 00:42:30.298
जीव नहीं मगर अजीव है। 
अजीव को जीव मानना वो मिथ्यात्व है। 
अजीव को जीव मानना मिथ्यात्व है।

00:42:30.322 --> 00:42:42.525
पुण्य-पाप को जीव मानना तो मिथ्यात्व है, 
मगर शास्त्र ज्ञान जो है ज्ञेय, 
है अजीव, है परभाव, है परद्रव्य - हेय है;

00:42:42.549 --> 00:42:47.965
फिर भी उसको, शास्त्रज्ञान को उपादेय 
मान ले वो मिथ्यादृष्टि है। आहाहा!

00:42:47.989 --> 00:42:51.376
ज्ञेय है, ज्ञान तो नहीं है उसमें। 
आहाहा!

00:42:51.400 --> 00:42:58.080
इंद्रियज्ञान आत्मा को प्रसिद्ध नहीं करता है 
(बल्कि) पर को प्रसिद्ध करता है 
तो ज्ञेय है, ज्ञान नहीं है।

00:42:58.104 --> 00:43:03.569
इसलिए जीव से जीव का भेदज्ञान। 
पहले बोल की बात है, एक बोल की अभी।

00:43:03.593 --> 00:43:12.667
छह बोल तो बाकी हैं। 
एक बोल की बात चलती है कि 
जीव से जीव का भेदज्ञान करो। आहाहा!

00:43:12.691 --> 00:43:18.907
जीव यानि शुद्धात्मा 
जो ज्ञान-दर्शन से जीता है, 
चेतना प्राण से अनादि-अनंत जीता है।

00:43:18.931 --> 00:43:28.894
उसको आयुष्य कर्म की ज़रूरत नहीं है। 
आयुष्य कर्म से जीये वो अजीव है, 
जीव नहीं है। आहाहा!

00:43:28.918 --> 00:43:38.596
आयुष्यमान नहीं है। आहाहा! 
‘आयुष्यमानभवः’ ऐसा आत्मा नहीं है आहाहा!

00:43:38.620 --> 00:43:46.525
वो तो सब व्यवहार का, 
अभूतार्थनय का कथन चलता है। 
आहाहा!

00:43:46.549 --> 00:43:56.463
अरे! जीवतत्त्व की बात उसको अनुभव 
में तो आयी नहीं मगर उसे सुनने भी 
मिले नहीं (ऐसे) भाग्य फूट गए। आहाहा!

00:43:56.487 --> 00:44:02.965
जहाँ देखो वहाँ व्यवहार की बातें, 
व्यवहार की बातें, ऐसा करो तो धर्म होवे 
और ऐसे करो तो धर्म हो आहाहा!

00:44:02.989 --> 00:44:13.178
परंतु इसको (आत्मा को) जाने तो धर्म हो 
- यह तो एक सोनगढ़ के संत पके (अवतरित 
हुए) उन्होंने यह मार्ग बताया। आहाहा!

00:44:13.202 --> 00:44:22.432
तो ये जो जीव है दस प्रकार के 
प्राणवाला, वह सात तत्त्व में पहला तत्त्व, 
पर्यायतत्त्व - जीवतत्त्व, द्रव्यतत्त्व नहीं है।

00:44:22.456 --> 00:44:29.000
नाम जीव है मगर (वो) व्यवहारजीव है, 
व्यवहार जीव होने से पर्याय तत्त्व है, 
वो व्यवहारनय का विषय है।

00:44:29.024 --> 00:44:35.729
पर्याय व्यवहारनय का विषय है, 
निश्चयनय का विषय नहीं है।

00:44:35.753 --> 00:44:44.067
उसे जीव मानना वो मान्यता छोड़ दे 
कि वह जीव सच्चा नहीं है, 
वह तो बनावटी - स्वाँग है।

00:44:44.091 --> 00:44:55.827
दस प्रकार के प्राण आहाहा! 
अभी वियोग स्वभावी हैं और 
अल्पकाल में वियोग होनेवाला ही है।

00:44:55.851 --> 00:45:04.832
सिद्ध पर्याय सबकी प्रगट होनेवाली है। 
ऐसा नहीं होगा कि ये सिद्ध होगा 
और मैं रह जाऊँगा। नहीं! आहाहा!

00:45:04.856 --> 00:45:13.756
परीक्षा में पास करे तो मैं पहले 
नम्बर आऊँगा। मेरा पहला नम्बर 
आएगा ऐसा लेना चाहिए। आहाहा!

