﻿WEBVTT oi280

00:00:57.253 --> 00:01:05.431
यह श्री समयसारजी परमागम शास्त्र है।
समयसार अर्थात् शुद्धात्मा।

00:01:05.455 --> 00:01:13.889
उसका प्रतिपादन करनेवाला जो
यह समयसार (अंदर में) है - ऐसा
यह शास्त्र समयसार परमागम है।

00:01:13.913 --> 00:01:22.569
एक समयसार यहाँ (अंदर में)
उपादानपने है उसको बतानेवाला जो
निमित्त हो उसका नाम भी समयसार।

00:01:22.593 --> 00:01:34.307
उपादान का नाम भी समयसार है - शुद्धात्मा और
यह जिनेन्द्र भगवान की वाणी (जो) है द्रव्यश्रुत,
उसको भी समयसार कहने में आता है।

00:01:34.331 --> 00:01:49.920
... भेदज्ञान की गाथा है।
अनंत-अनंतकाल बीता उसने भेदज्ञान किया नहीं।

00:01:49.944 --> 00:01:58.956
भेदज्ञान के अभाव से आत्मा संसार में,
चार गति में भटकता है, रुलता है।

00:01:58.980 --> 00:02:05.622
भेदज्ञान अर्थात् ज्ञान भिन्न है
और राग भिन्न है।

00:02:05.646 --> 00:02:20.609
जाननक्रिया भी होती है आत्मा की पर्याय में
और आत्मा की पर्याय में पराश्रित
राग भी होता है अनंतकाल से।

00:02:20.633 --> 00:02:25.009
उसको स्वच्छ ज्ञान में
राग जानने में आता भी है।

00:02:25.033 --> 00:02:37.931
तो भी, जानने में आए, मगर राग ज्ञान
उपयोग में भी आता नहीं और ज्ञायकभाव
तक ये पहुँचता नहीं; वह तो अपने में है।

00:02:37.955 --> 00:02:47.822
राग राग में है, ज्ञान ज्ञान में है,
ज्ञायक ज्ञायक में है; ऐसी एक स्थिति है।

00:02:47.846 --> 00:02:55.956
परंतु वर्तमान ज्ञान उपयोग में जाननहार
जानने में आता हुआ होने पर भी

00:02:55.980 --> 00:03:07.911
अनंतकाल से निषेध करता है कि
मेरे में राग होता है, राग को मैं करता हूँ
और राग को मैं जानता हूँ;

00:03:07.935 --> 00:03:18.462
ऐसे राग के साथ एकत्वबुद्धि करता था,
उसका नाम मिथ्यात्व का आस्रव था।
उसका नाम मिथ्यात्व का आस्रव।

00:03:18.486 --> 00:03:26.289
भाईसाहब! हिन्दी।
राग और ज्ञान हैं भिन्न-भिन्न,
स्वभाव से भिन्न हैं।

00:03:26.313 --> 00:03:34.482
एक हुए नहीं, होंगे भी नहीं कभी
क्योंकि ज्ञान चेतन है, राग जड़ है।

00:03:34.506 --> 00:03:42.596
जड़ और चेतन कभी
तीनकाल में एक होते नहीं हैं।
वो तो स्वभाव से भिन्न-भिन्न रहते हैं।

00:03:42.620 --> 00:03:54.600
तो भी इसकी दृष्टि आत्मा पर आती नहीं है,
उसको ऐसी भ्रांति होती है
कि मेरे में राग हो गया है।

00:03:54.624 --> 00:04:01.311
तो राग का मैं ही कर्ता हूँ और
उसका फल दुख, मैं ही भोगता हूँ;

00:04:01.335 --> 00:04:06.356
ऐसे आस्रवतत्त्व,
मिथ्यात्व तो अनादिकाल का था।

00:04:06.380 --> 00:04:14.391
वो भेदज्ञान से आस्रव का अभाव होकर
संवर यानि शुद्धोपयोगदशा प्रगट की।

00:04:14.415 --> 00:04:23.382
तो इधर उपयोग में उपयोग है
और उपयोग में क्रोधादि नहीं हैं,
बस इतने में काम हो जाता है।

00:04:23.406 --> 00:04:34.658
उपयोग यानि जाननक्रिया,
उसमें जाननहार जानने में आता है।
जाननहार जानने में आ रहा है।

00:04:34.682 --> 00:04:43.700
जाननेवाला है वो तो ज्ञान है और
जो जानने में आता है वह ज्ञायक है।

00:04:43.724 --> 00:04:54.485
ज्ञान में जानने का धर्म है और भगवान आत्मा
में प्रमेयत्व नाम का, ज्ञेयत्व नाम का गुण
होने से अपने ज्ञान में जानने में आता है।

00:04:54.509 --> 00:04:59.551
इस तरह से भेद करके समझाते हैं
अज्ञानी प्राणियों को।

00:04:59.575 --> 00:05:11.967
है तो अभेद, है तो अभेद,
ज्ञान और ज्ञायक हैं तो अनन्य,
तो भी भेद करके समझाया जाता है।

00:05:11.991 --> 00:05:24.213
तो भेद कितना किया? कि वर्तमान
जो उपयोग है यानि जाननक्रिया है,
यानि ज्ञप्ति-क्रिया है उसमें आत्मा है।

00:05:24.237 --> 00:05:34.542
वो जाननक्रिया में राग-द्वेष,
सुख-दुःख, कुछ उसमें है ही नहीं,
वो तो ज्ञान से भिन्न है।

00:05:34.566 --> 00:05:43.865
और ज्ञान और आत्मा अभिन्न हैं,
इसलिए ज्ञान में आत्मा जानने में आ रहा है।

00:05:43.889 --> 00:05:55.418
ज्ञान और राग भिन्न हैं इसलिए राग
जानने में नहीं आता है। जो जिसके साथ
तन्मय होता है उसको जानता है।

00:05:55.442 --> 00:06:02.276
देहादि परपदार्थों के साथ
ज्ञान तन्मय तो होता नहीं है
इसलिए पर को जानता नहीं है।

00:06:02.300 --> 00:06:11.205
पर को जाननेवाला इंद्रियज्ञान है।
ज्ञान तो आत्मा को जानता है,
इंद्रियज्ञान पर को जानता है।

00:06:11.229 --> 00:06:18.809
तो पर को इंद्रियज्ञान ने जाना
तो मैं जाननहार,
वो भूल गया और मैंने पर को जाना,

00:06:18.833 --> 00:06:22.822
तो मैं‑पना (अपनापन) इंद्रियज्ञान
में स्थाप दिया, तो इंद्रियज्ञान

00:06:22.846 --> 00:06:28.245
और अतीन्द्रियज्ञानमय पदार्थ आत्मा
उसके साथ एकत्वबुद्धि कर लेता है।

00:06:28.269 --> 00:06:32.160
एकत्व किया है।
अभी विभक्त का पाठ चलता है।

00:06:32.184 --> 00:06:36.147
एकत्व तो किया है परंतु
अभी विभक्त का पाठ चलता है।

00:06:36.171 --> 00:06:42.178
पानी, जल मिट्टी के संग से
पर्याय में मलिनता आयी,

00:06:42.202 --> 00:06:48.089
तो फिटकरी डालने से मलिनभाव निकल जाता है
और स्वच्छ पर्याय प्रगट होती है।

00:06:48.113 --> 00:07:00.480
ऐसे आचार्य भगवान फ़रमाते हैं कि उपयोग
में उपयोग है मगर उपयोग में रागादि नहीं
हैं, क्रोधादि नहीं हैं, क्रोधादि भिन्न हैं।

00:07:00.504 --> 00:07:09.773
तो आचार्य भगवान फ़रमाते हैं,
<b>ज्ञान </b>यानि आत्मा

00:07:09.797 --> 00:07:20.876
<b>जो कि जाननक्रियारूप
अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित है वह,
जाननक्रियाका ज्ञानसे </b>

00:07:20.900 --> 00:07:34.045
यानि आत्मा से <b>अभिन्नत्व होनेसे,
ज्ञानमें ही है;</b> एक तत्त्व जानने में
आता है और दूसरा तत्त्व जानता है।

00:07:34.069 --> 00:07:46.160
भेद करें तो दो तत्त्व हैं।
ज्ञान है वो जानता है और ज्ञायक है
वो ज्ञान में निरंतर जानने में आता है।

00:07:46.184 --> 00:07:52.149
जानने में आता है वो ज्ञेय है
और जानता है वो ज्ञान है।

00:07:52.173 --> 00:08:00.305
इतना भेद समझाने के लिए है,
बाकी ज्ञेय भी आत्मा और ज्ञान भी आत्मा है।

