﻿WEBVTT

00:00:53.669 --> 00:01:06.783
आज, अपने परम उपकारी ऐसे
भगवान महावीर का आज जन्मदिवस है।

00:01:06.807 --> 00:01:19.289
चौबीस तीर्थंकर हुये, उनमें पहले ऋषभदेव
भगवान हुए और उनके ही पौत्र (पोते)
क्रम-क्रम में चौबीसवें तीर्थंकर हुए।

00:01:19.313 --> 00:01:25.097
मारीचि का जीव था वहाँ
ऋषभदेव भगवान के समय में।

00:01:25.121 --> 00:01:33.667
उनका तो अनंत उपकार है अपने ऊपर
कि जिन्होंने आत्मा का स्वरूप बताया।

00:01:33.691 --> 00:01:41.323
उन्होंने तो प्रत्यक्ष आत्मा का
अनुभव गृहस्थ अवस्था में किया;

00:01:41.347 --> 00:01:56.867
मुनिदशा अंगीकार करके अंदर में जाकर
आत्मध्यान द्वारा शुक्लध्यान की श्रेणी
आरंभ की; और केवलज्ञान प्रगट किया;

00:01:56.891 --> 00:02:07.231
और केवलज्ञान प्रगट होते ही देव ऊपर
से केवलज्ञान कल्याणक मनाने आते हैं।

00:02:07.255 --> 00:02:18.034
ऐसे भगवान महावीर, वीर, महावीर,
सन्मतिनाथ, वर्धमान स्वामी,
ऐसे चार नाम हैं (पाँचवा नाम अतिवीर)।

00:02:18.058 --> 00:02:22.776
महावीर - जैसा नाम वैसे ही उनके गुण हैं।

00:02:22.800 --> 00:02:32.591
महावीर - बहुत वीर्यवान, बहुत पुरुषार्थी
(थे और) अनंत पुरुषार्थ उन्होंने किया।

00:02:32.615 --> 00:02:37.579
पुरुषार्थ की व्याख्या में बड़ी गड़बड़ है।

00:02:37.603 --> 00:02:49.432
जगत के जीव ऐसा मानते हैं कि कुछ
परपदार्थ का करना उसका नाम पुरुषार्थ है।
उसका नाम पुरुषार्थ नहीं है।

00:02:49.456 --> 00:02:59.808
परपदार्थ की कर्ताबुद्धि छूटकर,
परपदार्थ की ज्ञाताबुद्धि छोड़कर और
उपयोग को निःशेषपने अंतर्मुख करते हैं,

00:02:59.832 --> 00:03:07.363
उपयोग जरा भी बाहर जाता नहीं,
ऐसी साधक की अवस्था श्रेणी में आती है,

00:03:07.387 --> 00:03:15.747
तब उपयोग दो घड़ी अंदर में जम जाता है,
तब केवलज्ञान प्रगट होता है।

00:03:15.771 --> 00:03:22.416
और तीर्थंकर, जितने-जितने तीर्थंकर
भूतकाल में हुए और होते हैं और होंगे,

00:03:22.440 --> 00:03:31.216
ऐसे तीर्थंकर जो हों उनकी दिव्यध्वनि
छूटती- छूटती और छूटती ही है।
समवशरण की रचना होती है।

00:03:31.240 --> 00:03:42.864
हजारों-लाखों जीव समवशरण में आते-जाते हैं।
मिथ्यात्व लेकर आते हैं और सम्यग्दर्शन
प्राप्त करके बाहर निकलते हैं।

00:03:42.888 --> 00:03:45.940
एक ही व्याख्यान में बस हो जाये उसको!
आहाहा!

00:03:45.964 --> 00:03:54.654
ऐसे पके हुए जीव, तैयार जीव आते हैं
कि जिनको दिव्यध्वनि निमित्त होती है।

00:03:54.678 --> 00:04:04.627
सर्वज्ञ भगवान की वाणी उनको निमित्त होती है
और अंतर में जाकर अपने आत्मा का
अनुभव करते हैं, आत्म-साक्षात्कार।

00:04:04.651 --> 00:04:12.036
आत्मदर्शन श्रेष्ठ है,
आत्मा का दर्शन श्रेष्ठ है।

00:04:12.060 --> 00:04:20.400
अनंत-अनंतकाल बीता
उसने आत्मा का दर्शन किया नहीं।

00:04:20.424 --> 00:04:30.905
चौबीस तीर्थंकर के दर्शन किये और
जब तक मोक्ष नहीं होगा, तब तक ये तीर्थंकर
की सभा में बैठकर के उनके दर्शन करेगा।

00:04:30.929 --> 00:04:36.365
लेकिन केवल पर-दर्शन से
भव का अंत आ सकता नहीं।

00:04:36.389 --> 00:04:45.000
स्व-दर्शन से ही भव का अंत आता है
और यह दर्शन हो सकता है।

00:04:45.024 --> 00:04:53.418
इसमें बिल्कुल पराधीनता नहीं है,
इसमें गुरु के आशीर्वाद की जरूरत नहीं

00:04:53.442 --> 00:04:59.458
और लायक जीवों पर
आशीर्वाद बरसता ही रहता है,

00:04:59.482 --> 00:05:06.894
पर वह लायक जीव तो जो गुरु
कहते हैं, ऐसा गुरु ने फरमाया

00:05:06.918 --> 00:05:14.907
कि 'हे आत्मा!
तू केवल ज्ञाता है, तू कर्ता नहीं'।

00:05:14.931 --> 00:05:21.454
वह कर्ता के दो भाग नहीं क्योंकि
अकर्ता है, इसलिए कर्ता है ही नहीं।

00:05:21.478 --> 00:05:29.827
इसको करे और इसको न करे,
ऐसे दो भाग अकर्ता में नहीं होते,
अकर्ता ही है अथवा ज्ञाता ही है।

00:05:29.851 --> 00:05:39.858
और ये ज्ञाता, जैसे अकर्ता परिणाम का
कर्ता नहीं, परिणाम तो (स्वयं) होता है,

00:05:39.882 --> 00:05:47.178
ऐसे ज्ञाता भी ज्ञान द्वारा
आत्मा को जानता ही रहता है।
ऐसा ज्ञाता का स्वरूप है।

00:05:47.202 --> 00:05:55.183
अंतर्मुख होकर,
जो ज्ञान बहिर्मुख भटकता था
इन्द्रियज्ञान उसको वहाँ रोककर,

00:05:55.207 --> 00:06:02.765
एक दूसरा नया ज्ञान प्रगट होता है,
उसमें आत्मा का दर्शन होता है।

00:06:02.789 --> 00:06:10.336
जिस प्रकार दीपक,
उसका जो प्रकाश होता है,

00:06:10.360 --> 00:06:16.805
तब जिसकी नजर प्रकाश अथवा
प्रकाशक दीपक ऊपर नहीं है,

00:06:16.829 --> 00:06:19.489
उसको ऐसा भासित होता है
कि यह (पर पदार्थ) जानने में आता है,
यह जानने में आता है,

00:06:19.513 --> 00:06:21.787
यह जानने में आता है,
यह जानने में आता है,
यह जानने में आता है।

00:06:21.811 --> 00:06:28.378
रात में कोई आकर पूछे कि
क्या जानने में आता है तुमको?

00:06:28.402 --> 00:06:30.736
झूला जानने में आता है,
सोफासेट जानने में आता है,

00:06:30.760 --> 00:06:34.787
ये TV (दूरदर्शन) पड़ी है
वो जानने में आती है,
शास्त्र जानने में आते हैं।

00:06:34.811 --> 00:06:40.343
दूसरा कुछ जानने में आता है? कि
नहीं दूसरा कुछ जानने में आता नहीं।

00:06:40.367 --> 00:06:47.867
एक बार एक professor (अध्यापक)
ने अपने ५० विद्यार्थियों को रात को
परीक्षा के लिए बुलाया

00:06:47.891 --> 00:06:52.447
और paper (कागज) दिया
उनको सबको पचास को।

00:06:52.471 --> 00:06:57.516
इतना बड़ा hall (हॉल) था
स्वाध्याय-मंदिर जैसा।

00:06:57.540 --> 00:07:01.489
उसमें बहुत सारी वस्तुयें
अंदर भरी हुई हैं, अभी,

00:07:01.513 --> 00:07:07.960
ये सब पटियों के ऊपर शब्द लिखा हुए,
बहुत कुछ है, पंखा-वंखा, खचाखच है।

00:07:07.984 --> 00:07:14.129
इतना paper निकाला कि इस
हॉल के अंदर जितनी वस्तुयें हों,

00:07:14.153 --> 00:07:22.774
जो-जो वस्तुयें हों,
उन वस्तुओं को लिखकर दो और
आपको आधे घंटे का टाइम देते हैं।

00:07:22.798 --> 00:07:24.947
३० मिनट तो बहुत है।

00:07:24.971 --> 00:07:30.698
फिर भी अगर आपको टाइम कम लगे
तो ३० मिनट के बाद मैं और
ज्यादा ३० मिनिट दूँगा।

00:07:30.722 --> 00:07:36.245
पूरा घण्टा (देता हूँ)।
पर एक घंटे में आप मुझे paper लिखकर दो।

00:07:36.269 --> 00:07:42.676
सभी paper के अंदर इतनी
बारीकी से लिखने लगे,
एक-एक वस्तु को लिखने लगे।

00:07:42.700 --> 00:07:48.867
कोई भी वस्तु रह न जाए इतनी
सावधानीपूर्वक paper पूरा लिखा।

00:07:48.891 --> 00:07:53.489
और वह एक paper उनके
(अध्यापक के) हाथ में
एक घंटे के बाद आया।

00:07:53.513 --> 00:08:01.085
वो देखते जाएँ और चौकड़ा करते
जायें कि इसमें किसी ने
ट्यूबलाइट लिखी नहीं।

00:08:01.109 --> 00:08:03.867
सब पचास ही नापास (हुए)।

00:08:03.891 --> 00:08:10.080
फिर आजकल के सभी
विद्वान-विद्यार्थियों का
जरा दिमाग तेज रहता है

00:08:10.104 --> 00:08:15.640
कि सर! सब नापास नहीं होते,
४९ को नापास करो,
सब ५० के ५० कैसे नापास हों?

00:08:15.664 --> 00:08:19.534
और यदि नापास किया तो
उसका कारण बताओ मुझे।

00:08:19.558 --> 00:08:24.614
पहले बैठ जाओ शांत हो जाओ।
आपको नापास का कारण मैं देता हूँ।

00:08:24.638 --> 00:08:32.969
इतनी सब वस्तएँ जो हैं,
ये तुमने किस माध्यम के
द्वारा इनको जाना?

00:08:32.993 --> 00:08:39.040
अँधेरा होता तो
आप वस्तु जान नहीं सकते थे,
लिख नहीं सकते थे।

00:08:39.064 --> 00:08:43.872
तो इस hall के अंदर ट्यूबलाइट है,
वह लिखने में रह (छूट) गई है।

00:08:43.896 --> 00:08:49.292
मूल में भूल,
ये मूल में भूल कहलाती है।

00:08:49.316 --> 00:08:54.649
सब खड़े हुये और
कान पकड़कर बोले कि,
"हमारी बड़ी भूल हो गई है"।

00:08:54.673 --> 00:09:03.352
ऐसे अनादिकाल से
आत्मा में ज्ञान हो रहा है। आहाहा!