00:45:13.780 --> 00:45:20.476
पर्याय का स्वभाव, 
ज़्यादा काल बंध (रूप) रहने का 
स्वभाव ही नहीं है पर्याय का।

00:45:20.500 --> 00:45:25.645
वो तो विभाव है, बंध तो; 
और मोक्ष होने का ही पर्याय का स्वभाव है।

00:45:25.669 --> 00:45:33.374
द्रव्य तो त्रिकाली मुक्त है 
मगर पर्याय का स्वभाव भी लंबे 
time (समय) बंध (रूप) रहनेवाला नहीं है।

00:45:33.398 --> 00:45:37.943
थोड़ा ज्ञान को फैलाकर देखो 
तो मोक्ष दिखाई देता है। आहाहा!

00:45:37.967 --> 00:45:44.200
एक बार मैं सोनगढ़ में था और 
प्रेमचंद जी वहाँ आए, दिल्ली से।

00:45:44.224 --> 00:45:50.343
मैं राजकोट जानेवाला था। 
तो बस का time थोड़ा late (देर से) हो 
गया तो पास में bench (ओटले) पर बैठे।

00:45:50.367 --> 00:45:56.747
मैंने प्रेमचंद जी से कहा कि, 
‘प्रेमचंद जी साहेब! 
कि पानी, जल गरम हो गया,

00:45:56.771 --> 00:46:02.792
गरम होने पर भी कितने time गरम 
रहता है? थोड़े time गरम रहता है।

00:46:02.816 --> 00:46:07.503
बाद में तो अपने आप ठंडा 
हो जाता है कि नहीं?’ है न?

00:46:07.527 --> 00:46:13.885
तो पर्याय का काल भी, 
संसार का काल भी limited (सीमित) है।

00:46:13.909 --> 00:46:26.623
संसार पर्याय अनादि-अनंत नहीं है। एक अपेक्षा 
से सादि-सांत, एक अपेक्षा से अनादि-सांत 
परंतु अनादि-अनंत है ही नहीं। आहाहा!

00:46:26.647 --> 00:46:33.125
समयवर्ती देखो तो सादि-सांत एक समय 
की पर्याय प्रगट हुई मिथ्यात्व की 
(और) दूसरे समय (वह) व्यय हो गई,

00:46:33.149 --> 00:46:39.912
और ऐसे फैलाकर देखो तो अनादि 
से मिथ्यात्व चलता भले आए परंतु 
उसका अभाव ही होनेवाला है।

00:46:39.936 --> 00:46:42.334
मिथ्यात्व ज़्यादा time नहीं रहता।

00:46:42.358 --> 00:46:46.685
बुख़ार कितने दिन रहे? एक दिन, 
दो दिन, तीन दिन, चार दिन, 
छूट जाता है बुख़ार। आहाहा!

00:46:46.709 --> 00:46:53.894
ऐसे पर्यायों में दोष हो तो दोष को मत देखो, 
दोष को आगे मत कर; 
निर्दोष परमात्मा को देख ले न,

00:46:53.918 --> 00:46:57.887
और फिर पर्याय को देख तो 
पर्याय भी निर्दोष हो जाएगी! आहाहा!

00:46:57.911 --> 00:47:03.463
द्रव्य के आलम्बन बिना 
पर्याय निर्दोष हो सकती नहीं। 
आहाहा!

00:47:03.487 --> 00:47:10.605
मुमुक्षु: प्रथम, यही मंगल-वाणी 
आपकी प्रथम में प्रथम सुनी थी।
पू. लालचंदभाई: प्रेमचंदजी को कहा

00:47:10.629 --> 00:47:18.738
कि 'पानी भले गरम हुआ प्रेमचंदजी परंतु 
लम्बे time पर्याय गरम रहती नहीं, 
अपने आप ठंडी हो जायेगी।

00:47:18.762 --> 00:47:27.716
उसके लिए पंखे की ज़रूरत नहीं है, 
क्योंकि पर्याय का स्वभाव भी 
विभाव रहने का नहीं है।

00:47:27.740 --> 00:47:31.885
ख्याल आया कुछ? 
सूक्ष्म बात है!

00:47:31.909 --> 00:47:37.134
पर्याय का स्वभाव भी विभाव (रूप) 
लंबे time नहीं रहती है पर्याय।

00:47:37.158 --> 00:47:43.627
विभाव का व्यय होकर पर्याय भी 
स्वभावरूप प्रगट हो जाती है। आहाहा!

00:47:43.651 --> 00:47:47.525
अभव्य की बात अलग है। 
कोई अभव्य हो तो उसकी बात अलग है।

00:47:47.549 --> 00:47:51.027
वो समवशरण में आता ही नहीं है 
अभव्य जीव तो। आहाहा!

00:47:51.051 --> 00:48:01.774
गुरुदेव के समवशरण में 
कोई अभव्य नहीं आते थे, 
सब भव्य ही आते थे। आहाहा!