00:08:00.329 --> 00:08:11.363
ऐसा जो भेद का लक्ष छोड़कर और
अभेद हो जाये तो उसको शुद्धोपयोग,
संवर - धर्म की दशा प्रगट हो जाये।

00:08:11.387 --> 00:08:20.932
ज्ञान और ज्ञायक का भेद;
ज्ञान यानि जाननक्रिया, उसमें ज्ञायक है।

00:08:20.956 --> 00:08:30.060
तो ज्ञान क्रिया में रागादि, कर्म,
शरीर, कुटुंब, परिवार, दुकान
उसमें हैं ही नहीं; वो तो भिन्न हैं।

00:08:30.084 --> 00:08:38.523
तो ज्ञान में क्या है? कि ज्ञायक है।
ज्ञान का अर्थ ज्ञाता है
और ज्ञायक का नाम ज्ञेय है।

00:08:38.547 --> 00:08:42.607
ज्ञायक का नाम स्वज्ञेय,
परज्ञेय की बात नहीं।

00:08:42.631 --> 00:08:49.985
परज्ञेय को जो प्रसिद्ध करे वो इंद्रियज्ञान।
आत्मज्ञान पर को प्रसिद्ध नहीं करता है।

00:08:50.009 --> 00:09:01.589
तो भगवान आत्मा तो ज्ञेय है, अभेद,
सामान्य तत्त्व और जो विशेष उपयोग
प्रगट होता है, उसका नाम है ज्ञान।

00:09:01.613 --> 00:09:11.136
एक का नाम ज्ञान, दूसरे का नाम ज्ञेय।
और ज्ञेय और ज्ञान एक वस्तु है।
भेद निकाल दें तो ये आत्मा ही है।

00:09:11.160 --> 00:09:23.367
ज्ञेय भी आत्मा और ज्ञान भी आत्मा हो गया,
शुद्धोपयोगदशा। निर्विकल्पध्यान में ज्ञेय
और ज्ञान का भेद दिखाई नहीं देता है।

00:09:23.391 --> 00:09:31.940
भेद होने पर भी, आहाहा!
अभेद पर दृष्टि जाते ही,
अभेद-ज्ञेय बन जाता है।

00:09:31.964 --> 00:09:39.100
त्रिकाल अभेद पर दृष्टि जाने से क्षणिक
अभेद हो जाता है, परिणामी हो जाता है।

00:09:39.124 --> 00:09:44.278
अपरिणामी और परिणाम दो भेद
निकलकर परिणामी हो जाता है।

00:09:44.302 --> 00:09:54.803
परिणामी का नाम स्वज्ञेय है।
ये ध्येय पूर्वक ज्ञेय हो जाता है।

00:09:54.827 --> 00:10:05.856
ध्येय तो है शुद्धात्मा, उसका ध्यान करने
से ध्येय और ध्यान की हुई एकता
उसका नाम ध्याता। उसका नाम है ध्याता।

00:10:05.880 --> 00:10:13.305
ध्यान, ध्येय और ध्याता एक पदार्थ है।
ज्ञेय, ज्ञान और ज्ञाता भी एक पदार्थ है।

00:10:13.329 --> 00:10:19.705
ऐसा जाननक्रिया में अपना
आत्मा जानने में आ रहा है सबको।

00:10:19.729 --> 00:10:24.696
स्वीकार नहीं करता है,
वो मानता है कि पर को मैं जानता हूँ।

00:10:24.720 --> 00:10:32.145
आचार्य भगवान ने पर को जाननेवाला भिन्न
बताया कि इंद्रियज्ञान पर को जानता है।

00:10:32.169 --> 00:10:39.434
ज्ञान स्व को जानता है ऐसा स्वीकार
कर ले तो वो शुद्धोपयोग हो जाता है।

00:10:39.458 --> 00:10:49.518
निरंतर ज्ञान में आबाल-गोपाल सबको,
भगवान आत्मा जानने में आ रहा है
(समयसार, गाथा १७-१८)।

00:10:49.542 --> 00:10:57.598
वो ज्ञायक ज्ञान में जानने में आता है
क्योंकि उसमें ज्ञेयत्व है
और ज्ञान में ज्ञानत्व है।

00:10:57.622 --> 00:11:03.256
तो ऐसा function (कार्य) चालू है
अनादि से। आहाहा!

00:11:03.280 --> 00:11:09.652
उसका नाम सामान्य उपयोग और
इतना भेद निकल जाए तो शुद्धोपयोग!

00:11:09.676 --> 00:11:15.052
ज्ञान ज्ञायक को जानता है
ऐसा भेद छूट जाता है।

00:11:15.076 --> 00:11:23.407
भेद रहता नहीं है तो
उसका नाम शुद्धोपयोग - संवरदशा प्रगट
हो गई। उसमें आनंद आता है।

00:11:23.431 --> 00:11:31.585
जब तक उपयोग में,
सामान्य उपयोग में ज्ञायक जानने में
आता है तब तक आनंद नहीं आता है।

00:11:31.609 --> 00:11:45.443
परोक्ष ज्ञान में आनंद नहीं है
परंतु परोक्ष ज्ञान में कोई
अपूर्व उल्लास आ जाता है।

00:11:45.467 --> 00:11:51.127
ज्ञान में जाननेवाला जानने में
आता है ऐसा जो पक्ष हो -
पक्ष, अनादिकाल का पक्ष है।

00:11:51.151 --> 00:11:56.327
मैं पर को जानता हूँ, पर को करता हूँ,
दो पक्ष अनादिकाल के हैं।

00:11:56.351 --> 00:12:01.212
अभी कर्ताबुद्धि छोड़ दे और
पर को मैं जानता हूँ वो बुद्धि छोड़ दे।

00:12:01.236 --> 00:12:08.154
मेरे ज्ञान में तो ज्ञायक जानने में आ रहा है।
तो वो पहले परोक्ष में आता है ज्ञान में ज्ञायक।

00:12:08.178 --> 00:12:17.389
तो वहाँ आनंद नहीं हैं
मगर पक्ष में उल्लास तो आता है।
वो उल्लास भी अलग जाति का है।

00:12:17.413 --> 00:12:25.598
एक करोड़ रुपए की लॉटरी मिले
और उल्लास आ जावे ऐसा नहीं है।

00:12:25.622 --> 00:12:30.767
और ५० वर्ष में लड़का हो जावे,
लड़का तो था ही नहीं,
कोई लड़की-लड़का नहीं थे

00:12:30.791 --> 00:12:36.043
और ५० वर्ष में बालक हो गया
तो हर्ष आती है कि नहीं?

00:12:36.067 --> 00:12:40.145
वो हर्ष अलग है,
करोड़ रुपए की लॉटरी का हर्ष अलग है;

00:12:40.169 --> 00:12:45.478
मगर ज्ञान में ज्ञायक जानने में आता है
ऐसा पक्ष आता है, वो जाति अलग है।

00:12:45.502 --> 00:12:54.398
है तो कषाय की मंदता तो भी जाति
कोई अलग प्रकार की है। ओहाहा!

00:12:54.422 --> 00:13:01.198
ऐसा परोक्ष अनुभूति के बाद
ये भेद निकलता है - ज्ञान-ज्ञेय का,
तो अनुभव हो जाता है।

00:13:01.222 --> 00:13:08.949
तो आचार्य भगवान फ़रमाते हैं कि
तेरे ज्ञान में ज्ञायक जानने में आ रहा है।

00:13:08.973 --> 00:13:22.780
<b>ज्ञान जो कि जाननक्रियारूप अपने
स्वरूपमें प्रतिष्ठित है </b>आत्मद्रव्य
आत्मा की पर्याय में रहता है।

00:13:22.804 --> 00:13:35.572
आत्मद्रव्य आत्मा की ज्ञान की
पर्याय में रहता है। राग में कहीं
आत्मा नहीं, देह में आत्मा नहीं।

00:13:35.596 --> 00:13:42.594
<b>वह, जाननक्रियाका </b>
देखो पहले भेद से बात बताई,
अब अभेद करते हैं।

00:13:42.618 --> 00:13:50.460
भेद से समझाया जाता है
मगर भेद से अनुभव नहीं होता है।

00:13:50.484 --> 00:13:56.834
व्यवहार परमार्थ का प्रतिपादक है मगर
व्यवहार अनुसरण करने योग्य नहीं है।

00:13:56.858 --> 00:14:03.989
ज्ञान में आत्मा जानने में आता है तो
ये अनुसरण करने योग्य नहीं है, भेद है।

00:14:04.013 --> 00:14:11.145
इससे आगे की बात अभी कहते हैं
दूसरी पंक्ति में, लाइन में।

00:14:11.169 --> 00:14:23.016
<b>वह, जाननक्रियाका ज्ञानसे </b>
अर्थात् आत्मा से, आत्मा और आत्मा
का ज्ञान <b>अभिन्नत्व होनेसे, </b>

00:14:23.040 --> 00:14:25.234
आहाहा!
अभेद कर दिया।

00:14:25.258 --> 00:14:33.052
पर्याय और द्रव्य को अभेद, समझाने के लिए
भेद किया था कि जाननक्रिया में आत्मा है।

00:14:33.076 --> 00:14:45.372
राग में आत्मा नहीं है
तो कर्म और शरीर और ये अरंडी
पीसने की मिल उसमें आत्मा होगा?