00:09:03.376 --> 00:09:08.027
और इस ज्ञान में भगवान
आत्मा जानने में आ रहा है।

00:09:08.051 --> 00:09:14.489
फिर भी उसकी दृष्टि ज्ञान ऊपर नहीं है,
उसकी दृष्टि ज्ञेय ऊपर है,

00:09:14.513 --> 00:09:18.456
यह परज्ञेय ऊपर,
इसलिए इसको ऐसा ही होता है

00:09:18.480 --> 00:09:22.534
कि मैं इसको जानता हूँ,
इसको जानता हूँ, इसको
जानता हूँ, इसको जानता हूँ।

00:09:22.558 --> 00:09:28.976
जाननहार जानने में आने पर भी,
जाननहार मुझे जानने में नहीं
आता है - उसका निषेध करता है।

00:09:29.000 --> 00:09:33.209
स्वयं अपना घात करता है
और मुझे यह जानने में आता है,

00:09:33.233 --> 00:09:42.483
ऐसे इन्द्रियज्ञान उत्पन्न करके और
इन्द्रियज्ञान जिसको जानता है उसमें
मोह-राग-द्वेष किये बिना रहता ही नहीं।

00:09:42.507 --> 00:09:47.880
ज्ञान तो आत्मा को जाननेवाला है
और जब ज्ञान आत्मा को प्रसिद्ध करे,

00:09:47.904 --> 00:09:52.947
तब उसकी दशा में
मोह-राग-द्वेष उत्पन्न ही नहीं होते।

00:09:52.971 --> 00:09:57.845
आत्मा को जानते कभी भी
कषाय उत्पन्न होता ही नहीं,

00:09:57.869 --> 00:10:02.814
राग उत्पन्न होता ही नहीं परंतु
वीतरागभाव प्रगट होता है।

00:10:02.838 --> 00:10:09.049
जानने में आता है मगर इसको
विश्वास नहीं आता कि मेरा
आत्मा मुझे जानने में आ रहा है।

00:10:09.073 --> 00:10:14.218
अब ये पूरी ट्यूबलाइट ही रह गई।
बहुत लिखा।

00:10:14.242 --> 00:10:19.014
छोटे से छोटी पिन थी न, पड़ी थी न,
वो भी लिख डाली उसने

00:10:19.038 --> 00:10:22.618
कि 'मैंने तो सब लिखा,
कि हाँ, अब तो
मैं तो pass (उत्तीर्ण) होनेवाला हूँ'।

00:10:22.642 --> 00:10:29.120
पिन भी लिखी न, कोने में था,
इसलिए कुछ बाकी नहीं है।
आहाहा!

00:10:29.144 --> 00:10:34.540
परंतु 'આઠ પાનસેરીમાં મણની ભૂલ
(आठ पसेरी में एक मण की भूल)'।
कहावत हैं ना? आहाहा! 

00:10:34.564 --> 00:10:37.987
इसके जैसी बड़ी भूल कर दी उसने।

00:10:38.011 --> 00:10:43.440
प्रत्येक समय,
प्रत्येक जीव में ज्ञान प्रगट होता है

00:10:43.464 --> 00:10:47.147
और उस ज्ञान में
भगवान आत्मा जानने में आता है

00:10:47.171 --> 00:10:51.672
क्योंकि उस ज्ञान में अर्थात्
उपयोग में उपयोग है अर्थात् आत्मा है।

00:10:51.696 --> 00:11:06.438
उपयोग में उपयोग है। उपयोग में,
उपयोग उपयोग बगैर न होय।
उपयोग उपयोग बिना नहीं होता।

00:11:06.462 --> 00:11:11.992
प्रकाश प्रकाशक बगैर (नहीं होता)।
प्रकाश दीपक बगैर नहीं होता।

00:11:12.016 --> 00:11:18.143
सूर्य का प्रकाश सूर्य बगैर नहीं होता।
सूर्य होता, होता और होता ही है।

00:11:18.167 --> 00:11:25.285
ऐसे इस ज्ञान में भगवान आत्मा
निरंतर उपयोग में उपयोग है।

00:11:25.309 --> 00:11:33.012
परंतु उपयोग में क्रोधादि,
कोई बाहर का पदार्थ - कर्म,
नोकर्म उपयोग में नहीं है। आहाहा!

00:11:33.036 --> 00:11:37.372
अतः उपयोग में जो नहीं है
वह मुझे जानने में आता नहीं;

00:11:37.396 --> 00:11:40.938
परंतु जो उपयोग में है
वो ही मुझे जानने में आता है।

00:11:40.962 --> 00:11:47.423
ऐसे जो स्वभाव के सन्मुख आ जाये
तो आत्मा का दर्शन हो।

00:11:47.447 --> 00:11:51.960
ये भगवान महावीर की दिव्यध्वनि
में आज यही ऐसा आया था।

00:11:51.984 --> 00:11:55.956
आज के दिन दिव्यध्वनि ऐसी छूटी थी।

00:11:55.980 --> 00:12:01.552
ऐसा सब ज्ञानी जानते हैं कि
दिव्यध्वनि में यही आया था

00:12:01.576 --> 00:12:05.494
कि तेरे ज्ञान में भगवान आत्मा
जानने में आता है, उसको जान ले।

00:12:05.518 --> 00:12:08.663
तेरे भव का अंत आ जायेगा।
आहाहा!

00:12:08.687 --> 00:12:13.885
कोई शास्त्र पढ़ने की जरूरत नहीं,
संस्कृत की जरूरत नहीं,
व्याकरण की जरूरत नहीं,

00:12:13.909 --> 00:12:18.934
पैसे-टके की जरूरत नहीं।
आहाहा!

00:12:18.958 --> 00:12:24.405
यह सहज में उसको अंदर में मेरा
जाननहार जानने में आता है आत्मा,

00:12:24.429 --> 00:12:33.063
ऐसे अंदर में पहले ज्ञाता का पक्ष आएगा
और वह पक्ष छूटने पर उसको पक्षातिक्रांत
होकर अनुभव होगा, दर्शन होगा।

00:12:33.087 --> 00:12:37.316
आत्मा के दर्शन बिना
इस भव का अंत आता नहीं।

00:12:37.340 --> 00:12:45.494
कुछ खर्च नहीं एक पैसे का,
दस पैसे भी भंडार में डालने की जरूरत
नहीं पड़े और आत्मज्ञान हो जाए,

00:12:45.518 --> 00:12:49.409
क्योंकि दस पैसे न हों स्वयं के
पास तो (भंडार में) न डाले। आहाहा!

00:12:49.433 --> 00:12:53.316
पैसे न डाले भंडार में,
तो दान न दे। आहाहा!

00:12:53.340 --> 00:12:58.960
तो भी इस ज्ञान द्वारा आत्मा
जानने में आ सकता है,
अनुभव में आ सकता है।

00:12:58.984 --> 00:13:05.472
संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव हित-अहित
का विचार करके,
हेय-उपादेय का विचार करके,

00:13:05.496 --> 00:13:11.520
ज्ञायक और ज्ञेय का भेदज्ञान करके
और ज्ञायक के सन्मुख होकर
और ज्ञायक का दर्शन होता है।

00:13:11.544 --> 00:13:17.027
इस तरह से भगवान महावीर ने किया
और उनकी वाणी में भी यही आया है

00:13:17.051 --> 00:13:20.592
कि उपयोग में उपयोग है,
उपयोग में रागादि नहीं हैं।

00:13:20.616 --> 00:13:24.032
उपयोग में राग नहीं
तो उपयोग में कर्म कहाँ से हो?

00:13:24.056 --> 00:13:29.476
उपयोग में शरीर कहाँ से हो?
उपयोग में दुकान कहाँ से हो?
आहाहा!

00:13:29.500 --> 00:13:32.196
मोटर, बंगला 
उपयोग में कहाँ है?

00:13:32.220 --> 00:13:36.734
और ये उपयोग में नहीं,
इसलिए वे मोटर, बंगला
मुझे जानने में नहीं आते।

00:13:36.758 --> 00:13:41.412
उसको जाननेवाला इन्द्रियज्ञान है,
मैं उसे जानता नहीं।

00:13:41.436 --> 00:13:44.452
मैं तो मुझे जानता हूँ और
इन्द्रियज्ञान पर को जानता है,

00:13:44.476 --> 00:13:48.147
ऐसा भेदज्ञान करने पर
दो विभाग पड़ जाते हैं।

00:13:48.171 --> 00:13:53.449
अतीन्द्रियज्ञान प्रगट होता है और
अतीन्द्रियज्ञान में ज्ञायक
भगवान आत्मा जानने में आये;

00:13:53.473 --> 00:13:58.447
बाद में उसकी स्वच्छता में
लोकालोक भले प्रतिभासित हों,

00:13:58.471 --> 00:14:01.226
परंतु लोकालोक को
ये ज्ञान जानता नहीं है।

00:14:01.250 --> 00:14:03.533
क्योंकि '<b>परलक्ष अभावात्</b>'
<b>अचलं परलक्ष्येSभावाच्चंचलता-रहितं</b>
(परम अध्यात्म तरंगिणी - समयसार कलश ४२ की टीका),

00:14:03.557 --> 00:14:05.720
पर के लक्ष से ज्ञान होता ही नहीं।

00:14:05.744 --> 00:14:10.135
केवली भगवान के ज्ञान में
लोकालोक जानने में आते हैं।

00:14:10.159 --> 00:14:18.040
केवली भगवान लोकालोक को जानते नहीं
क्योंकि लोकालोक के सन्मुख
होना नहीं पड़ता ज्ञान को।

00:14:18.064 --> 00:14:22.556
आत्मज्ञान को,
आत्मज्ञान में पर-सन्मुख(ता)
की जरूरत नहीं

00:14:22.580 --> 00:14:27.099
और परपदार्थ को जानने के लिए
पर-सन्मुख(ता) की जरूरत नहीं।

00:14:27.123 --> 00:14:30.457
ऐसा-ऐसा (बाहर में) करना नहीं पड़े।
यह तो ऐसा (अंदर में) ही है
केवलज्ञान में।

00:14:30.481 --> 00:14:32.968
ऐसे श्रुतज्ञान में भी
ऐसा (अंदर में) ही है।

00:14:32.992 --> 00:14:36.196
श्रुतज्ञान और केवलज्ञान
दोनों समान ही हैं;

00:14:36.220 --> 00:14:38.895
श्रुतज्ञान में भी
भगवान आत्मा जानने में आता है

00:14:38.919 --> 00:14:43.871
और श्रुतज्ञान की स्वच्छता में भी
पदार्थ प्रतिभासित होते हैं। आहाहा!

00:14:43.895 --> 00:14:52.880
परंतु ये पदार्थ प्रतिभासित होते हैं
उन बिम्ब को जानता नहीं और
वास्तव में प्रतिबिम्ब को भी जानता नहीं।

00:14:52.904 --> 00:14:59.747
वह ज्ञेयाकार ज्ञान को जानता नहीं,
ज्ञेयों को तो जानता नहीं पर
ज्ञेयाकार ज्ञान को भी जानता नहीं है।

00:14:59.771 --> 00:15:03.470
वह तो ज्ञानाकार ज्ञान को जानता
हुआ परिणमित हो जाता है। आहाहा!

00:15:03.494 --> 00:15:09.649
इसका नाम यह भगवान महावीर
की जयंती मनाई कहने में आता है।

00:15:09.673 --> 00:15:12.466
आत्मदर्शन,
यही जयंती मानाना कहलता है।

00:15:12.490 --> 00:15:18.302
आत्मदर्शन न हो तब तक
महावीर का शिष्य ही नहीं है।

00:15:18.326 --> 00:15:21.858
वह महावीर का शिष्य कहने मात्र है,
कथनमात्र है।

00:15:21.882 --> 00:15:26.541
परंतु महावीर कहते हैं कि
उपयोग में उपयोग है,
तेरे उपयोग में दुःख नहीं।

00:15:26.565 --> 00:15:33.630
दुःख नहीं
इसलिए आत्मा दुःख को भोगता नहीं।
दुःख हो तो भोगे न। आहाहा!