00:48:01.798 --> 00:48:10.556
<b>जीव</b>, पहले जीव की व्याख्या है। 
सच्चा जीव और खोटा जीव, 
सच्चा जीव और एक झूठा जीव।

00:48:10.580 --> 00:48:14.805
जीव तो एक ही प्रकार का (है), 
सच्चा वही जीव है। समझे?

00:48:14.829 --> 00:48:18.314
वर और सरवाला, 
वर तो एक ही है।

00:48:18.338 --> 00:48:24.849
वरमाला तो लड़की वर के गले में 
ही डालेगी न, सरवाला के गले 
में (तो) नहीं डालेगी। आहाहा!

00:48:24.873 --> 00:48:28.774
वर और सरवाला; 
अण यानि नहीं - (जो) वर नहीं।

00:48:28.798 --> 00:48:32.956
वैसे (ही) ये जीव और अजीव 
(यानि कि) जीव नहीं। आहाहा!

00:48:32.980 --> 00:48:44.014
अजीव के खाते में डाल दे, जीव मत मान। 
जीव मानेगा तो अज्ञान और 
मिथ्यात्व का दोष आएगा। आहाहा!

00:48:44.038 --> 00:48:53.947
अजीव को जीव मत मान भैया, 
व्यवहार जीव है, निश्चय जीव (नहीं), 
वास्तव में वो जीव नहीं है, वो तो स्वाँग है।

00:48:53.971 --> 00:48:59.929
अल्पकाल में सिद्ध पर्याय होगी तो वो 
दस प्रकार के प्राण का अभाव हो जानेवाला है

00:48:59.953 --> 00:49:06.547
और अभी भी अभाव स्वभावमय ही रहती है, 
वो पर्याय स्वभावरूप होती नहीं है। आहाहा!

00:49:06.571 --> 00:49:16.316
चेतनाप्राण से जीव जीता है, 
दस प्रकार के प्राण से जीता नहीं है, 
यह जीव से जीव का भेदज्ञान हुआ।

00:49:16.340 --> 00:49:23.000
अभी दूसरा शब्द अजीव; 
जीव से अजीव भिन्न है 
और अजीव से जीव भिन्न है।

00:49:23.024 --> 00:49:27.929
पहले जीव से जीव भिन्न बताया, 
अभी जीव के बाद अजीव तत्त्व आता है।

00:49:27.953 --> 00:49:32.512
सात तत्त्व है कि नहीं? 
उसका क्रम बताया था न? 
जीव के बाद अजीव।

00:49:32.536 --> 00:49:36.312
तो जीव में अजीव की नास्ति है।

00:49:36.336 --> 00:49:44.236
जीव में अजीव की नास्ति है 
और अजीव की तो प्रगटपने नास्ति है;

00:49:44.260 --> 00:49:56.769
जो कर्म है, पुद्गल है वो अजीव है, 
यानि छह द्रव्य इस जीव की अपेक्षा से 
अजीव है, उसकी तो उसमें नास्ति ही है।

00:49:56.793 --> 00:50:04.818
उस जीव में अजीव आता नहीं है। 
जीव और अजीव दो मिलकर एक जीव बनता नहीं है।

00:50:04.842 --> 00:50:10.947
क्या कहा? 
जीव और अजीव दो मिलकर एक जीव बनता नहीं है।

00:50:10.971 --> 00:50:19.774
अभी सूक्ष्म दूसरा भाव कि ये अजीव है 
ऐसा जो विकल्प आता है वो अजीव है।

00:50:19.798 --> 00:50:27.676
वो (परद्रव्य) निमित्तरूप अजीव है 
और (विकल्प) नैमित्तिकरूप अजीव है; 
मगर है अजीव, जीव नहीं है।

00:50:27.700 --> 00:50:31.667
फिर से। आहाहा! 
एक जीव है

00:50:31.691 --> 00:50:40.280
और जीव के परिणाम में जो निमित्त होता है 
उसका नाम अजीव कहा जाता है, 
कर्म के उदय को।

00:50:40.304 --> 00:50:45.987
वो अजीव तत्त्व है, जीव उसमें नहीं है। 
वो तो जड़ है, pure (शुद्ध) जड़ है। समझे?

00:50:46.011 --> 00:50:55.383
क्योंकि उसमें स्पर्श, रस, गंध, वर्ण है 
और वो तो अजीव है; 
उपादान में निमित्त का तो अभाव है।

00:50:55.407 --> 00:51:01.343
उपादान में निमित्त का तो अभाव है। 
वो तो नक्की है न?

00:51:01.367 --> 00:51:06.543
निमित्त आता है उपादान में? नहीं आता। 
नास्ति है न, मेरे में नहीं है। समझे?