00:14:45.396 --> 00:14:52.567
कहाँ गए जयंतिभाई?
है या नहीं? गए? यहाँ बैठे हैं।

00:14:52.591 --> 00:14:58.625
गाड़ी लेकर मुझे लेने के लिए आते
हैं ना। मिल में आत्मा नहीं है।

00:14:58.649 --> 00:15:04.327
मिल में तो आत्मा नहीं है,
मिल मेरी है ऐसे ममत्व भाव में
आत्मा नहीं है।

00:15:04.351 --> 00:15:11.243
उसमें तो आत्मा नहीं है
मगर मैं पर को जानता हूँ
ऐसे इंद्रियज्ञान में भी आत्मा नहीं है।

00:15:11.267 --> 00:15:13.772
सामान्य उपयोग में आत्मा है।

00:15:13.796 --> 00:15:18.020
वो सामान्य उपयोग में आत्मा है
तो अभेद हो जाता है;

00:15:18.044 --> 00:15:27.109
तो अतीन्द्रियज्ञान, शुद्धोपयोग होकर
संवर दशा प्रकट होती है। आहाहा!

00:15:27.133 --> 00:15:36.278
मीठालाल पैलेस में आत्मा नहीं है।
रजनी! है? नहीं है।
उसकी ममता में नहीं है। आहाहा!

00:15:36.302 --> 00:15:42.540
उसको जाननेवाली
इंद्रियज्ञान में आत्मा है?
भोगीभाई? नहीं है। आहाहा!

00:15:42.564 --> 00:15:49.345
उससे भिन्न एक उपयोग प्रगट होता है,
जिस उपयोग इंद्रियज्ञान हुआ कि नहीं हुआ,

00:15:49.369 --> 00:15:56.487
तो उस उपयोग में आत्मा जानने में आता है
और आत्मा आता है तो शुद्धोपयोग हो जाता है।

00:15:56.511 --> 00:16:02.447
हुआ कि नहीं हुआ तहाँ
तो शुद्धोपयोग हो जाता है।

00:16:02.471 --> 00:16:08.909
सामान्य ज्ञान उपयोग convert (बदलकर)
होकर इंद्रियज्ञानरूप हुआ कि नहीं हुआ,

00:16:08.933 --> 00:16:18.376
तहाँ तो उपयोग अंदर में चला जाता है।
शुद्धोपयोग प्रकट हो जाता है।

00:16:18.400 --> 00:16:22.976
<b>वह, जाननक्रियाका ज्ञानसे</b>,
<b> ज्ञानसे </b>अर्थात् आत्मा से....।

00:16:23.000 --> 00:16:31.963
शक्कर और शक्कर की मिठास अभेद है,
शक्कर ही है। मिठास अलग और
शक्कर अलग, ऐसा है नहीं। आहाहा!

00:16:31.987 --> 00:16:38.625
सूर्य और सूर्य का प्रकाश अभेद है।
ये कोई अलग चीज नहीं।

00:16:38.649 --> 00:16:46.420
<b>जाननक्रियाका ज्ञानसे अभिन्नत्व
होनेसे, ज्ञानमें ही है; </b>आहाहा!

00:16:46.444 --> 00:16:52.523
पहले जाननक्रिया में आत्मा था।
अभी अभेद अपेक्षा से

00:16:52.547 --> 00:17:03.145
<b>वह, जाननक्रियाका </b>आत्मा के
साथ अभेद <b>होनेसे, </b>वो <b>ज्ञानमें
ही है; </b>जाननक्रिया ज्ञान में ही है।

00:17:03.169 --> 00:17:09.140
जाननक्रिया में ज्ञान है,
बाद में जाननक्रिया आत्मा में है।
उस ज्ञान में आत्मा ही है।

00:17:09.164 --> 00:17:14.967
जाननक्रिया और आत्मा भिन्न चीज नहीं है।
आहाहा!

00:17:14.991 --> 00:17:22.745
<b>क्रोधादिक जो कि
क्रोधादिक्रियारूप अपने स्वरूपमें
प्रतिष्ठित है </b>क्रोध, क्रोध में है।

00:17:22.769 --> 00:17:30.172
जैसे ज्ञान ज्ञान में है,
ऐसे क्रोध क्रोध में है।
दो सत्ता अलग-अलग हैं।

00:17:30.196 --> 00:17:36.367
ऊपर आ गया,
एक वस्तु दूसरी वस्तु की नहीं है
क्योंकि प्रदेशभेद है।

00:17:36.391 --> 00:17:39.087
इसलिए एक सत्ता की अनुत्पत्ति नहीं।
आहाहा!

00:17:39.111 --> 00:17:42.585
दोनों ही सत्ता भिन्न-भिन्न हैं,
इसलिए आधार-आधेय संबंध नहीं।

00:17:42.609 --> 00:17:48.932
आत्मा के आधार से क्रोध नहीं
और क्रोध के आधार से आत्मा नहीं।
आहाहा!

00:17:48.956 --> 00:17:55.492
क्रोध क्रोध से होता है,
ज्ञान ज्ञान से होता है
और ज्ञायक ज्ञायक में रहा हुआ है।

00:17:55.516 --> 00:18:04.025
उस ज्ञायक के सन्मुख होकर
यदि ज्ञान जाने तो उसे धर्म की
शुरुआत- संवरदशा प्रकट हो जाये।

00:18:04.049 --> 00:18:11.896
ये दो घड़ी जो सामायिक (समय-अवधि)
बाँधकर पाप को रुका और पुण्य की
प्रवृत्ति की हो, वो सामायिक नहीं है, प्रभु।

00:18:11.920 --> 00:18:21.567
किसी को कषाय की मंदता हो तो
शुभभाव मिथ्यात्व के साथ में होता है;
मिथ्यात्व के साथ का शुभभाव होता है। आहाहा!

00:18:21.591 --> 00:18:26.994
क्योंकि शुभभाव से धर्म मानते हैं न,
इसलिए मिथ्यात्व साथ में रहता है।

00:18:27.018 --> 00:18:34.176
मिथ्यात्व छूटना, मोह छूटना
उसमें बड़ा पुरुषार्थ चाहिए।

00:18:34.200 --> 00:18:38.660
<b>क्रोधादिक जो कि क्रोधादि
क्रियारूप अपने स्वरूपमें प्रतिष्ठित है</b>,

00:18:38.684 --> 00:18:42.336
क्रोध क्रोध में रहा हुआ है,
ज्ञान ज्ञान में रहा हुआ है।

00:18:42.360 --> 00:18:48.580
ज्ञान क्रोध में नहीं और
क्रोध ज्ञान में नहीं, ऐसा अस्ति-नास्ति
अनेकांत से भिन्नता बताते हैं।

00:18:48.604 --> 00:18:50.323
दोनों वस्तु अलग-अलग हैं।

00:18:50.347 --> 00:19:01.465
दया, दान, करुणा, कोमलता के परिणाम या यह
सुनने का जो प्रशस्त राग है, यह राग आत्मा
में नहीं और आत्मा राग में नहीं। आहाहा!

00:19:01.489 --> 00:19:05.492
और राग उपयोग में नहीं
और उपयोग राग में नहीं।

00:19:05.516 --> 00:19:15.714
एक पर्याय में दूसरी पर्याय नहीं और
पहली पर्याय में यह पर्याय नहीं तो
द्रव्य तो उसमें कहाँ से आवे? आहाहा!

00:19:15.738 --> 00:19:19.860
<b>वह, क्रोधादिक्रियाका
क्रोधादिसे अभिन्नत्व होनेके कारण, </b>लो,

00:19:19.884 --> 00:19:27.078
जैसे जाननक्रिया को आत्मा से अभिन्न कहा,
ऐसे क्रोध की क्रिया और क्रोध
दो अभिन्न कह दिया है।

00:19:27.102 --> 00:19:30.572
<b>क्रोधादिक्रियाका क्रोधादिसे
अभिन्नत्व होनेके कारण,
क्रोधादिकमें ही है। </b>

00:19:30.596 --> 00:19:38.820
क्रोध क्रोध में है, ज्ञान ज्ञान में है।
आत्मा आत्मा में है, क्रोध क्रोध में है।
आहाहा!