00:15:33.654 --> 00:15:36.896
एक बार यह बात कही
aerodrome (हवाई-अड्डे) पर जाता था

00:15:36.920 --> 00:15:41.682
और पंकज,
हमारे शान्तिभाई के पुत्र,
दुःख की बात मैंने की। आहाहा!

00:15:41.706 --> 00:15:46.669
अब तक आप राग की बात करते थे
तो मैं चमकता नहीं था।

00:15:46.693 --> 00:15:50.922
आज तो ऐसा कहा कि
दुःख ही आत्मा में नहीं है,
तो दुःख को भोगवे कहाँ से?

00:15:50.946 --> 00:15:55.601
क्योंकि उपयोग में दुःख नहीं है
ऐसा गाथा में लिखा है।

00:15:55.625 --> 00:16:01.016
उपयोग में दुःख नहीं है,
क्रोध और क्रोध का फल उपयोग में नहीं,

00:16:01.040 --> 00:16:05.491
वैसे उपयोग द्रव्य बिना नहीं है,
उपयोग में उपयोग है।

00:16:05.515 --> 00:16:09.233
ज्ञायक भगवान आत्मा जानने में आता है।
आहाहा!

00:16:09.257 --> 00:16:17.197
ये उपयोग ऐसा है कि इसमें पूरा
आत्मा जानने में आता है इसलिए उसमें
पर का जानना प्रवेश कर सकता नहीं।

00:16:17.221 --> 00:16:22.096
परपदार्थ आत्म-सन्मुख आते नहीं
और आत्मा पर-सन्मुख होता नहीं

00:16:22.120 --> 00:16:26.635
और ज्ञान में ज्ञायक जानने में
आए बिना रहता नहीं। आहाहा!

00:16:26.659 --> 00:16:32.716
उसने भगवान महावीर की जयंती
मनाई ऐसा कहने में आता है।

00:16:32.740 --> 00:16:37.868
मुमुक्षु: मूल रहस्य साहेब।
पू. लालचंदभाई: मूल रहस्य है।
आज बड़ा दिन है ना? मांगलिक!

00:16:37.892 --> 00:16:44.511
आज जन्म हुआ।
जन्म कल्याणक मनाने के लिए इंद्र आते हैं।
आहाहा!

00:16:44.535 --> 00:16:51.893
इंद्र आते हैं हों! उसमें इतने
मेरु पर्वत तक ऊपर ले जाते हैं,
अभिषेक के लिए। आहाहा!

00:16:51.917 --> 00:16:56.221
बड़े कलश,
कलशों का कोई पार नहीं,
इतने बड़ा कलश हों!

00:16:56.245 --> 00:17:00.252
उसमें किसी देव को आशंका हुई
कि इतने बड़े कलश इतने
(छोटे) बालक के ऊपर,

00:17:00.276 --> 00:17:04.065
नाजुक बालक के ऊपर डालते हैं,
ये सहन कैसे होंगे? आहाहा!

00:17:04.089 --> 00:17:09.156
अवधिज्ञान में जाना उन्होंने (बाल तीर्थंकर ने);
ऐसे, ऐसे जरा अँगूठे से (भूमि)
दबाया, हलचल मच गई।

00:17:09.180 --> 00:17:13.056
किसने ये आशंका की?
वह देव कहे मैंने की। आहाहा!

00:17:13.080 --> 00:17:20.803
उनके बल की कोई बात नहीं,
वासुदेव, प्रतिवासुदेव, चक्रवर्ती
का बल उनकी तुलना में है नहीं।

00:17:20.827 --> 00:17:24.060
ऐसा तो शरीर का बल,
आत्मिक बल तो अलौकिक। आहाहा!

00:17:24.084 --> 00:17:32.215
यह तो पुद्गल का बल है।
पुद्गल में भी वीर्य है, पुद्गल में
भी शक्ति है। आहाहा!

00:17:32.239 --> 00:17:42.023
ऐसे भगवान महावीर हुए और आज के
दिन हम भगवान महावीर की जयंती
मनाते हैं क्योंकि (वे) अपने उपकारी हैं।

00:17:42.047 --> 00:17:50.392
यह शासन भगवान महावीर का चलता है
और यहाँ प्रतिमा भी भगवान महावीर की है।
आहाहा!

00:17:50.416 --> 00:17:55.751
यहाँ की सोसाइटी का नाम
भी महावीर नगर। आहाहा!

00:17:55.775 --> 00:17:58.307
ये महावीर के शिष्य हैं सब।

00:17:58.331 --> 00:18:06.153
महावीर ने कहा कि एक सड़े हुए
तिनके के दो टुकड़े करने की
तेरे में ताकत नहीं।

00:18:06.177 --> 00:18:12.486
यह पलक को तू हिलाता नहीं,
हिलती हुई पलक को हिला सकते नहीं

00:18:12.510 --> 00:18:16.747
और न हिले,
उसे हिला सकता नहीं;

00:18:16.771 --> 00:18:23.576
और हिलती पलक को इन्द्रियज्ञान
जानता है, आत्मा उसको जानता नहीं।

00:18:23.600 --> 00:18:29.525
इन्द्रियज्ञान जाने तो जाने,
मेरा ये विषय नहीं है,
ये (तो) चक्षु इन्द्रिय का विषय है।

00:18:29.549 --> 00:18:33.339
मेरा विषय तो मेरा आत्मा है
क्योंकि उपयोग में उपयोग है।

00:18:33.363 --> 00:18:37.973
उपयोग को मैंने अंदर में घुमाया,
देखा, बहुत खोज की

00:18:37.997 --> 00:18:42.401
परंतु मेरे ज्ञान में भगवान आत्मा
के सिवा मुझे कुछ दिखता नहीं।

00:18:42.425 --> 00:18:45.496
भावकर्म अंदर में नहीं
इसलिए मुझे दिखते नहीं।

00:18:45.520 --> 00:18:48.292
आठकर्म अंदर में नहीं
इसलिए दिखते नहीं।

00:18:48.316 --> 00:18:51.649
शरीर अंदर में नहीं
इसलिए मुझे दिखता नहीं।

00:18:51.673 --> 00:18:59.227
ऐसा भेदज्ञान करने पर उसको
आत्म-साक्षात्कार, अनुभव,
सम्यग्दर्शन हो जाता है। आहाहा!

00:18:59.251 --> 00:19:04.264
बड़ा दिन है ना आज का तो।
आहाहा!

00:19:04.288 --> 00:19:08.812
भगवान महावीर का शासन है।
आहाहा!

00:19:08.836 --> 00:19:13.202
उसमें आत्मदर्शन कैसे हो,
उसकी विधि इसमें है संवर अधिकार में।

00:19:13.226 --> 00:19:16.712
संवर कहो कि
आत्मदर्शन कहो एक ही बात है।

00:19:16.736 --> 00:19:24.045
पर के दर्शन करते-करते
अनंतकाल गया। आहाहा!
भव का अंत आया नहीं।

00:19:24.069 --> 00:19:27.728
लेकिन पर को मैं जानता ही नहीं,
जाननहार जानने में आता है

00:19:27.752 --> 00:19:36.468
- ऐसे ज्ञाता के पक्ष में आते ही उस
पक्ष का विकल्प छूटकर और
ज्ञायक भगवान प्रत्यक्ष, आहाहा!

00:19:36.492 --> 00:19:42.207
दर्शन देता है और ये दर्शन लेता है।
उपयोग दर्शन लेता है
और उपयोग दर्शन देता है।

00:19:42.231 --> 00:19:45.612
पहला उपयोग परिणाम
और दूसरा उपयोग द्रव्य।

00:19:45.636 --> 00:19:48.352
द्रव्य देता है
और उपयोग उसमें लेता है।

00:19:48.376 --> 00:19:57.963
अंदर-अंदर में लेना-देना कर लेता है।
आहाहा! बाहर की जरूरत नहीं।

00:19:57.987 --> 00:20:04.209
एक बार यहाँ राजकोट में बनाव बना।
रतिभाई घीया हैं, secretary (सचिव)।

00:20:04.233 --> 00:20:06.890
हमारे घर पर आये थे
और चर्चा चलती थी।

00:20:06.914 --> 00:20:12.016
उसमें स्वयं बोले कि ये गुरुदेव
इतनी प्रशंसा करते हैं आत्मा की,

00:20:12.040 --> 00:20:20.209
प्रशंसा करते थकते ही नहीं (हैं),
तो ऐसा यह ज्ञायक आत्मा
चौबीसों घंटे करता क्या होगा?

00:20:20.233 --> 00:20:25.923
ऐसा प्रश्न हुआ।
इतनी सारी प्रशंसा करें महापदार्थ की,

00:20:25.947 --> 00:20:30.125
तो ये चौबीस घंटे आत्मा करता
क्या होगा? ऐसा प्रश्न पूछा।

00:20:30.149 --> 00:20:34.267
मैंने कहा ये दर्शन देने का काम
निरंतर करता है।

00:20:34.291 --> 00:20:38.603
लेकिन किसको?
कि (जो) लेता है, उसको।

00:20:38.627 --> 00:20:43.257
यहाँ भगवान महावीर विराजमान हैं।
जो प्रतिमा के पास आवे,
उसको दर्शन दें ना?

00:20:43.281 --> 00:20:47.431
कि चलते-फिरते मनुष्य को बुलाते होंगे?
भगवान बुलातें हैं किसी को? आहाहा!

00:20:47.455 --> 00:20:48.921
भगवान किसी को बुलाते नहीं।

00:20:48.945 --> 00:20:54.591
जिसको गरज हो वह भगवान के पास जाये
और जिसको गरज हो वह इस
(अपने) भगवान के पास जाये।

00:20:54.615 --> 00:20:58.498
तो दर्शन देने के बिना रहता नहीं,
मुख नहीं फेरता वो।

00:20:58.522 --> 00:21:02.966
अनंतकाल से तूने मेरा अपमान
किया और बाहर भटकता था,

00:21:02.990 --> 00:21:07.979
अब मैं दर्शन नहीं दूँगा (ऐसे)
मुख फेरता नहीं। आहाहा!

00:21:08.003 --> 00:21:12.131
आओ रे आओ परिणती!
तेरी भूल मिट गई और मेरा दर्शन किया

00:21:12.155 --> 00:21:18.524
और तुझे सम्यग्दर्शन हो गया,
भव का अन्त आ गया, जा! आहाहा!

00:21:18.548 --> 00:21:23.712
एकबार दर्शन हो जाये,
अल्पकाल में उसका मोक्ष
हो, हो और हो (ही)।

00:21:23.736 --> 00:21:27.351
इसके जैसा कोई सरल रास्ता नहीं।

00:21:27.375 --> 00:21:30.987
धर्म, सरल से सरल (काम) करना हो
तो धर्म है।

00:21:31.011 --> 00:21:35.358
अधर्म तो, आत्मा ऊपर जबरदस्ती करता है
तब अधर्म होता है।

00:21:35.382 --> 00:21:39.506
राग करना, वो आत्मा का स्वभाव नहीं
बल्कि वह बलात्कार करता है,

00:21:39.530 --> 00:21:45.270
आत्मा का अपमान करता है
तब राग और द्वेष और मोह उत्पन्न होते हैं।

00:21:45.294 --> 00:21:53.243
हम यहाँ तक आये हैं।
प्रथम परिच्छेद चलता है।

00:21:53.267 --> 00:21:58.139
<b>परमार्थभूत
आधारआधेयसम्बन्ध नहीं है।</b>
यहाँ तक आए हैं

00:21:58.163 --> 00:22:01.405
कि आत्मा और राग को
आधार-आधेय संबंध नहीं।

00:22:01.429 --> 00:22:05.783
आत्मा के आधार से राग होता नहीं
और राग के आधार से आत्मा नहीं।

00:22:05.807 --> 00:22:09.329
दोनों सत्ता न्यारी-न्यारी,
अलग-अलग हैं। आहाहा!