00:51:06.567 --> 00:51:13.654
तो अजीव को जीव नहीं मानना। 
निमित्त को उपादान नहीं मानना। समझे?

00:51:13.678 --> 00:51:18.032
अभी अंदर का दूसरा एक अजीव 
उत्पन्न होता है, अजीव।

00:51:18.056 --> 00:51:29.467
वो (परद्रव्य) निमित्तरूप अजीव है 
दूसरा नैमित्तिकरूप अजीव पैदा होता है।

00:51:29.491 --> 00:51:38.089
एक निमित्तरूप अजीव है, कर्म; 
और कर्म के लक्ष से ये अजीव है 
- ऐसा जो ज्ञान होता है

00:51:38.113 --> 00:51:44.587
उसका नाम नैमित्तिक अजीव तत्त्व है, 
मगर जीव नहीं है।

00:51:44.611 --> 00:51:48.943
यह (परद्रव्य) अजीव है, यह अजीव है 
- मैं नहीं हूँ, ये अजीव है, अजीव है;

00:51:48.967 --> 00:51:58.654
ऐसा जो विकल्प उत्पन्न होता है, 
उसका नाम नैमित्तिक अजीव तत्त्व है।

00:51:58.678 --> 00:52:05.734
निमित्तरूप अजीव तो जुदा है, पृथक है। 
आहाहा! उसका नाम अजीव तत्त्व है।

00:52:05.758 --> 00:52:11.369
जीव से जीव जुदा 
और जीव से अजीव जुदा (है)।

00:52:11.393 --> 00:52:14.180
जीव से अजीव, दो प्रकार से जुदा है,

00:52:14.204 --> 00:52:22.076
एक (तो, ये) अजीव है - 
ऐसा (जो) विकल्प उत्पन्न होता है 
उसका नाम नैमित्तिक अजीवतत्त्व है

00:52:22.100 --> 00:52:29.112
और (दूसरा) जो उसका लक्ष करता है 
- कर्म का, उसका नाम निमित्त है 
वो भी अजीव है।

00:52:29.136 --> 00:52:34.876
निमित्त भी अजीव, नैमित्तिक भी अजीव 
- उससे जीव भिन्न है। आहाहा!

00:52:34.900 --> 00:52:38.467
मैं तो जाननहार हूँ, मैं तो ज्ञाता हूँ। 
आहाहा!

00:52:38.491 --> 00:52:44.040
अजीव तत्त्व की मेरे में नास्ति है। 
मेरे में अजीव तत्त्व नहीं है।

00:52:44.064 --> 00:52:48.998
तो मेरे में नहीं 
इसलिए मैं कर्ता-भोक्ता नहीं हूँ

00:52:49.022 --> 00:52:56.085
और मेरे में नहीं है इसलिए मैं 
उसको जानना अभी सर्वथा बंद कर 
देता हूँ और मेरे आत्मा को जानता हूँ।

00:52:56.109 --> 00:53:02.338
तो जीव और अजीव का भेदज्ञान करने से 
सम्यग्दर्शन की प्रगटता 
एक समय में हो जाती है।

00:53:02.362 --> 00:53:04.658
ऐसा अधिकार बढ़िया है। 
Time हो गया।

00:53:04.682 --> 00:53:07.676
मुमुक्षु: नैमित्तिकभाव भी अजीव है? 
पू. लालचंदभाई: अजीव है।

00:53:07.700 --> 00:53:11.418
उसका कर्ता नहीं, बिल्कुल कर्ता नहीं। 
आहाहा!

00:53:11.442 --> 00:53:14.903
नास्ति है। 
जो उसमें नहीं है उसको करे कैसे?

00:53:14.927 --> 00:53:22.018
जो जीव में नहीं है - विकल्प, 
उस विकल्प को कैसे करे? आहाहा!

00:53:22.042 --> 00:53:27.020
अरे! विकल्प को न करे तो 
संवर-निर्जरा आयेंगे, तब ज़्यादा खबर 
पड़ेगी कि इसका भी कर्ता नहीं (है)।

00:53:27.044 --> 00:53:29.758
आएगा, 
उसकी भी नास्ति है, आत्मा में।

00:53:29.782 --> 00:53:33.520
बहुत सूक्ष्म अधिकार है। 
शांति से, आहाहा!

00:53:33.544 --> 00:53:42.467
अपने को ज़रा भी जल्दी नहीं है, 
शांति से एक-एक बोल और एक-एक शब्द 
का धीमे-धीमे-धीमे घोलन करना है। आहाहा!

00:53:42.491 --> 00:53:44.980
भेदज्ञान, भेदज्ञान है।