00:19:38.844 --> 00:19:46.029
<b>ज्ञानका स्वरूप जाननक्रिया है, </b>
ज्ञान का यानि आत्मा का स्वरूप जाननक्रिया है;

00:19:46.053 --> 00:19:50.709
राग की क्रिया करना
वो आत्मा का धर्म नहीं है।

00:19:50.733 --> 00:19:57.576
राग को करनेवाला जुदा है और
राग को जाननेवाला भी जुदा है।

00:19:57.600 --> 00:20:04.216
जाननेवाला इंद्रियज्ञान है
और करनेवाला पुद्गल है। आहाहा!

00:20:04.240 --> 00:20:11.545
राग को करनेवाला बताया कि
कर्मकृत है। कर्म के संबंध से
होता है इसलिए कर्म कर्ता है।

00:20:11.569 --> 00:20:23.727
आत्मा अकारक है राग का, अथवा
आगे चलें तो पर्याय का कर्ता पर्याय है;
आत्मा भी नहीं है और कर्म भी नहीं है।

00:20:23.751 --> 00:20:33.100
और शब्दादि को जाने, रूपादि को जाने
वो इंद्रियज्ञान है। मैं उसको जानता नहीं हूँ,
मैं तो जाननहार को जानता हूँ। आहाहा!

00:20:33.124 --> 00:20:37.460
जाननहार जानने में आ रहा है,
उसको विश्वास नहीं आता।

00:20:37.484 --> 00:20:43.949
और ये जानने में आता है,
ये जानने में आता है, इंद्रियज्ञान,
अनादिकाल का प्रकट हो रहा है, अज्ञान।

00:20:43.973 --> 00:20:50.563
अर्थात् इंद्रियज्ञान से भिन्न कोई आत्मा है,
अतीन्द्रियज्ञानमयी महापदार्थ अंदर विराजमान है,

00:20:50.587 --> 00:20:55.847
जिसे जानने पर अतीन्द्रियज्ञान
नया प्रकट होता है। आहाहा!

00:20:55.871 --> 00:20:59.545
इंद्रियज्ञान रुक जाता है और
अतीन्द्रियज्ञान प्रकट हो जाता है।

00:20:59.569 --> 00:21:10.834
बाद में इंद्रियज्ञान होता है
वह ज्ञान के ज्ञेय में जाता है,
कर्ता के कर्म में जाता नहीं है। आहाहा!

00:21:10.858 --> 00:21:17.527
यह एकदम शुरूआत की बात है।
किसी को लगे कि यह Metric (मेट्रिक) या
LLB (एल एल बी) की बात है, ऐसा नहीं है।

00:21:17.551 --> 00:21:25.732
शुरुआत, beginning धर्म की
शुरुआत संवर से होती है।
वृद्धि होती है तो निर्जरा होती है।

00:21:25.756 --> 00:21:30.620
पूर्ण होता है
तो मोक्ष पर्याय प्रगट होती है।

00:21:30.644 --> 00:21:43.132
संवर, निर्जरा और मोक्ष; संवर, निर्जरा
शुद्ध पर्याय है, अल्प वीतरागी परिणाम है
और मोक्ष पर्याय परिपूर्ण वीतरागदशा है।

00:21:43.156 --> 00:21:48.536
<b>ज्ञानका स्वरूप जाननक्रिया है,
इसलिये ज्ञान आधेय है</b>,

00:21:48.560 --> 00:21:55.705
ज्ञान अर्थात् द्रव्य, वो आधेय है
और जाननक्रिया आधार है।

00:21:55.729 --> 00:22:05.736
एक समय की अनित्य पर्याय, ये आधार
और यह आत्मा द्रव्य अनादि-अनंत आधेय।

00:22:05.760 --> 00:22:16.794
ज्ञान की पर्याय एक समय की, उपयोग,
उसके आधार से आत्मा है; ऐसा कहकर
क्रोध के आधार से आत्मा नहीं इतना बताना है।

00:22:16.818 --> 00:22:20.665
एक पर्याय में आत्मा आ जाता है
ऐसा बताना नहीं है।

00:22:20.689 --> 00:22:23.634
परंतु आत्मा किसमें जानने में आता है?
कि ज्ञान में।

00:22:23.658 --> 00:22:29.260
भैया! आत्मा किसमें जानने में आता है?
कि ज्ञान में।
तो ज्ञान की पर्याय तो अनित्य है।

00:22:29.284 --> 00:22:38.469
अनित्य में नित्य है। अनित्य में
- यानि अनित्य पर्याय में जानने में आया
- इस अपेक्षा से अनित्य में नित्य है।

00:22:38.493 --> 00:22:46.545
मगर क्रोध अनित्य है, उसमें तो (आत्मा)
है ही नहीं। इतना विवेक कराना है,
ऐसा सर्वथा नहीं मान लेना।

00:22:46.569 --> 00:22:52.460
क्रोध में नहीं है और उपयोग में है,
इतना बताने के लिए कहा। आहाहा!

00:22:52.484 --> 00:23:00.309
बाकी तो आत्मा आत्मा में है,
पर्याय में है नहीं।
पर्याय छूती नहीं है उसको। आहाहा!

00:23:00.333 --> 00:23:12.185
<b>ज्यां ज्यां जे जे योग्य छे, तहाँ समजवु तेह;
त्यां-त्यां ते ते आचरे, आत्मार्थी जन एह</b>
(आत्मसिद्धिशास्त्र गाथा ८)।

00:23:12.209 --> 00:23:20.580
<b> ज्ञानका स्वरूप जाननक्रिया है,
इसलिये ज्ञान आधेय है
और जाननक्रिया आधार है। </b>

00:23:20.604 --> 00:23:26.256
आहाहा! आधार है।
अब देखो आगे अभेद करते हैं।

00:23:26.280 --> 00:23:36.234
<b>जाननक्रिया आधार होनेसे</b>
पर्याय में द्रव्य जानने में आता है इसलिए
पर्याय के आधार से द्रव्य रहा हुआ है।

00:23:36.258 --> 00:23:42.900
तो <b>जाननक्रिया आधार होनेसे</b>
ऐसा कहा कि ज्ञान ही आधार है,
आत्मा ही आधार है।

00:23:42.924 --> 00:23:52.305
पहले भेद से पर्याय को आधार कहा,
अभेद से द्रव्य को आधार कहा।
आधार समझे?

00:23:52.329 --> 00:23:57.949
आधार क्या है?
कि ये (हाथ पर) पदार्थ है,
ये हाथ के आधार से है।

00:23:57.973 --> 00:24:05.016
तो हाथ है ना, हाथ,
वो है आधार
और वो (पदार्थ) है आधेय।

00:24:05.040 --> 00:24:11.034
हाथ में ये है। हाथ के आधार से
ये द्रव्य रहता है, दृष्टांत।
यह (पदार्थ) तो इसको छूता नहीं।

00:24:11.058 --> 00:24:16.167
आधार-आधेय संबंध नहीं है,
वो तो दृष्टांत (है)। आहाहा!

00:24:16.191 --> 00:24:20.683
ऐसा नहीं लेना कि हाथ के आधार से
(पदार्थ) रहा, ऐसा नहीं है।

00:24:20.707 --> 00:24:24.483
उसके (पदार्थ के) अंदर
आधार-आधेय नाम की शक्ति है।
अपने आधार से रहता है।

00:24:24.507 --> 00:24:33.349
हाथ को छूता ही नहीं है
वो तो आधार कहाँ से बन जाये?
हाथ को उसने स्पर्श नहीं किया। आहाहा!