00:22:09.353 --> 00:22:14.118
मुमुक्षु: थोड़ा हिंदी में लो न,
हिंदी में?
पू. लालचंदभाई: हाँ ठीक!

00:22:14.142 --> 00:22:22.016
मैं भूल जाता (हूँ),
जरा मेरे को याद कराना।
कोई परेशानी नहीं।

00:22:22.040 --> 00:22:31.681
दिल्ली से आये हैं बोलो! आहाहा!
दस-पंद्रह जन आये हैं दिल्ली से।
आहाहा!

00:22:31.705 --> 00:22:37.431
अरे भाई! यह तो कोई
अलौकिक कुंदकुंदाचार्य भगवान
का शास्त्र समयसार (है)।

00:22:37.455 --> 00:22:43.764
कुंदकुंद की वाणी कान ऊपर आये,
तो पुण्य का ढेर हो तब तो
वाणी कान पर आती है। आहाहा!

00:22:43.788 --> 00:22:50.340
और इसको समझने का प्रयत्न करे,
निर्णय करे, निर्णय के बाद
अनुभव करे तो काम हो जाये।

00:22:50.364 --> 00:22:52.650
सिर्फ सुनने से काम नहीं होता है।

00:22:52.674 --> 00:22:58.435
उसको निर्णय करना पड़ेगा
कि ज्ञान में ज्ञायक है कि
ज्ञान में दुःख है। आहाहा!

00:22:58.459 --> 00:23:02.441
ज्ञान में दुःख नहीं।
दुःख दुःख में है और ज्ञान ज्ञान में है।

00:23:02.465 --> 00:23:04.985
मुमुक्षु: हिंदी लो।
पू. लालचंदभाई: हैं? अच्छा!

00:23:05.009 --> 00:23:10.791
दुःख दुःख में है और ज्ञान ज्ञान में है।
जरा टोक देना (हिन्दी बोलने के लिए)।

00:23:10.815 --> 00:23:16.578
कारण है कि यहाँ गुजराती
area (क्षेत्र) में मैं आया हूँ न
इसलिए गुजराती ज्यादा आ जाती है।

00:23:16.602 --> 00:23:21.420
बाकी देवलाली में तो किसी
समय हिंदी भी (चलती है)। आहाहा!

00:23:21.444 --> 00:23:26.757
अरे! कहाँ हिंदी और कहाँ गुजराती!
सब भगवान आत्मा हैं। आहाहा!

00:23:26.781 --> 00:23:31.266
भाषा का भेद है
लेकिन भाव में कोई भेद है नहीं।

00:23:31.290 --> 00:23:41.703
<b>जो निगोद में सो ही मुझमें, सो ही मोक्ष मँझार। </b>
<b>निश्चयभेद कछू भी नाहीं, भेद गिनै संसार॥ </b>
(पंडित बुधजन जी द्वारा भजन - हमको कछु भय ना रे)

00:23:41.727 --> 00:23:45.696
आहाहा! इस तरह से एक
दूसरी बात आई कि पुण्य और पाप,
मुमुक्षु: हिन्दी।

00:23:45.720 --> 00:23:54.792
पू. लालचंदभाई: हाँ, हिन्दी में, अच्छा!
ये भी हिन्दी है न? तो समर्थन देवे न!

00:23:54.816 --> 00:23:58.960
पुण्य और पाप दो समकक्षी पाप हैं।

00:23:58.984 --> 00:24:06.861
उनमें भेद करता है कि
पुण्य ठीक और पाप अठीक
वो घोर संसार में भटकता है,

00:24:06.885 --> 00:24:10.963
घोर संसार में हिंडन्ती!
आहाहा!

00:24:10.987 --> 00:24:19.983
क्या कहा?
कि पुण्य और पाप ये भावकर्म हैं,
एक जाति के कर्म हैं, कषाय ही हैं।

00:24:20.007 --> 00:24:22.127
इस कषाय में अंतर नहीं है।

00:24:22.151 --> 00:24:27.894
पुण्य भी कषाय और पाप भी कषाय,
उसमें जो अंतर करता है,

00:24:27.918 --> 00:24:32.803
तो भेद करता है
तो पुण्य ठीक लगता है
और पाप अठीक लगता है,

00:24:32.827 --> 00:24:37.147
पाप त्याज्य है, पाप त्याज्य है
और पुण्य उपादेय है

00:24:37.171 --> 00:24:44.495
- ऐसा पुण्य के अंदर उपादेयबुद्धि
जो आ गई और पुण्य के फल की चाहना हुई,

00:24:44.519 --> 00:24:47.753
तो ऐसा जीव घोर संसार में
भटकता है। आहाहा!

00:24:47.777 --> 00:24:53.923
कुंदकुंद भगवान की मूल गाथा
प्रवचनसार में ७७ नम्बर की गाथा है।
आहाहा!

00:24:53.947 --> 00:24:58.768
घोर संसार में भटकता है।
आहाहा!
मुमुक्षु: ७७ गाथा (दीवाल) पर लिखी है।

00:24:58.792 --> 00:25:24.152
<b>नहि मानतो-ए रीत पुण्ये पापमां न विशेष छे,</b>
<b>ते मोहथी आच्छन्न घोर अपार संसारे भमे ॥७७॥ </b>

00:25:24.176 --> 00:25:28.918
पू. लालचंदभाई: अपार!
उसका पार नहीं आता है।

00:25:28.942 --> 00:25:33.284
भूल कितनी कही?
कि पुण्य और पाप (दोनों)
एक अशुद्ध परिणाम हैं,

00:25:33.308 --> 00:25:40.973
कषाय हैं, कषाय में अंतर नहीं है,
दोनों ही आकुलता को उत्पन्न करनेवाला है,

00:25:40.997 --> 00:25:45.751
दोनों ही बंध के कारण हैं,
दोनों ही विभाव हैं,

00:25:45.775 --> 00:25:52.500
दोनों ही समकक्षी त्याज्य हैं
तो भी वह भेद करता है कि
पुण्य ठीक और पाप अठीक।

00:25:52.524 --> 00:25:56.092
और कोई पुण्य करता है
तो वो प्रशंसा करता है, ओहोहो!

00:25:56.116 --> 00:26:01.225
अच्छा! उसने शुभभाव किया,
अच्छा किया; दान दिया,
तप किया, यात्रा निकाली।

00:26:01.249 --> 00:26:06.434
अरे भाई! एक जाति का भाव है,
पुण्य और पाप की जाति एक है।

00:26:06.458 --> 00:26:17.041
निश्चय से भेद नहीं है; व्यवहार से भेद
किया तो भी, व्यवहार तो अभूतार्थ है,
उसको सत्यार्थ नहीं मानना।

00:26:17.065 --> 00:26:21.585
पुण्य और पाप समकक्षी बंध का कारण हैं।

00:26:21.609 --> 00:26:27.003
लोहे की बेड़ी भी बाँधती है जीव को,
और सोने की बेड़ी भी (बाँधती है)
(समयसार गाथा १४६)।

00:26:27.027 --> 00:26:33.935
किसी को कहो कि आपको हमको
बाँधना है मगर लोहे की बेड़ी से नहीं
बाँधूगा, सोने की बेड़ी से बाँधूगा।

00:26:33.959 --> 00:26:37.940
तो कहे, न भाईसाहब!
मेरे को सोने की बेड़ी से बंधना नहीं है।

00:26:37.964 --> 00:26:43.469
ऐसे पुण्य की मिठास है जीव को।
आहाहा!

00:26:43.493 --> 00:26:46.252
पुण्य की रूचि जीव को मारती है।

00:26:46.276 --> 00:26:52.270
पुण्य का परिणाम नहीं मारता है,
पुण्य की रुचि जीव को मारती है।

00:26:52.294 --> 00:26:56.155
पुण्यभाव तो होता है आर्यजीव को।
होता है मगर वो ठीक है

00:26:56.179 --> 00:27:01.887
और पापभाव अठीक है
- ऐसे व्यवहारनय से दो भेद हैं।

00:27:01.911 --> 00:27:09.674
और व्यवहारनय से दो भेद
को दो भेद मानकर
जो सदाचार का उपदेश देता है

00:27:09.698 --> 00:27:13.636
(कि) 'वो पाप का परिणाम
तो अनाचार है, ये सदाचार है।'

00:27:13.660 --> 00:27:16.787
नहीं! ये उपदेश बिल्कुल ठीक नहीं है।
आहाहा!

00:27:16.811 --> 00:27:19.636
शुभ और अशुभ समकक्षी पाप हैं।

00:27:19.660 --> 00:27:27.602
पाप को तो सब कोई पाप कहें मगर पुण्य
को कोई पाप कहे तो विरला है - ऐसा (श्रीमद्
योगन्द्रदेव विरचित योगसर गाथा ७१) पाठ है।

00:27:27.626 --> 00:27:34.816
जयसेनाचार्य भगवान की टीका है
समयसार (गाथा १६१-१६३) की,
उसमें ऐसा लिखा है।

00:27:34.840 --> 00:27:41.018
पुण्य-पाप अधिकार पूरा हो गया।
टीका करते-करते टीका पूरी हो गई।

00:27:41.042 --> 00:27:47.278
आखिर में लिखा कि पाप अधिकार
की पूर्णता हुई, समाप्त।

00:27:47.302 --> 00:27:54.823
तो शिष्य ने कहा कि 'पाप अधिकार
तो नहीं है; आप क्यों लिखते हैं
कि पाप अधिकार पूरा हो गया?

00:27:54.847 --> 00:27:58.056
पुण्य-तत्त्व तो है न उसमें।
पुण्य और पाप दो भेद हैं न?’

00:27:58.080 --> 00:28:00.500
(जयसेनाचार्य)
'कि पुण्य भी पाप ही है।

00:28:00.524 --> 00:28:05.612
पुण्य की उत्पत्ति,
स्वरूप से च्युत होता है जीव।

00:28:05.636 --> 00:28:11.923
पाँच महाव्रत का परिणाम व्यवहारनय
से पुण्य है, निश्चयनय से पाप है।'

00:28:11.947 --> 00:28:15.816
हाय! हाय! भावलिंगी संत का?
कि हाँ!

00:28:15.840 --> 00:28:25.123
व्यवहारनय से शुभभाव पुण्य कहा जाता है
और निश्चयनय से तो वो बंध का
कारण है इसलिए पाप ही है।

00:28:25.147 --> 00:28:32.078
पाप को तो सब कोई पाप कहें
मगर पुण्य को पाप कहनेवाला
विरला कोई होता है। आहाहा!

00:28:32.102 --> 00:28:37.096
क्या? तो पाप ही करना? 
पुण्य ठीक नहीं है तो अभी 
पाप करेगा बस, पुण्य छोड़ देगा।

00:28:37.120 --> 00:28:43.614
अरे! करेगा, नहीं करेगा उसके 
कालक्रम में पुण्य-पाप 
आनेवाला हो आयेगा ही आयेगा।

00:28:43.638 --> 00:28:45.831
तू कहाँ उसका कर्ता है?