00:24:33.373 --> 00:24:37.256
संयोग से देखनेवाले को
ये आधार-आधेय संबंध लगता है

00:24:37.280 --> 00:24:41.198
और दो द्रव्यों को भिन्न देखनेवाले को
आधार-आधेय संबंध - दिखता नहीं है।

00:24:41.222 --> 00:24:44.372
इसका (पदार्थ का) आधार-आधेय
इसमें (पदार्थ में) है, हाथ का
आधार-आधेय इसमें (हाथ में) है।

00:24:44.396 --> 00:24:47.669
हाथ के आधार से ये (पदार्थ) नहीं है और
इसके (पदार्थ के) आधार से ये (हाथ) नहीं है।

00:24:47.693 --> 00:24:58.749
मगर इधर ज्ञान की पर्याय के आधार से
जो द्रव्य कहा था, अभी अभेद करके
आत्मा के ही आधार से सब हैं।

00:24:58.773 --> 00:25:04.087
उपयोग के आधार से आत्मा कहा था,
अभी आत्मा के आधार से उपयोग है।

00:25:04.111 --> 00:25:18.909
अरे! उपयोग क्या? आत्मा आत्मा के आधार है।
बस! हो गया। आहाहा! भेद निकाल दिया।

00:25:18.933 --> 00:25:24.083
<b>जाननक्रिया आधार होनेसे यह
सिद्ध हुआ कि ज्ञान ही आधार है, </b>
आत्मा ही आधार है।

00:25:24.107 --> 00:25:30.638
आत्मा ही आत्मा का आधार है।
आत्मा के आधार से ज्ञान है, ऐसा भी नहीं।

00:25:30.662 --> 00:25:37.056
अभेद विवक्षा में तो आत्मा के आधार से
ही आत्मा रहा हुआ है, यह भी भेद है।

00:25:37.080 --> 00:25:43.172
आत्मा तो आत्मा है, बस!
वहाँ निर्विकल्पध्यान आ जाता है।

00:25:43.196 --> 00:25:47.847
समझाने के लिए
आधार-आधेय का भेद करना पड़ता है।

00:25:47.871 --> 00:25:55.718
वस्तु में आधार जुदी वस्तु और आधेय जुदी (वस्तु),
दो धर्म-भेद हैं परंतु वस्तु-भेद नहीं है।

00:25:55.742 --> 00:26:00.429
धर्म का भेद है,
आधार और आधेय एक पदार्थ के दो धर्म हैं।

00:26:00.453 --> 00:26:06.252
धर्म की विवक्षा से भेद है,
वस्तु से देखो तो एक है।

00:26:06.276 --> 00:26:16.318
किसको कहूँ मैं आधार और
किसको कहूँ मैं आधेय? आहाहा!

00:26:16.342 --> 00:26:21.336
<b>जाननक्रिया आधार होनेसे यह
सिद्ध हुआ कि ज्ञान ही आधार है, क्योंकि
जाननक्रिया और ज्ञान भिन्न नहीं हैं। </b>

00:26:21.360 --> 00:26:30.714
देखो! <b>जाननक्रिया </b>जो जाननक्रिया
आत्मा को जानती है, अतीन्द्रियज्ञान,
वो आत्मा से भिन्न नहीं है, अभिन्न है।

00:26:30.738 --> 00:26:37.820
अभेदनय से एक है, अभेदनय से एक है।
भेदनय से दो हैं, अभेदनय से एक है।

00:26:37.844 --> 00:26:47.212
दोनों ही विकल्प नहीं हैं; जो है सो है।
बस! वहाँ सब विकल्प छूट जाते हैं।

00:26:47.236 --> 00:26:56.318
इस तरह से <b>यह सिद्ध हुआ कि </b>
ऐसा सिद्ध <b>हुआ कि ज्ञान ज्ञान में है</b>।
आहाहा!

00:26:56.342 --> 00:27:06.620
ज्ञान ज्ञान में है यानि आत्मा आत्मा में है।
पहले आत्मा उपयोग में था,
अभी आत्मा आत्मा में ही है।

00:27:06.644 --> 00:27:16.300
उपयोग और आत्मा का भेद नहीं है।
भेद होने पर भी भेद दिखाई देता नहीं है।
आहाहा!

00:27:16.324 --> 00:27:24.683
<b>इसीप्रकार क्रोध क्रोधमें ही है।</b>
आहाहा! क्रोध क्रोध में है ज्ञान ज्ञान में है।

00:27:24.707 --> 00:27:32.029
दोनों भिन्न हो गए, भेदज्ञान हो गया।
क्रोध क्रोध में है और ज्ञान ज्ञान में है।

00:27:32.053 --> 00:27:40.185
<b>और </b>उपरांत
<b>क्रोधादिकमें, </b>यानि भावकर्म में,

00:27:40.209 --> 00:27:50.234
<b>कर्ममें</b>, ज्ञानावर्णादि आठ कर्म में
<b>या नोकर्ममें</b>, शरीर में
<b>ज्ञान नहीं है </b>आहाहा!

00:27:50.258 --> 00:27:59.558
दया, दान करुणा, कोमलता
के परिणाम में आत्मा नहीं है।
ये आत्मा का कर्तव्य नहीं है। आहाहा!

00:27:59.582 --> 00:28:02.465
सचमुच तो आत्मा का ज्ञेय नहीं है।

00:28:02.489 --> 00:28:14.536
वह तो इंद्रियज्ञान में ... ज्ञेय है;
मेरा ज्ञेय ये नहीं,
मेरा ज्ञेय तो मेरे पास है। आहाहा!

00:28:14.560 --> 00:28:20.536
<b>और क्रोधादिकमें, कर्ममें या
नोकर्ममें ज्ञान नहीं है </b>अचेतन जड़ है।

00:28:20.560 --> 00:28:26.367
भावकर्म भी अचेतन,
पाँच महाव्रत के परिणाम में आत्मा नहीं है।

00:28:26.391 --> 00:28:34.074
पाँच महाव्रत के परिणाम अचेतन-जड़ हैं
भावकर्म में गए। औदयिक भाव है।

00:28:34.098 --> 00:28:45.096
वो संवरतत्त्व नहीं है,
वो आस्रवतत्त्व है। आहाहा!
वो बंध का कारण है।

00:28:45.120 --> 00:28:48.536
तो करना कि नहीं करना?
करने नहीं करने की बात ही नहीं है।

00:28:48.560 --> 00:28:52.972
कालक्रम में आता है,
ज्ञानी उसको जानता है। बस!

00:28:52.996 --> 00:29:02.794
करता नहीं है ज्ञानी और
आए बिना भी रहता नहीं है और
ज्ञान में ज्ञेय भी हो जाता है। आहाहा!

00:29:02.818 --> 00:29:10.616
वो व्यवहारज्ञेय होता है,
निश्चयज्ञेय तो अपना आत्मा है अंदर।

00:29:10.640 --> 00:29:19.434
मगर शुद्धोपयोग नहीं है
इसलिए कहना पड़ता है कि ज्ञान का ज्ञेय है।

00:29:19.458 --> 00:29:25.874
बहुत अलौकिक बात है, समयसार की!
आहाहा!

00:29:25.898 --> 00:29:30.287
पढ़ने में CA (सीए) का पढ़े दस-दस,
बीस-बीस साल तक पढ़े।

00:29:30.311 --> 00:29:37.429
पचास वर्ष (की आयु में) परीक्षा देवे,
छोड़े नहीं तब तक थके नहीं है पढ़ने में।

00:29:37.453 --> 00:29:43.256
ऐसे case (मामला) बंबई में बहुत हैं।
परीक्षा देते ही रहते हैं, देते ही रहते हैं।

00:29:43.280 --> 00:29:47.794
वहाँ उनको time (समय) मिलता है,
इधर time (समय) नहीं मिलता है।

00:29:47.818 --> 00:29:51.309
छह महीने का time (समय) है,
ज्यादा तो time (समय) नहीं है।

00:29:51.333 --> 00:29:55.514
आचार्य भगवान ने कहा कि
अनुभव तो अंतर्मुहूर्त में होता है।

00:29:55.538 --> 00:30:05.220
कोई प्रमादी हो तो ज्यादा से ज्यादा
आत्मा का निर्णय और अनुभव
छह महीने में हो जाता है। आहाहा!

00:30:05.244 --> 00:30:11.883
निर्णय भी छह महीने और अनुभव भी।
निर्णय के बाद ज्यादा time (समय)
नहीं लगता है।

00:30:11.907 --> 00:30:18.558
मगर सब सुनता है, मानता है
लेकिन निर्णय नहीं करता है।
निर्णय की कीमत है।

00:30:18.582 --> 00:30:24.416
निर्णय अपने से होता है।
निर्णय पर से नहीं होता है।

00:30:24.440 --> 00:30:29.492
अपना निर्णय अपने से होता है,
मैं कौन हूँ? आहाहा!

00:30:29.516 --> 00:30:38.220
मेरे में क्या है? मैं करनेवाला
हूँ कि जाननेवाला हूँ? मैं पर को
जाननेवाला हूँ कि स्व को जाननेवाला हूँ?