00:28:45.855 --> 00:28:52.038
वो तो स्वकाल में पाप भी आता है 
और स्वकाल में पुण्य भी आता है 
मगर उसका भेद मत कर;

00:28:52.062 --> 00:28:55.991
उसको अभेद तरीके से देख ले 
कि कषाय की जाति है।

00:28:56.015 --> 00:29:01.284
वो चंडालिनी के गर्भ में से 
उत्पन्न हुए दो बालक हैं 
(समयसार कलश १०१)।

00:29:01.308 --> 00:29:05.358
एक ब्राह्मण के यहाँ बड़ा हो 
और एक उसके यहाँ बड़ा हो।

00:29:05.382 --> 00:29:08.271
ब्राह्मण के यहाँ बड़ा हो उसको अभिमान 
हो जाता है कि दारू नहीं पीते हम,

00:29:08.295 --> 00:29:11.411
हम दारू का नाम ही नहीं लेते 
पुण्य-तत्त्व कहता है;

00:29:11.435 --> 00:29:14.558
और पाप तो स्नान करे उससे, 
यानि पिये दारू।

00:29:14.582 --> 00:29:22.438
कहते हैं जाति दोनों की एक जाति है, 
अज्ञान में से उत्पन्न हुए पुण्य-पाप के 
परिणाम हैं, आत्मा में से उत्पन्न न हों।

00:29:22.462 --> 00:29:25.484
आत्मा में से 
आत्मा का ज्ञान उत्पन्न होता है;

00:29:25.508 --> 00:29:32.421
पुण्य-पाप आत्मा से उत्पन्न नहीं हो सकते 
क्योंकि उपयोग में पुण्य-पाप नहीं।

00:29:32.445 --> 00:29:36.671
नहीं इसलिए उसका कर्ता नहीं, 
नहीं इसलिए उसका जाननेवाला (नहीं है),

00:29:36.695 --> 00:29:40.484
जानता नहीं, 
वह तो आत्मा को जानता है। 
आहाहा!

00:29:40.508 --> 00:29:44.724
ऐसे तू जाननहार को एक बार जान। 
जान तो सही।

00:29:44.748 --> 00:29:49.411
परपदार्थ को जानते अनंतकाल गया। 
ये बात करते हैं।

00:29:49.435 --> 00:29:59.718
<b>और जैसे ज्ञानका स्वरूप जाननक्रिया 
है </b>ज्ञान का स्वरूप जैसे जानने 
की क्रिया है, ज्ञान अर्थात् आत्मा।

00:29:59.742 --> 00:30:04.604
उसका स्वरूप जानने की क्रिया है, 
<b>उसीप्रकार </b>

00:30:04.628 --> 00:30:11.089
जानने की क्रिया भी आत्मा करे 
और क्रोध की क्रिया भी आत्मा करे,

00:30:11.113 --> 00:30:15.331
<b>(ज्ञानका स्वरूप) क्रोधादिक्रिया भी हो, </b>
ऐसा, ऐसा बिल्कुल है नहीं।

00:30:15.355 --> 00:30:19.754
आत्मा ज्ञान की क्रिया करे 
और क्रोध की क्रिया नहीं करे।

00:30:19.778 --> 00:30:23.528
नहीं करता है क्रोध की क्रिया, 
ज्ञान की क्रिया करता है।

00:30:23.552 --> 00:30:29.341
क्रोध ज्ञान में प्रतिभासित भले हो 
मगर उसका कर्ता बनता नहीं है।

00:30:29.365 --> 00:30:39.318
ज्ञान का कर्ता होता है 
और क्रोध तो ज्ञान में परज्ञेय 
तरीके जानने में आता है, ज्ञेय है।

00:30:39.342 --> 00:30:45.418
ज्ञान क्रिया में क्रोध की क्रिया नहीं है 
और क्रोध की क्रिया में ज्ञान की क्रिया नहीं है।

00:30:45.442 --> 00:30:57.018
देखो! यह कलश-टीका है, कलश-टीका। 
उसमें ९७ नम्बर का श्लोक है, ९७।

00:30:57.042 --> 00:31:00.628
पैसा कमाने के चक्कर में 
कहाँ किसी को पड़ी! आहाहा!

00:31:00.652 --> 00:31:04.851
पैसा साथ में आनेवाला नहीं है, 
ये बात नक्की है, 
guarantee (पक्का)।

00:31:04.875 --> 00:31:09.328
guarantee है कि नहीं, 
पैसा आता है, साथ में? आयेगा?

00:31:09.352 --> 00:31:25.698
जो आनेवाला नहीं है, उसके लिए २४ घंटा 
मजदूरी करता है और जो साथ में आता है 
ज्ञान उसके लिए प्रमाद करता है। आहाहा!

00:31:25.722 --> 00:31:28.698
देखो! 
९७ नम्बर का एक श्लोक है।

00:31:28.722 --> 00:31:37.594
कलश-टीका राजमलजी साहब, 
अनुभवी हो गए, 
४०० साल पहले राजमल जी।

00:31:37.618 --> 00:31:43.091
कवि राजमल जी जैन-धर्म के मर्मी। 
आहाहा!

00:31:43.115 --> 00:31:46.924
बनारसीदास हो गए न उनको 
ये (राजमल जी) निमित्त हुये।

00:31:46.948 --> 00:31:54.311
कलश-टीका के निमित्त से 
उनको सम्यग्दर्शन हो गया, 
बनारसीदासजी को।

00:31:54.335 --> 00:32:02.491
<b>सूक्ष्म द्रव्यस्वरूप दृष्टिसे ज्ञानगुण 
और मिथ्यात्व-रागादिरूप चिक्कणता 
इनमें एकत्वपना नहीं है </b>

00:32:02.515 --> 00:32:08.164
क्या कहा? ज्ञानगुण यानि उपयोग 
जिसमें जाननक्रिया होती है

00:32:08.188 --> 00:32:13.838
और बाजू में, साथ में मिथ्यात्व का परिणाम 
विभाव-विकार भी होता है अज्ञानी को।

00:32:13.862 --> 00:32:18.539
अज्ञानी की बात बताते हैं कि 
ज्ञानक्रिया भी प्रगट होती है

00:32:18.563 --> 00:32:29.208
और अनादिकाल से राग मेरा है और देह मेरा है, 
ऐसा श्रद्धा का विपरीत - मिथ्यात्व का  
परिणाम, विकार, विभाव, कषाय प्रगट होता है।

00:32:29.232 --> 00:32:37.018
तो भी ज्ञान की क्रिया के साथ मिथ्यात्व 
की क्रिया एकमेक होती नहीं है।

00:32:37.042 --> 00:32:42.918
इतनी तो भिन्नता मिथ्यादृष्टि को साथ 
में मिथ्यात्व और उपयोग सामान्य,

00:32:42.942 --> 00:32:47.954
सामान्य उपयोग और मिथ्यात्व 
दोनों भिन्न-भिन्न हैं। आहाहा!

00:32:47.978 --> 00:32:55.068
शुद्धोपयोग होता है तब तो मिथ्यात्व 
रहता ही नहीं है। क्या कहा?

00:32:55.092 --> 00:33:01.441
जब शुद्धोपयोग-आत्मदर्शन होता है, 
सम्यग्दर्शन, तब तो मिथ्यात्व 
का परिणाम है ही नहीं।

00:33:01.465 --> 00:33:10.141
मगर मिथ्यात्व का परिणाम जब है 
तब भी ज्ञान से भिन्न रहता है वो; 
एकत्व नहीं होता है उसमें, इसमें लिखा है।

00:33:10.165 --> 00:33:15.924
<b>सूक्ष्म द्रव्यस्वरूप दृष्टिसे ज्ञानगुण </b>
गुण यानि ज्ञप्ति क्रिया।

00:33:15.948 --> 00:33:19.508
जानने की क्रिया होती है ना 
उसका नाम गुण है।

00:33:19.532 --> 00:33:23.964
राग को जब दोष कहते हैं तो 
ज्ञान को गुण कहा जाता है,

00:33:23.988 --> 00:33:31.604
गुण का अर्थ पर्याय है ज्ञप्ति, 
संस्कृत में है ज्ञप्ति, 
जानने की क्रिया।

00:33:31.628 --> 00:33:38.554
ज्ञप्ति यानि जानन-क्रिया होती है 
आत्मा में और मिथ्यात्व की क्रिया 
विभाव भी होता है।

00:33:38.578 --> 00:33:41.268
वो दोनों अलग-अलग हैं।

00:33:41.292 --> 00:33:46.618
<b>मिथ्यात्व-रागादिरूप चिक्कणता 
इनमें एकत्वपना नहीं है। </b>

00:33:46.642 --> 00:33:56.598
स्वभाव और विभाव कभी एक होते नहीं है। 
चाँदी और सोना कभी एक होते नहीं है।

00:33:56.622 --> 00:34:08.031
<b>भावार्थ इस प्रकार है - संसार-
अवस्था [रूप] मिथ्यादृष्टि जीवके </b>

00:34:08.055 --> 00:34:14.221
देखो! मिथ्यादृष्टि है, अज्ञानी है, 
आत्मा को जानता नहीं है।

00:34:14.245 --> 00:34:20.456
उस अवस्था में भी 
राग और ज्ञान एकमेक होते नहीं हैं;

00:34:20.480 --> 00:34:27.678
भिन्न-भिन्न सत्ता, दोनों की भिन्न-भिन्न, 
न्यारी-न्यारी है, प्रदेश-भेद है, आहाहा!

00:34:27.702 --> 00:34:36.298
क्षेत्र-भेद है, भाव-भेद है, 
काल-भेद है। आहाहा!

00:34:36.322 --> 00:34:42.704
<b>संसार-अवस्था [रूप] 
मिथ्यादृष्टि जीवके ज्ञानगुण भी है </b>

00:34:42.728 --> 00:34:48.783
ज्ञप्ति-क्रिया, उपयोग, 
जानने की क्रिया भी प्रगट होती है

00:34:48.807 --> 00:34:53.694
<b>और रागादिचिक्कणता भी है, </b>
रागादि का चिकनापन भी है।

00:34:53.718 --> 00:34:59.784
संसार है ना? 
संसारी जीव लिया है, 
मोक्षमार्गी या मोक्ष नहीं।

00:34:59.808 --> 00:35:06.304
जो आत्मा को जानता नहीं है बिल्कुल 
और पुण्य से धर्म मानता है,

00:35:06.328 --> 00:35:09.824
शुभभाव से धर्म मानता है, 
ऐसा मिथ्यादृष्टि है।

00:35:09.848 --> 00:35:14.784
हाथ मैं हिलाता हूँ, मिथ्यादृष्टि है, 
ऐसा मिथ्यादृष्टि है।

00:35:14.808 --> 00:35:19.171
मैं भाषा बोलता हूँ, आहाहा! 
मिथ्यादृष्टि है।

00:35:19.195 --> 00:35:24.268
भाषा का करनेवाला तो पुद्गल है, 
हाथ को हिलानेवाला तो पुद्गल है;

00:35:24.292 --> 00:35:30.864
आत्मा तो जाननेवाला है, 
करनेवाला नहीं है। 
स्वभाव से ही अकर्ता है।

00:35:30.888 --> 00:35:39.494
स्वभाव से अकर्ता है। आहाहा! 
अनादि-अनंत अकर्ता है, 
अनादि-अनंत ज्ञाता ही है।

00:35:39.518 --> 00:35:47.828
उसको, ज्ञाता को कर्ता माना 
उसका नाम मिथ्यात्व है। 
ऐसी मिथ्यात्व अवस्था में भी,

00:35:47.852 --> 00:35:54.334
देखो! भेदज्ञान करने का मौका है अभी, 
अभी मौका है।

00:35:54.358 --> 00:35:59.736
यदि मन गया और संज्ञी पंचेन्द्रिय 
मनुष्यपना गया और एक-इन्द्रिय,

00:35:59.760 --> 00:36:03.721
दो-इन्द्रिय, तीन-इन्द्रिय, 
चार-इन्द्रिय में चला गया, आहाहा!