00:30:38.244 --> 00:30:41.358
ऐसा निर्णय करना चाहिए।

00:30:41.382 --> 00:30:49.998
निर्णय अपने से होता है।
निर्णय कोई करा देवे ऐसी स्थिति नहीं है।

00:30:50.022 --> 00:30:56.812
सत्-समागम बहुत किया।
श्रीमद् राजचंद्रजी ने सत्-समागम
पर बहुत भार - वजन दिया है

00:30:56.836 --> 00:31:01.092
क्योंकि उस समय कुशील का संग सब करते थे।

00:31:01.116 --> 00:31:09.216
उस समय ऐसा था,
सौ वर्ष पहले ऐसा समय था।
तो सत्-समागम करो। आहाहा!

00:31:09.240 --> 00:31:15.905
सत्-समागम जो परपदार्थ यानि
ज्ञानी का संग, ज्ञानी का संग, आहाहा!

00:31:15.929 --> 00:31:29.416
अनंत बार किया। मगर एक सत्संग इधर
(अंदर) आत्मा का संग, असंगी का संग
नहीं किया। असंगी का संग कर लो! आहाहा!

00:31:29.440 --> 00:31:36.665
सत्संग के दो प्रकार हैं,
व्यवहार सत्संग और निश्चय सत्संग।
निश्चय सत्संग आत्मा के अंदर होगा।

00:31:36.689 --> 00:31:44.220
वो बात निमित्ताधीन दृष्टिवालों को
खटकती है कि पर के सत्-समागम
ऊपर वजन नहीं देते हैं।

00:31:44.244 --> 00:31:51.376
वजन देने जैसी चीज नहीं है
वो निमित्त का पक्ष है। आहाहा!

00:31:51.400 --> 00:31:58.256
सूक्ष्म मिथ्यात्व का शल्य है।
तो क्या ज्ञानी का समागम नहीं करना?

00:31:58.280 --> 00:32:03.460
करने नहीं करने की बात नहीं है।
जानने की बात है।

00:32:03.484 --> 00:32:06.967
ये समागम नहीं किया क्या?
अनंतकाल से समागम तो करते थे।

00:32:06.991 --> 00:32:15.034
हें? तीर्थंकर की सभा में गए कि नहीं?
अनंत बार गए। तो उत्कृष्ट में
उत्कृष्ट समागम तो था कि नहीं?

00:32:15.058 --> 00:32:23.363
हें? तो जब सत्-समागम कार्य की
उत्पत्ति में नियमरूप कारण बनता होगा,
तो-तो (कार्य) बनना चाहिए।

00:32:23.387 --> 00:32:30.492
निमित्तकारण तो था उत्कृष्ट!
कार्य की उत्पत्ति उपादान से होती है,
तीनकाल में निमित्त से होती नहीं।

00:32:30.516 --> 00:32:42.016
निमित्त हाज़िर हो कि न हो
कार्य तो उपादान से होता है,
निमित्त से होता नहीं है। आहाहा!

00:32:42.040 --> 00:32:48.376
ऐसा श्लोक आया कि
पूरा ही व्यवहार छुड़ाते हो, तो
मुनियों का क्या होगा? निराश्रित हो जायेंगे।

00:32:48.400 --> 00:32:53.580
कि नहीं!
मुनियों को आत्मा की शरण है।
आहाहा!

00:32:53.604 --> 00:33:00.678
पर अनंत-अनंतकाल से यह पक्ष पड़ गया
है जीवों को, निमित्ताधीन दृष्टि। आहाहा!

00:33:00.702 --> 00:33:08.696
निमित्त हो तो कुछ अच्छा काम होवे।
निमित्त अकिंचित्कर है। आहाहा!

00:33:08.720 --> 00:33:12.883
आत्मा की पर्याय को फेरने
की ताकत निमित्त की नहीं।

00:33:12.907 --> 00:33:20.936
यहाँ फिरे तब निमित्त को उपकार
कहने में आता है कि आपके उपकार
से हमें सम्यग्दर्शन हुआ। आहाहा!

00:33:20.960 --> 00:33:25.460
ऐसे उपकार के शब्द भी आते हैं।
उपकार ઓળવે (भूले) नहीं।

00:33:25.484 --> 00:33:32.696
सज्जन हैं,
वो उपकार को भूलते नहीं। आहाहा!

00:33:32.720 --> 00:33:39.776
मगर निमित्ताधीन दृष्टि तो
अनादिकाल से है। तो ज्ञान की
उत्पत्ति निमित्तकारण से नहीं होती है।

00:33:39.800 --> 00:33:45.203
परलक्ष अभावात् चंचलता रहितम् अचलम ज्ञानम्
(चेतनत्वं ... <b>अचलं परलक्ष्येऽभावाच्चंचलता-रहितं अचलम्</b>
- परम अध्यात्म तरंगिणी, समयसार कलश ४२ की टीका)।

00:33:45.227 --> 00:33:56.589
ज्ञान की उत्पत्ति आत्मा के आश्रय से होती है;
शास्त्र के आश्रय से, शास्त्र के लक्ष से
ज्ञान की उत्पत्ति होती नहीं है। आहाहा!

00:33:56.613 --> 00:34:00.949
कि निश्चय की बात यानि वास्तविक बात है।

00:34:00.973 --> 00:34:06.247
शास्त्र तो सब पढ़ते हैं समयसार,
तो सबको सम्यग्ज्ञान होना चाहिए।

00:34:06.271 --> 00:34:13.558
द्रव्यलिंगी मुनि भी शास्त्र पढ़ते हैं
तो आत्मज्ञान नहीं हुआ। आहाहा!

00:34:13.582 --> 00:34:20.083
आत्मा से आत्मा का ज्ञान होता है।
परज्ञेय से आत्मा का ज्ञान नहीं होता है।

00:34:20.107 --> 00:34:24.727
ज्ञेय में से ज्ञान नहीं आता है
और ज्ञेय से ज्ञान नहीं होता है।

00:34:24.751 --> 00:34:28.474
ज्ञायक से ज्ञान होता है
और ज्ञायक में से ज्ञान आता है।

00:34:28.498 --> 00:34:35.549
आता है ज्ञायक में जाता भी है ज्ञायक में।
ज्ञान आता भी अंदर में से है
और जाता भी अंदर है।

00:34:35.573 --> 00:34:42.500
राग बाहर रह जाता है,
राग अंदर नहीं जाता है। आहाहा! 

00:34:42.524 --> 00:34:46.500
<b>और क्रोधादिकमें,
कर्ममें या नोकर्ममें ज्ञान </b>
अर्थात् आत्मा <b>नहीं है</b>,

00:34:46.524 --> 00:34:54.287
शुद्धात्मा वह राग की क्रिया में नहीं है,
जड़-कर्म में नहीं है, शरीर में नहीं है।

00:34:54.311 --> 00:35:00.047
<b>तथा ज्ञानमें क्रोधादिक,
कर्म या नोकर्म नहीं हैं</b>, आहाहा!

00:35:00.071 --> 00:35:05.300
उसमें (क्रोधादि में) ज्ञान नहीं है
और ज्ञान में क्रोधादि नहीं हैं।

00:35:05.324 --> 00:35:11.816
ज्ञान में यानि आत्मा में, शुद्धात्मा में,
ज्ञायक आत्मा में क्रोधादि नहीं है।

00:35:11.840 --> 00:35:19.745
क्रोधादि एक समय की बाहर की पर्याय में हैं।
पर्याय में क्रोध है और द्रव्य में क्रोध नहीं है।

00:35:19.769 --> 00:35:28.612
क्रोध क्रोध में है मगर मेरे में नहीं है।
उसका नाम अस्ति-नास्ति अनेकांत है।
आहाहा!

00:35:28.636 --> 00:35:31.692
पर्याय की कौन ना बोलता है?
पर्याय तो है पर्याय में।

00:35:31.716 --> 00:35:35.212
मगर क्रोध पर्याय में होता है;
विभाव स्वभाव में (नहीं हैं)।

00:35:35.236 --> 00:35:41.549
स्वभाव और विभाव अलग-अलग हैं
दो चीज, दो की सत्ता न्यारी है।
अशुद्ध उपादान। आहाहा!

00:35:41.573 --> 00:35:50.296
<b>उनमें एक सत्ताकी अनुपपत्ति है </b>
दूसरी पंक्ति में,
टीका की दूसरी पंक्ति, है कि नहीं?

00:35:50.320 --> 00:35:55.963
<b>उनमें एक सत्ताकी अनुपपत्ति है </b>
कि क्रोध और आत्मा एक है, ऐसा है नहीं।

00:35:55.987 --> 00:36:02.785
दोनों की सत्ता न्यारी-न्यारी हैं।
एक में दूसरे का अभाव है।
आत्मा में राग का (अभाव है)।

00:36:02.809 --> 00:36:11.567
ये अँगुली दो हैं ना?
तो दो कब सिद्ध हो?
एक में दूसरे की नास्ति तब दो सिद्ध हों।

00:36:11.591 --> 00:36:14.158
कि (निज)
भगवान आत्मा की सिद्धि कब होती है?