00:36:03.745 --> 00:36:11.731
तो बाजी हाथ में से निकल जायेगी। 
फिर अवसर कब आएगा? आहाहा!

00:36:11.755 --> 00:36:17.558
अनंत कल्पकाल जाने के बाद तो 
ऐसा मनुष्य भव मिलता है। आहाहा!

00:36:17.582 --> 00:36:23.178
बीस कोड़ा-कोड़ी सागर का एक कल्प, 
ऐसे अनंत-अनंत कल्प जाएँ 
तो मनुष्यपना मिले।

00:36:23.202 --> 00:36:26.351
उसमें सच्चे देव-शास्त्र-गुरु 
मिलना भी दुर्लभ,

00:36:26.375 --> 00:36:30.496
उसमें आत्मा को समझने की रुचि 
जागना बहुत दुर्लभ,

00:36:30.520 --> 00:36:42.778
निर्णय करना तो उससे भी दुर्लभ 
और निर्णय करके अंदर में 
अनुभव करना ये तो… आहाहा!

00:36:42.802 --> 00:36:48.078
<b>मिथ्यादृष्टि जीवके ज्ञानगुण भी है 
और रागादि चिक्कणता भी है, </b>

00:36:48.102 --> 00:36:50.124
'છે' के बदले 'है', 
तो हिंदी हो गई।

00:36:50.148 --> 00:37:00.916
'छे' तो गुजराती 
और 'है' तो हिंदी, 
इतना फेर है।

00:37:00.940 --> 00:37:08.478
<b>कर्मबंध होता है </b>जीव को, 
मिथ्यादृष्टि को, <b>सो रागादि 
सचिक्कणता से होता है। </b>

00:37:08.502 --> 00:37:13.654
राग का चिकनापन 
जैसे तेल का मर्दन करे तो 
रज चिपकती है (समयसार २३७-२४१)।

00:37:13.678 --> 00:37:19.651
तेल का मर्दन न करे तो अखाड़े में धूल 
चिपके नहीं, धूल उड़े, धूल 
चिपके नहीं (समयसार २४२-२४६)।

00:37:19.675 --> 00:37:23.934
इसलिए जो राग है, 
परिणाम में राग है तो चिकनापन है।

00:37:23.958 --> 00:37:32.774
तो कहते हैं कि <b>रागादिचिक्कणता 
भी है, कर्मबंध होता है 
सो रागादि सचिक्कणता से होता है। </b>

00:37:32.798 --> 00:37:42.934
आस्रव से कर्मबंध होता है, 
राग-द्वेष-मोह वो कषायभाव है 
उससे नया कर्म आता है, बंधता है।

00:37:42.958 --> 00:37:48.944
<b>ज्ञानगुणके परिणमनसे नहीं होता</b>, 
यानि जो उपयोग जानने की क्रिया होती है,

00:37:48.968 --> 00:37:53.138
मिथ्यादृष्टि की बात चलती है, 
शुद्धोपयोग है नहीं।

00:37:53.162 --> 00:37:59.891
शुद्धोपयोग हो, तो-तो 
मिथ्यात्व नहीं रहता है, 
मगर शुद्धोपयोग नहीं, उपयोग है।

00:37:59.915 --> 00:38:03.121
उपयोग 
- वह आत्मा की जाति का अंश है;

00:38:03.145 --> 00:38:12.373
जैसे आत्मा ज्ञाता है ऐसे 
उपयोग भी ज्ञाता है, जानन-क्रिया है 
उसमें, वो स्वभाव का अंश है।

00:38:12.397 --> 00:38:16.831
सूर्य का प्रकाश है न, 
वो प्रकाश सूर्य का अंश है।

00:38:16.855 --> 00:38:21.651
अँधेरा, अँधेरा सूर्य का अंश होता है? 
(नहीं!) नहीं? आहाहा!

00:38:21.675 --> 00:38:29.084
प्रकाश सूर्य का अंश है। 
ऐसे राग अँधकार है, 
वो आत्मा की पर्याय भी नहीं है,

00:38:29.108 --> 00:38:34.211
आत्मा का परिणाम नहीं है, 
जाति अलग है, वह जड़ की जाति है।

00:38:34.235 --> 00:38:38.441
अँधकारमय राग स्वभाव है, 
शुभाशुभभाव।

00:38:38.465 --> 00:38:44.881
मगर ज्ञानगुण का परिणमन जानना, 
जानना, जानना, जानना, जानना, 
जानना, जानना चालू है।

00:38:44.905 --> 00:38:49.218
जानना, जानना चालू है; 
अकेला दुःख होता है, ऐसा नहीं।

00:38:49.242 --> 00:38:55.218
एक बार ऐसा हुआ, 
एक भाई बीमार पड़ा, 
तो डॉक्टर को बुलाओ।

00:38:55.242 --> 00:39:05.424
तो डॉक्टर आया 
तो डॉक्टर साहब ने पूछा कि, 
भाईसाहब! आपको क्या तकलीफ है?

00:39:05.448 --> 00:39:08.674
तो उसने बताया 
कि कुछ तकलीफ नहीं है,

00:39:08.698 --> 00:39:13.816
मैं जानता नहीं हूँ, 
तकलीफ तो है मगर मैं जानता नहीं हूँ। 
अच्छा!

00:39:13.840 --> 00:39:16.481
तो वो बैग उठाकर चला, 
डॉक्टर तो।

00:39:16.505 --> 00:39:21.134
तेरे को खबर नहीं है कि कहाँ दर्द है 
और किस बात के लिए मेरे को बुलाया?

00:39:21.158 --> 00:39:28.208
पेट में दुःखता है, छाती में दुःखता है, 
माथे में दुःखता है, कमर में दुःखता 
है, क्या है तू जानता नहीं है?

00:39:28.232 --> 00:39:31.478
कि साहब! मैं नहीं जानता हूँ। 
अच्छा!

00:39:31.502 --> 00:39:35.616
तो उसने बैग उठाया कि अच्छा! 
चलो मेरा काम नहीं है।

00:39:35.640 --> 00:39:42.274
तेरे को क्या हुआ तो मैं दवा कैसे दूँ? 
किस दर्द की दवा दूँ?

00:39:42.298 --> 00:39:44.758
तो नहीं-नहीं साहब! बैठो, बैठो! 
मेरे को पेट में दुःखता है।

00:39:44.782 --> 00:39:52.564
तो पेट दुःखता है ये किसने जाना? 
दुःख ने दुःख को जाना कि उपयोग ने जाना?
(मुमुक्षु: उपयोग ने।) 

00:39:52.588 --> 00:39:58.198
उपयोग ने जाना कि नहीं? 
उपयोग ने जान लिया कि 
ये दुःख है, दुःख है।

00:39:58.222 --> 00:40:04.904
दुःख को उपयोग ने जाना, 
तो उपयोग दुःखरूप हो तो 
जानने की क्रिया नहीं होती है।

00:40:04.928 --> 00:40:10.498
(तब) तो उपयोग जड़ हो जाता है। 
ख्याल आया शांतिसागर जी? आहाहा!

00:40:10.522 --> 00:40:15.974
ये मुनि होनेवाले थे पहले, शांतिभाई, 
शांतिसागर दिल्ली के हैं।

00:40:15.998 --> 00:40:21.576
उनको पहले बहुत वैराग्य आया था। 
बच गए। हें?

00:40:21.600 --> 00:40:30.618
बच गए, 
सम्यग्दर्शन के पहले चारित्र होता नहीं है।

00:40:30.642 --> 00:40:36.018
क्या कहा? कि जो दुःख है 
और उपयोग है, वो अलग-अलग चीज है।

00:40:36.042 --> 00:40:38.488
अपने अनुभव से सिद्ध होती है।

00:40:38.512 --> 00:40:44.784
जो ज्ञानोपयोग, 
जानन-क्रिया दुःखमय हो जावे 
तो मेरे पेट में दुःखता है

00:40:44.808 --> 00:40:49.801
और माथा दुःखता नहीं है, 
यह भेद किसने किया?

00:40:49.825 --> 00:40:51.401
सिर दुःखता है? 
कि न साहेब।

00:40:51.425 --> 00:40:53.011
पैर दुःखता है? 
कि न साहेब।

00:40:53.035 --> 00:40:59.931
पेट में दुःखता है। 
यह भेद किसने जाना? 
भेद को दुख नहीं जानता है।

00:40:59.955 --> 00:41:05.744
वो जानन-क्रिया ज्ञान में प्रगट होती है, 
वो जानती है। आहाहा!

00:41:05.768 --> 00:41:13.536
इतनी तो बाजी हाथ में है। 
संज्ञी पंचेन्द्रिय(पना) गया, मनुष्य 
भव गया, तो खलास (खत्म)। आहाहा!

00:41:13.560 --> 00:41:16.971
मुश्किल है मामला।

00:41:16.995 --> 00:41:20.471
<b>ज्ञानगुणके परिणमनसे नहीं होता </b>
बंध (नहीं) होता है।

00:41:20.495 --> 00:41:29.331
ये ज्ञानस्वभाव है, 
स्वभाव का अंश है, उससे बंध 
होता नहीं है, राग से बंध होता है।

00:41:29.355 --> 00:41:31.178
<b>ऐसा वस्तुका स्वरूप है</b>।

00:41:31.202 --> 00:41:39.931
यानि ज्ञान भी होता है 
और राग भी होता है मगर राग 
और ज्ञान एक पदार्थ नहीं हैं, आहाहा!

00:41:39.955 --> 00:41:44.318
दो पदार्थ भिन्न-भिन्न हैं, 
दो भाव भिन्न-भिन्न हैं।

00:41:44.342 --> 00:41:51.348
जो उपयोग में दुःख आ गया हो 
तो-तो वो उपयोग जाने ही नहीं कि 
वहाँ दुःख है और वहाँ दुःख नहीं है।

00:41:51.372 --> 00:41:57.254
इसलिए दुःख और उपयोग, 
अनुभव से भिन्न-भिन्न हैं।

00:41:57.278 --> 00:42:05.931
अज्ञानी भी विचार करे न कि पेट 
में दुःखता है और सिर दुःखता 
नहीं है, ये अंतर किसने जाना?

00:42:05.955 --> 00:42:10.411
उपयोग ने, ज्ञान ने जान लिया। 
आहाहा!

00:42:10.435 --> 00:42:16.858
अरे! ज्ञान जो एक समय की पर्याय है, 
उसके पक्ष में आये तो ही काम हो जाये।

00:42:16.882 --> 00:42:22.491
राग का पक्ष छूटे 
और ये ज्ञान का अंश है, 
वो आत्मा का अंश है।

00:42:22.515 --> 00:42:24.924
ज्ञान मेरे को जानने में आता है।

00:42:24.948 --> 00:42:30.299
तो ज्ञान जानने में आता है, 
तो ज्ञान कहाँ से आता है? 
कि आत्मा में से आता है।

00:42:30.323 --> 00:42:37.844
तो इस अंश पर से अंशी पर चला जाता है। 
रस्सी पकड़कर चला जाता है। 
 आहाहा!

00:42:37.868 --> 00:42:46.434
ऐसे दीपचंद जी हो गये। 
उन्होंने कहा कि ज्ञान प्रगट होता है न, 
तो तू विचार कर कि ज्ञान कहाँ से आता है?

00:42:46.458 --> 00:42:53.198
इसकी खोज कर ले। 
तो ज्ञान जहाँ से आता है, वहाँ तू जान, 
तो आत्मा हाथ में आ जायेगा।

00:42:53.222 --> 00:43:00.698
राग के ऊपर दृष्टि देने से, 
दुःख पर दृष्टि देने से आत्मा हाथ में आता 
नहीं है, क्योंकि वो तो जड़ है, अचेतन है।

00:43:00.722 --> 00:43:04.758
राग-द्वेष, सुख-दुःख 
उसमें चेतन की निशानी नहीं है,

00:43:04.782 --> 00:43:09.371
पुद्गल की निशानी है, 
उसमें चेतन की निशानी नहीं है। 
आता है न?