00:36:14.182 --> 00:36:20.296
कि (निज) आत्मा आत्मारूप है
और देहरूप नहीं है, (निज) आत्मा
आत्मारूप है और जड़ कर्मरूप नहीं है,

00:36:20.320 --> 00:36:30.229
(निज) आत्मा आत्मारूप है और रागरूप नहीं है
- ऐसा अस्ति-नास्ति अनेकांत,
ये भेदज्ञान परक अनेकांत अमृत है।

00:36:30.253 --> 00:36:35.487
भेदज्ञान परक अनेकांत अमृत है।

00:36:35.511 --> 00:36:45.052
अनेकांत यानि अनंत धर्म को जाने वो
अनेकांत, वो तो अनेकांत का फल है।

00:36:45.076 --> 00:36:54.709
वो तो ज्ञान है, वो तो प्रमाणज्ञान है।
प्रमाणज्ञान नयपूर्वक होता है। आहाहा!

00:36:54.733 --> 00:37:01.443
देखो! अनेकांत के तीन प्रकार हैं।
अनेकांत के तीन प्रकार हैं।

00:37:01.467 --> 00:37:09.803
अनेकांत दो प्रकार है,
वो भेदज्ञानपूर्वक है और
तीसरा अनेकांत भेदज्ञान का फल है।

00:37:09.827 --> 00:37:15.834
तो पहले दो अनेकांत की बात मैं कहता हूँ,
कि स्वचतुष्टय में परचतुष्टय की नास्ति है।

00:37:15.858 --> 00:37:23.989
यानि द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव इधर
(अंदर) हैं, प्रमाण का द्रव्य, तो
प्रमाण के द्रव्य में परद्रव्य की नास्ति है।

00:37:24.013 --> 00:37:30.034
लोकालोक मेरे में हैं ही नहीं।
लोकालोक मेरे में नहीं है,
ऐसा मैं द्रव्य-गुण-पर्यायवाला।

00:37:30.058 --> 00:37:31.358
<b>गुणपर्ययवत् द्रव्यं </b>
(तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ५ सूत्र ३८),

00:37:31.382 --> 00:37:38.572
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>
(तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ५ सूत्र ३०)
वो स्वचतुष्टय में परचतुष्टय की नास्ति है,

00:37:38.596 --> 00:37:43.194
ऐसा <b>अस्ति-नास्ति अनेकांत वो
भेदज्ञान परक</b> (सिद्धांतों की
सरवाणी बोल ६१) हो गया।

00:37:43.218 --> 00:37:53.314
पर से भिन्न पड़ गया आत्मा!
कुटुंब से, पैसे से, जवाहरात से भिन्न
पड़ गया वो मेरे में नहीं हैं। आहाहा!

00:37:53.338 --> 00:37:58.229
तो मेरे में क्या है? द्रव्य-गुण-पर्याय।
सब ले लो अंदर में, कोई परेशानी नहीं है।

00:37:58.253 --> 00:38:06.252
पर से भिन्न पड़ गया।
एक अनेकांत ये है।
अनेकांत भेदज्ञान परक है।

00:38:06.276 --> 00:38:13.776
अनेकांत खिचड़ी (मिलावट) नहीं करता है
ऐसा भी है ऐसा भी है,
ऐसा अनेकांत नहीं है। आहाहा!

00:38:13.800 --> 00:38:16.896
ऐसा है।
चलती है बहुत बात।

00:38:16.920 --> 00:38:26.945
एक दफे मैं गया साहूजी के पास।
समझे? दो-चार दिन गया था, कुछ काम था।

00:38:26.969 --> 00:38:31.865
तो मैं सोनगढ़वाला हूँ
ऐसा तो वो जानते थे।
वो तो जाने न? हें?

00:38:31.889 --> 00:38:37.567
मेरे को (कहा) भैया!
जैनधर्म अनेकांत है।
बराबर है साहब!

00:38:37.591 --> 00:38:42.940
मगर अनेकांत का स्वरूप क्या?
मैंने बोला ही नहीं कुछ,
मैंने तो सुन लिया।

00:38:42.964 --> 00:38:47.456
मैंने तो सुन लिया।
उसमें क्या?
चर्चा का विषय नहीं है वो। आहाहा!

00:38:47.480 --> 00:38:53.647
अनेकांत झंडा हमेरा,
अनेकांतवाद है, स्याद्वाद है हमारा,
trademark (खास निशान) है।

00:38:53.671 --> 00:39:01.167
स्याद्वाद आत्मा में है कि ज्ञान की,
अनुभव ज्ञान की पर्याय में रहता है?
आहाहा!

00:39:01.191 --> 00:39:07.358
शुद्धात्मा में स्याद्वाद का अभाव है
और आत्मज्ञान में स्याद्वाद का सद्भाव है।

00:39:07.382 --> 00:39:14.998
आत्मज्ञान में है,
शास्त्रज्ञान में स्याद्वाद नहीं है।
आहाहा!

00:39:15.022 --> 00:39:21.078
तो पहले दो (द्रव्य) - स्वद्रव्य से
परद्रव्य की भिन्नता स्वचतुष्टय।
समझ में आया?

00:39:21.102 --> 00:39:25.718
आया ना यहाँ पर।
देह से मेरा आत्मा भिन्न है
और मेरे परिणाम से आत्मा अभिन्न है।

00:39:25.742 --> 00:39:30.163
भले राग ले लो, उपयोग ले लो,
सब ले लो खिचड़ी, कोई बात नहीं है।
समझे?

00:39:30.187 --> 00:39:41.803
दो द्रव्य की भिन्नता में सब ले लेना।
मिथ्यात्व की पर्याय आत्मा में है,
पर में नहीं है, पर से नहीं है। समझे?

00:39:41.827 --> 00:39:44.554
वो नवतत्त्व में आ गया।
आहाहा!

00:39:44.578 --> 00:39:52.323
प्रमाण में आ गया,
द्रव्य-गुण-पर्याय विकार-अविकार
सब। बाद में दूसरा अनेकांत है।

00:39:52.347 --> 00:39:56.127
उसको प्रमाण सप्तभंगी कहा जाता है,
शास्त्र भाषा।

00:39:56.151 --> 00:40:02.709
अभी नय सप्तभंगी दूसरी है कि
ज्ञायक में प्रमत्त-अप्रमत्त नहीं है।

00:40:02.733 --> 00:40:11.812
चौदह गुणस्थान की आत्मा में नास्ति है।
सम्यग्दर्शन का आत्मा में अभाव है।
मोक्ष का आत्मा में अभाव है।

00:40:11.836 --> 00:40:19.972
द्रव्य में पर्याय की नास्ति है,
ऐसी मेरी अस्ति है। उसका
अनुभव करने से आत्मज्ञान होता है।

00:40:19.996 --> 00:40:28.118
तो आत्मज्ञान में, अभी तीसरे नंबर आया,
अनंत धर्मात्माक पूरा आत्मा
जानने में आ गया।

00:40:28.142 --> 00:40:33.834
उसका नाम अनेकांत प्रमाण है,
अनेकांत प्रमाणज्ञान हो गया।

00:40:33.858 --> 00:40:40.398
उसका तो फल है,
भेदज्ञान का फल अनेकांत है।
आहाहा!

00:40:40.422 --> 00:40:46.740
अनेकांत के तीन प्रकार बताए।
अनेकांत कि आत्मा के आश्रय से धर्म होता है

00:40:46.764 --> 00:40:51.785
और व्यवहार रत्नत्रय से धर्म होता है
ऐसा अनेकांत नहीं है!

00:40:51.809 --> 00:41:00.376
आत्मा से आत्मा का ज्ञान होता है
और शास्त्र से भी आत्मा का ज्ञान होता है,
ऐसा अनेकांत नहीं है। आहाहा!

00:41:00.400 --> 00:41:09.532
वो तो अज्ञान है। आत्मा से आत्मज्ञान
होता है और शास्त्र से नहीं होता है,
उसका नाम अस्ति-नास्ति अनेकांत है।

00:41:09.556 --> 00:41:13.994
तो शास्त्र का लक्ष छूटकर
अंदर लक्ष आ जाता है। आहाहा!