00:43:09.395 --> 00:43:14.134
मुमुक्षु: राग-द्वेष पुद्गल की संपत्ति, 
उसमें नहीं चैतन्य-निशानी। 
पू. लालचंदभाई: आहाहा!

00:43:14.158 --> 00:43:24.308
राग-द्वेष पुद्गल की संपत्ति, 
उसमें नहीं चेतन की निशानी, 
चेतन का लक्षण नहीं है। आहाहा!

00:43:24.332 --> 00:43:31.091
यह दया, दान, करुणा, कोमलता 
के परिणाम में चेतन का लक्षण 
नहीं है, लक्षण-भेद से भेद है।

00:43:31.115 --> 00:43:39.361
उसको अभी.....उससे धर्म हुआ, 
शुभभाव करते-करते मोक्ष हो जायेगा, 
आहाहा! बड़ी भूल है।

00:43:39.385 --> 00:43:42.464
आत्मा का ज्ञान करते-करते मोक्ष होता है।

00:43:42.488 --> 00:43:48.491
आत्मा का ज्ञान करे तो सम्यग्दर्शन, 
चालू रखे तो मोक्ष।

00:43:48.515 --> 00:43:55.081
चालू रखे, continue (जारी) 
तो दो घड़ी में, आहाहा! श्रेणी आती है। 
ये काल नहीं है श्रेणी का।

00:43:55.105 --> 00:44:00.108
चौथे काल में तो 
दो घड़ी अंदर में जम जाते हैं, 
साधक मुनिराज, हों! आहाहा!

00:44:00.132 --> 00:44:03.411
गृहस्थ को श्रेणी नहीं आती है। 
आहाहा!

00:44:03.435 --> 00:44:08.898
गृहस्थ को सम्यग्दर्शन-ज्ञान होता है, 
थोड़ा चारित्र भी होता है।

00:44:08.922 --> 00:44:17.401
इस काल में छठवें-सातवें गुणस्थान 
तक सच्चा मुनि भी बन सकता है, 
इस काल में; नहीं बन सकता ऐसा नहीं है।

00:44:17.425 --> 00:44:23.671
मगर सम्यग्दर्शन के बिना 
मुनिदशा होती नहीं। आहाहा!

00:44:23.695 --> 00:44:28.374
आज का दिन तो बड़ा मांगलिक दिन है। 
आहाहा!

00:44:28.398 --> 00:44:42.418
धर्मपिता का जन्म, 
सर्वज्ञ भगवान अपने धर्मपिता, 
उनका जन्मदिन है आज का। आहाहा!

00:44:42.442 --> 00:44:45.384
<b>और जैसे 
ज्ञानका स्वरूप जाननक्रिया है </b>

00:44:45.408 --> 00:44:48.878
ज्ञान में ज्ञप्ति क्रिया, 
जानन-क्रिया तो होती है

00:44:48.902 --> 00:44:54.601
मगर ज्ञान में राग की क्रिया होती नहीं 
और राग की क्रिया में 
जानन-क्रिया होती नहीं है।

00:44:54.625 --> 00:44:59.011
एक जड़ और दूसरा चेतन। 
आहाहा!

00:44:59.035 --> 00:45:05.681
शुभभाव जड़ है, 
भगवान की पूजा का जो राग आता है,

00:45:05.705 --> 00:45:11.456
वो जड़-अचेतन है, 
उसमें चेतन की निशानी नहीं है।

00:45:11.480 --> 00:45:24.191
आता जरूर है, साधक को आता है, 
गृहस्थ को भी पूजा का भाव, शुभराग 
आता है मगर वो आत्मा से भिन्न है। आहाहा!

00:45:24.215 --> 00:45:28.788
उसमें आत्मा का लक्षण नहीं है, 
पुद्गल की निशानी है उसमें।

00:45:28.812 --> 00:45:35.058
पुद्गल के आश्रय से होता है, 
इसलिए उसको पुद्गल कहा जाता है।

00:45:35.082 --> 00:45:40.671
<b>और जैसे ज्ञानका स्वरूप 
जाननक्रिया है </b>जानने की क्रिया है

00:45:40.695 --> 00:45:47.161
<b>उसीप्रकार (ज्ञानका स्वरूप) 
क्रोधादिक्रिया भी हो,</b>

00:45:47.185 --> 00:45:49.944
<b>अथवा जैसे क्रोधादिका 
स्वरूप क्रोधादिक्रिया है</b>

00:45:49.968 --> 00:45:54.803
<b>उसीप्रकार (क्रोधादिका स्वरूप) 
जाननक्रिया भी हो ऐसा किसी भी प्रकार
से स्थापित नहीं किया जा सकता;</b>

00:45:54.827 --> 00:46:01.128
क्रोध, क्रोध में है, ज्ञान ज्ञान में है; 
जानन-क्रिया में क्रोध नहीं, 
क्रोध की क्रिया में जानन-क्रिया नहीं।

00:46:01.152 --> 00:46:06.221
भेदज्ञान चलता है, भेदज्ञान। 
 आहाहा!

00:46:06.245 --> 00:46:10.616
ऊपर (शीर्षक में) आया था 
कि संवर की उत्पत्ति का कारण

00:46:10.640 --> 00:46:21.928
<b>भेदविज्ञान है उसकी प्रशंसा कर</b>ने 
में आता है, करने में आता है। आहाहा!

00:46:21.952 --> 00:46:24.376
<b>क्योंकि </b>
अभी कारण बताते हैं

00:46:24.400 --> 00:46:35.181
<b>क्योंकि जाननक्रिया </b>
जानने की क्रिया <b>और 
क्रोधादिक्रिया </b>राग की क्रिया;

00:46:35.205 --> 00:46:43.811
राग-द्वेष-मोह, दया, दान, करुणा, 
कोमलता के परिणाम व्रत, अव्रत, व्रत का 
भाव और अव्रत का भाव, ये जड़-अचेतन है।

00:46:43.835 --> 00:46:49.108
अरे! पाँच महाव्रत का भाव 
मुनिराज पालन करते हैं?

00:46:49.132 --> 00:46:54.248
पालन नहीं करते हैं, 
उसको जानते हैं, 
उसको पालते नहीं हैं।

00:46:54.272 --> 00:47:01.501
आता हैं उसको (जानते हैं), 
पररूप जानते हैं, हेयरूप जानते हैं, 
उपादेय जानते नहीं।

00:47:01.525 --> 00:47:06.361
उपादेय तो एक शुद्धात्मा है। 
प्रगट करने के लिए संवर, 
निर्जरा उपादेय है।

00:47:06.385 --> 00:47:10.256
हेय, पाँचों ही महाव्रत हेय हैं। 
तो क्या (फिर) करना (या) नहीं करना?

00:47:10.280 --> 00:47:18.308
छोड़ना? कि बिल्कुल करने की (या) 
नहीं करने की बात नहीं है; 
होता है, उसको जानो। आहाहा!

00:47:18.332 --> 00:47:28.061
वो सब अनंतगुण की अनंत 
पर्यायें होने योग्य होती हैं और 
जाननहार जानने में आ रहा है।

00:47:28.085 --> 00:47:36.461
क्रियायें होने योग्य होती हैं, 
परिणाम की क्रिया होने योग्य होती रहती है 
और जाननहार जानने में आया करता है।

00:47:36.485 --> 00:47:40.518
इसकी हिंदी क्या है? बोलो। 
हिन्दी बताओ भाईसाहब को।

00:47:40.542 --> 00:47:48.071
होने योग्य होता है 
और जाननहार जानने में आता है।

00:47:48.095 --> 00:47:52.331
होने योग्य होता है, 
इसका अर्थ मैं करनेवाला नहीं हूँ।

00:47:52.355 --> 00:47:57.798
परिणाम होता है, 
परिणाम तो चलता है, 
होने योग्य होता है।

00:47:57.822 --> 00:48:02.804
नहीं होने योग्य भी नहीं होता है 
और आत्मा कर्ता भी नहीं है।

00:48:02.828 --> 00:48:08.798
उस क्रिया रोकनेवाला भी कोई नहीं है 
और क्रिया को जाननेवाला मैं नहीं हूँ। 
आहाहा!

00:48:08.822 --> 00:48:11.684
मैं तो जाननहार को जानता हूँ।

00:48:11.708 --> 00:48:16.851
होने योग्य होता है और 
जाननहार जानने में आता है -

00:48:16.875 --> 00:48:26.811
ऐसी स्थिति में जरा विचार लंबा चले 
और स्थिर हो जाये थोड़े time (समय), 
तो अनुभव हो जाता है, दर्शन।

00:48:26.835 --> 00:48:33.601
आज का मंगल दिन है न? आहाहा! 
भगवान का दर्शन होता है।

00:48:33.625 --> 00:48:39.321
भगवान का दर्शन होता है इस काल में। 
हो! कौन से भगवान?

00:48:39.345 --> 00:48:47.358
कि (अपने) ज्ञायक देवाधिदेव 
शुद्ध चैतन्य परमात्मा, शुद्ध है, 
ज्ञान-आनंद से भरा हुआ है लबालब।

00:48:47.382 --> 00:48:52.958
सुखमय आत्मा है, ऐसा दर्शन (होता है), 
दर्शन होता है तो परिणाम 
भी सुखमय हो जाता है,

00:48:52.982 --> 00:48:57.011
दुःख चला जाता है, 
इसका नाम संवरतत्त्व कहा जाता है।

00:48:57.035 --> 00:49:01.104
आत्मा की पर्याय में आनंद आवे 
उसका नाम संवर है;

00:49:01.128 --> 00:49:10.558
और आत्मा के परिणाम में आकुलता दुःख 
होता है उसका नाम आस्रवतत्त्व है। 
समझे? लक्षण है।

00:49:10.582 --> 00:49:19.041
संवर, आस्रव का लक्षण क्या? 
कि जिस परिणाम में दुःख का वेदन 
आ जावे उसका नाम आस्रवतत्त्व

00:49:19.065 --> 00:49:27.461
और जो परिणाम आत्माभिमुख हुआ, 
उसमें अनाकुल आनंद आया परिणाम में, 
उसका नाम संवरतत्त्व है,

00:49:27.485 --> 00:49:43.069
उसका नाम सामायिक है, उसका 
नाम प्रतिक्रमण है, प्रत्याख्यान, आलोचना 
- ये सब शुद्धोपयोग के ही नाम हैं। आहाहा!

00:49:43.093 --> 00:49:53.191
<b>क्योंकि जाननक्रिया और क्रोधादि
क्रिया भिन्न-भिन्न स्वभावसे प्रकाशित होती 
हैं </b>ये तो दो तत्त्व भिन्न हैं। आहाहा!

00:49:53.215 --> 00:50:03.344
एक जीव तत्त्व भिन्न है - 
एक ज्ञानोपयोग सामान्य भिन्न है 
और राग भी भिन्न है। आहाहा!

00:50:03.368 --> 00:50:11.268
<b>और इस भाँति स्वभावोंके भिन्न 
होनेसे वस्तुएँ भिन्न ही हैं। </b>
स्वभाव भिन्न है इसलिए वस्तु भी भिन्न है।

00:50:11.292 --> 00:50:19.628
<b>इसप्रकार ज्ञान तथा अज्ञानमें </b>
आत्मा को और अज्ञान को <b>(क्रोधादिकमें) 
आधाराधेयत्व नहीं है। </b>नहीं है,

00:50:19.652 --> 00:50:24.504
आत्मा के आधार से क्रोध नहीं और 
क्रोध के आधार से आत्मा नहीं है;

00:50:24.528 --> 00:50:30.973
आत्मा के आधार से ज्ञान है 
और ज्ञान के आधार से आत्मा है। 
एक जाति है, स्वजाति है।

00:50:30.997 --> 00:50:36.856
विजाति में 
आधार-आधेय संबंध होता नहीं है।

00:50:36.880 --> 00:50:39.011
अभी एक para रहा बाकी।

00:50:39.035 --> 00:50:46.651
<b>इसीको विशेष समझाते हैं:- </b>
आधार-आधेय संबंध के लिए 
एक द्रष्टान्त देते हैं।

00:50:46.675 --> 00:50:50.761
जिसको आधार-आधेय संबंध 
बैठता है न, वो अज्ञानी है।

00:50:50.785 --> 00:50:54.188
यह शास्त्र है न, 
वो रहल के आधार से नहीं है।

00:50:54.212 --> 00:50:58.511
आधार नाम की शक्ति उसमें (शास्त्र में) है। 
वो (रहल) तो छूता भी नहीं है।

00:50:58.535 --> 00:51:02.326
टोपी माथे के आधार से नहीं है। 
आहाहा!

00:51:02.350 --> 00:51:10.804
जमीन के आधार से पैर चलता नहीं है, 
जमीन को पैर छूता ही नहीं है, 
पैर पैर में है और जमीन जमीन में है।

00:51:10.828 --> 00:51:14.311
अपने, अपने आधार से पैर है, 
जमीन जमीन के आधार से है।

00:51:14.335 --> 00:51:21.998
आधार-आधेय संबंध नहीं है, 
दो तत्त्व भिन्न-भिन्न हैं। 
 जीव और अजीव तत्त्व भिन्न हैं।

00:51:22.022 --> 00:51:25.988
यह microphone (ध्वनिग्राही) स्कन्ध है, 
स्कन्ध, पुद्गल का स्कन्ध है। समझे?

00:51:26.012 --> 00:51:29.464
तो ये सब परमाणु, 
अनंत परमाणुओं का पिंड है।

00:51:29.488 --> 00:51:34.631
तो ये नीचे के परमाणु के आधार से 
ऊपर के परमाणु नहीं हैं।

00:51:34.655 --> 00:51:39.998
नीचे के परमाणु आधार और 
वो (ऊपर के) आधेय, ऐसा नहीं है। 
आधार-आधेय संबंध नहीं है।

00:51:40.022 --> 00:51:52.308
परमाणु परमाणु के आधार से है, 
पुद्गल स्कन्ध के आधार से परमाणु नहीं है। 
आहाहा! ऐसी सूक्ष्म बात है!

00:51:52.332 --> 00:52:04.871
<b>विशेष समझाते हैं:- </b>
राग को आत्मा का आधार नहीं है 
और ज्ञान को आत्मा का आधार है।

00:52:04.895 --> 00:52:10.261
<b>विशेष समझाते हैं:- जब एक 
ही आकाशको </b>दृष्टान्त देते हैं

00:52:10.285 --> 00:52:15.088
कि तेरी बुद्धि में विचार कर कि 
आकाश को किसका आधार है?

00:52:15.112 --> 00:52:20.368
यह आकाश है न बड़ा लोकाकाश, 
वह किसके आधार से आकाश रहता है?

00:52:20.392 --> 00:52:25.438
आकाश को आधार होता नहीं है। 
आहाहा!

00:52:25.462 --> 00:52:32.038
<b>एक ही आकाशको अपनी बुद्धिमें 
स्थापित करके (आकाशके) आधार
आधेयभावका विचार किया जाता है तब</b>

00:52:32.062 --> 00:52:35.551
विचार करो आकाश को 
किसका आधार है?

00:52:35.575 --> 00:52:43.788
कि आकाश को किसी का आधार होता नहीं है; 
अपने आधार से आकाश है, खाली जगह।

00:52:43.812 --> 00:52:48.584
<b>विचार किया जाता है तब 
आकाशको शेष अन्य द्रव्योंमें आरोपित 
करनेका निरोध ही होनेसे </b>

00:52:48.608 --> 00:52:57.094
आकाश पुद्गल के आधार से नहीं है, 
आकाश जीव के आधार से नहीं है, 
आकाश धर्मास्तिकाय के आधार से नहीं है।

00:52:57.118 --> 00:53:03.508
किसी परद्रव्य के आधार से आकाश नहीं। 
आकाश को कोई आधार की जरूरत नहीं।

00:53:03.532 --> 00:53:10.388
<b>आरोपित करनेका निरोध ही होनेसे 
(अर्थात् अन्य द्रव्योंमें स्थापित करना 
अशक्य ही होनेसे) </b>आहाहा!

00:53:10.412 --> 00:53:14.039
<b>बुद्धिमें भिन्न आधारकी 
अपेक्षा प्रभवित नहीं होती; </b>

00:53:14.063 --> 00:53:18.581
बुद्धि से विचार करने से, 
ज्ञान से विचार करने से, 
मानसिकज्ञान से विचार करने से,

00:53:18.605 --> 00:53:24.181
आकाश पदार्थ को किसी परपदार्थ 
के आधार की जरूरत नहीं।

00:53:24.205 --> 00:53:28.394
यह aeroplane (हवाई-जहाज) 
चलता है वह आकाश के आधार से नहीं।

00:53:28.418 --> 00:53:32.941
आकाश के आधार से 
aeroplane चलता नहीं। आहाहा!

00:53:32.965 --> 00:53:36.871
उसको आधार-आधेय की 
जरूरत नहीं, आकाश की।

00:53:36.895 --> 00:53:39.278
आकाश को उसकी जरूरत नहीं 
और उसको (आकाश की नहीं)।

00:53:39.302 --> 00:53:47.898
सबका आधार-आधेय संबंध अंदर में रहता है। 
<b>-ફાવી શકતી નથી, ઠરી જાય છે</b> 
(-जमती नहीं, बंद हो जाती है)।

00:53:47.922 --> 00:53:54.361
<b>उसके प्रभवित नहीं होनेसे, 
'एक आकाश ही एक आकाशमें ही प्रतिष्ठित है' </b>

00:53:54.385 --> 00:54:00.256
आकाश आकाश में रहा हुआ है। 
आकाश पुद्गल में नहीं, 
धर्मास्तिकाय में नहीं।

00:54:00.280 --> 00:54:05.736
आकाश आकाश में है, 
परमाणु परमाणु में है, 
जीव जीव में हैं।

00:54:05.760 --> 00:54:10.894
जीव देह में नहीं। देह देह से है, देह। 
देह जीव के आधार से नहीं है। आहाहा!

00:54:10.918 --> 00:54:14.931
यह आधार-आधेय संबंध नहीं। आहाहा!

00:54:14.955 --> 00:54:22.314
<b>यह भलीभाँति समझ लिया जाता है</b> 
यह भेदज्ञान है। 
दो द्रव्य की भिन्नता बताते हैं। आहाहा!

00:54:22.338 --> 00:54:30.464
दो द्रव्य की भिन्नता होने से एकता टूट 
जाती है। बड़ा लाभ होता है, धर्म होता है!

00:54:30.488 --> 00:54:36.314
<b>और इसलिये ऐसा समझ 
लेनेवालेको पर-आधाराधेयत्व 
भासित नहीं होता।</b>

00:54:36.338 --> 00:54:41.091
<b>इसप्रकार जब एक ही ज्ञानको</b> 
अब दृष्टांत पूरा हो गया।

00:54:41.115 --> 00:54:46.624
अभी आत्मा की बात करते हैं। 
आत्मा को किसी का आधार नहीं है।

00:54:46.648 --> 00:54:52.183
<b>एक ही ज्ञानको </b>
अर्थात् आत्मा को, <b>अपनी 
बुद्धिमें स्थापित करके (ज्ञानके) </b>

00:54:52.207 --> 00:54:55.136
विचार करो कि 
आत्मा को किसका आधार है?

00:54:55.160 --> 00:54:58.678
दूसरे के आधार की जरूरत है? 
कि नहीं (है)।

00:54:58.702 --> 00:55:05.574
<b>(ज्ञानके) आधारआधेयभावका विचार 
किया जाये तब ज्ञानको शेष अन्य द्रव्योंमें 
आरोपित करनेका निरोध ही होनेसे</b>

00:55:05.598 --> 00:55:11.994
राग के आधार से ज्ञान नहीं है 
और ज्ञान के आधार से राग नहीं है।

00:55:12.018 --> 00:55:17.601
<b>बुद्धिमें भिन्न आधारकी अपेक्षा प्रभवित 
नहीं होती; </b>संभव ही नहीं है।

00:55:17.625 --> 00:55:20.554
<b>और उसके प्रभवित नहीं होनेसे, </b>
नहीं सम्भवने से

00:55:20.578 --> 00:55:27.488
<b>'एक ज्ञान ही 
एक ज्ञानमें ही प्रतिष्ठित है' </b>
ज्ञान ज्ञान में रहता है।

00:55:27.512 --> 00:55:33.278
ज्ञान में राग नहीं और 
राग में ज्ञान नहीं है। आहाहा! 
ऐसी स्वतंत्र वस्तु है।

00:55:33.302 --> 00:55:41.664
द्रव्य सत्, गुण सत् और पर्याय (सत्)। 
सत् का ढिंढोरा है, सत् का ढिंढोरा है।

00:55:41.688 --> 00:55:51.264
<b>यह भलीभाँति समझ लिया जाता है 
और इसलिये ऐसा समझ लेनेवालेको 
पर-आधाराधेयत्व भासित नहीं होता। </b>

00:55:51.288 --> 00:55:59.216
<b>इसलिये ज्ञान ही ज्ञानमें ही है,</b> 
ज्ञान ही ज्ञान में है। 
उपयोग में उपयोग है।

00:55:59.240 --> 00:56:04.558
उपयोग में क्रोधादि नहीं, 
उपयोग में दुःख नहीं। आहाहा!

00:56:04.582 --> 00:56:08.271
ज्ञान में दुःख नहीं, 
आत्मा में दुःख नहीं।

00:56:08.295 --> 00:56:15.681
क्या कहा? ज्ञान में दुःख नहीं, 
आत्मा में दुःख नहीं; दुःख दुःख में है।

00:56:15.705 --> 00:56:22.684
दुःख दुःख में है, है तब तक है, 
हमेशा रहने की चीज नहीं। 
दुःख जाये फिर सुख आये।

00:56:22.708 --> 00:56:26.724
दुःख हमेशा रहने की चीज नहीं क्योंकि 
दुःख तो विभाव है, दुःख तो टल जाता है।

00:56:26.748 --> 00:56:31.198
आत्मानुभव करने पर दुःख टल जाता है 
और परमानंद की प्राप्ति होती है।

00:56:31.222 --> 00:56:35.404
<b>इसलिये ज्ञान ही ज्ञानमें ही है, 
और क्रोधादिक ही क्रोधादिमें ही है। </b>

00:56:35.428 --> 00:56:43.204
ऐसा भेदज्ञान जो करे, तो जिसको 
भेदज्ञान होता है उसको अभेद 
आत्मा का अनुभव होता है।

00:56:43.228 --> 00:56:47.838
और मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, (मिथ्या) 
चारित्र चला जाता है और मोक्षमार्ग,

00:56:47.882 --> 00:56:50.278
<b>सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्ग: </b>
(तत्त्वार्थ सूत्र, प्रथम अध्याय, सूत्र १)

00:56:50.302 --> 00:56:58.880
ऐसा मोक्ष का मार्ग, 
सुख का मार्ग प्रगट हो जाता है। 
अल्पकाल में वो सिद्ध परमात्मा हो जाता है।