00:41:14.018 --> 00:41:18.398
शास्त्र होता है पहले,
शास्त्र ने बताया कि मेरा लक्ष छोड़ दे।

00:41:18.422 --> 00:41:26.660
<b>पर लक्ष अभावात्</b>, पर के लक्ष से
ज्ञान तीनकाल में प्रगट नहीं होता है,
अज्ञान प्रगट होता है, अज्ञान। आहाहा!

00:41:26.684 --> 00:41:39.518
सतीश हाँ पाड़ता है। बुद्धिगम्य चीज है,
जैनदर्शन है न, ये बुद्धिगम्य है।
ऐसा अंधश्रद्धा का विषय नहीं है।

00:41:39.542 --> 00:41:48.567
आचार्य भगवान फ़रमाते हैं कि
मैं एकत्व-विभक्त आत्मा की बात कहूँगा
मगर तू अनुभव से प्रमाण करना।

00:41:48.591 --> 00:41:54.532
हमने तो अनुभव से प्रमाण कर लिया है,
तू भी अनुभव से प्रमाण कर लेना।

00:41:54.556 --> 00:42:01.216
सफेद है, वो सब शक्कर नहीं होती है।
सफेद सो शक्कर, सफेद सो शक्कर।

00:42:01.240 --> 00:42:08.136
तो शक्कर भी सफेद है
और फिटकरी भी सफेद।
ऐसा नहीं है, अनुभव से प्रमाण कर।

00:42:08.160 --> 00:42:14.914
तेरे पास फिटकरी भी आयी
और शक्कर भी आयी, दोनों
को जीभ पर लगाना। लगा दे।

00:42:14.938 --> 00:42:18.896
फिटकरी लगाई – 'अह!’ (नहीं) नहीं!
शक्कर (लगाई), हाँ! यह शक्कर है।

00:42:18.920 --> 00:42:27.807
अनुभव से प्रमाण होता है।
सब बात अनुभव से प्रमाण होती है।
आहाहा!

00:42:27.831 --> 00:42:33.727
मगर सारा समय मिलता है उसको,
व्यापार-धंधे का चौबीस घंटे, गधा-मजूरी।

00:42:33.751 --> 00:42:37.816
बंबई में तो सुबह नौ बजे जाये।
आहाहा! बाबूभाई!

00:42:37.840 --> 00:42:43.069
बंबई में तो सुबह नौ बजे जाते हैं,
रात को नौ-दस बजे आवे। आहाहा!

00:42:43.093 --> 00:42:50.647
बच्चे सुबह में उठे न हों
और ये चला जाये और
रात को आए तो बच्चे सो गए हों;

00:42:50.671 --> 00:43:02.074
तो दस साल तक उसके पिता
को पहचाने नहीं वो बच्चा।
यह तो स्थिति है मुंबई की। आहाहा!

00:43:02.098 --> 00:43:05.194
मगर इसके (स्वाध्याय के) लिए
उसको time (समय) निकालना चाहिए।

00:43:05.218 --> 00:43:10.954
थोड़ा time (समय) तो घंटे, दो घंटे,
चार घंटे तो निकालना चाहिए। आहाहा!

00:43:10.978 --> 00:43:16.572
कम से कम एक घंटा तो निकालना
चाहिए स्वाध्याय, चिंतवन, मनन।

00:43:16.596 --> 00:43:22.514
सम विचारवाले जीव हों
उनके साथ चर्चा करे। आहाहा!

00:43:22.538 --> 00:43:28.394
और साहित्य तो कितना बाहर आ गया है।
११ भाग में तो प्रवचन रत्नाकर बाहर आ गए हैं।

00:43:28.418 --> 00:43:35.309
नौ हज़ार तो टेप हैं। आहाहा!
साधन तो बहुत हैं बाहर का।

00:43:35.333 --> 00:43:40.878
एक बार मैं कलकत्ता गया था
वाँचन के लिए। शाम को एक
दूसरी जगह गया भोजन करने।

00:43:40.902 --> 00:43:47.114
अपने साधर्मियों के घर भोजन के लिए
जाना हो न तो भोजन में थोड़ा समय था।

00:43:47.138 --> 00:43:50.056
तो मैंने कहा जरा समयसार दो ना।
समझ गए?

00:43:50.080 --> 00:43:54.678
तो समयसार तो दिया
उन्होंने मगर पन्ने सब चिपके हुये।
उसने कभी पढ़ा ही नहीं किसी दिन।

00:43:54.702 --> 00:43:58.540
मैंने कहा ये क्या, आपने?
समयसार - पन्ने तो चिपके हुये हैं,
पढ़ते नहीं?

00:43:58.564 --> 00:44:09.829
भाई साहब! पढ़ा नहीं है।
ऐसी तो स्थिति है। बोलो! उनको
time (समय) नहीं है। आहाहा!

00:44:09.853 --> 00:44:17.114
जब मृत्यु का time आयेगा, तब time माँगेगा,
तो यमराज तेरे को time नहीं देगा।

00:44:17.138 --> 00:44:19.967
यह तो दृष्टांत है, हो!
कोई यम-वम नहीं है।

00:44:19.991 --> 00:44:25.429
आयुष्य पूरा होने का (समय) होगा,
तब समय माँगेगा तो time नहीं मिलेगा।

00:44:25.453 --> 00:44:32.589
अभी समय है, side business 
(दूसरा व्यवसाय) तो शुरू करो। 
side business  समझे?

00:44:32.613 --> 00:44:40.172
side business यानि थोड़ा time (समय) 
निकाल करके बाकी का व्यापार-रोजगार की 
प्रवृत्ति भले हो, परंतु side business तो शुरू करो।

00:44:40.196 --> 00:44:43.372
बाद में main (मुख्य) 
business (व्यापार) हो जाता है।

00:44:43.396 --> 00:44:50.901
side business में अगर अंदर मजा आती है 
तो main business हो जाता है।

00:44:50.925 --> 00:44:58.474
लड़के को कहता है कि तुम चलाओ दुकान। 
अच्छा! सतीश तुम दुकान चलाओ, 
रजनी दुकान चलाओ।

00:44:58.498 --> 00:45:04.172
भोगीभाई हैं, 
ध्यान रखेंगे मैं छोड़ता हूँ। 
तो लड़के भी खुश होते हैं।

00:45:04.196 --> 00:45:09.425
भले धर्म ध्यान करे, 
मुझे बाधा डालते थे ऐसा नहीं!

00:45:09.449 --> 00:45:16.972
ये तो थोड़े, ये कुटुंब की बात नहीं है, 
ये तो दूसरों को ऐसा - अच्छा हुआ 
बाधा डालना मिट गया! समझ गए? आहाहा! 

00:45:16.996 --> 00:45:25.807
पुत्र का फर्ज़ है कि माता-पिता को 
धर्म कि और झुकावे। पुत्र का फ़र्ज है 
माता-पिता को धर्म कि और झुकावे। आहाहा!

00:45:25.831 --> 00:45:33.496
आपने बहुत किया अभी निवृत्ति 
लेकर धर्मध्यान करो। आहाहा!

00:45:33.520 --> 00:45:39.856
मगर इसको, आहाहा! इसको विश्वास नहीं है 
कि मेरा सुख मेरे में है और इधर से 
आएगा - उसको विश्वास नहीं है।

00:45:39.880 --> 00:45:48.230
सुख बाहर में से ढूँढता है। सुख बाहर 
में से ढूँढता है, परंतु सुख आनेवाला 
नहीं है, मृगजल है। आहाहा!

00:45:48.254 --> 00:45:52.319
तृषा मिटती नहीं उसमें, 
मर जाये।

00:45:52.343 --> 00:45:59.167
<b>ज्ञानमें क्रोधादिक, कर्म या 
नोकर्म नहीं हैं क्योंकि उनके </b>
देखो! <b>उनके </b>न्याय देते हैं।

00:45:59.191 --> 00:46:04.616
<b>परस्पर अत्यन्त </b>सर्वथा 
<b>स्वरूप-विपरीतता होनेसे </b>

00:46:04.640 --> 00:46:15.256
ज्ञान और क्रोध अत्यंत भिन्न-भिन्न हैं 
क्योंकि दोनों की स्वरूप विपरीतता है, 
एक चेतन और दूसरा जड़। आहाहा!

00:46:15.280 --> 00:46:19.950
स्वभाव से भिन्न हैं, 
स्वरूप विपरीतता है। 
दोनों का विपरीत स्वरूप हैं।

00:46:19.974 --> 00:46:26.923
<b>अर्थात् ज्ञानका स्वरूप और 
क्रोधादिक तथा कर्म-नोकर्मका 
स्वरूप अत्यन्त विरुद्ध होनेसे</b>,

00:46:26.947 --> 00:46:35.332
एक जड़ और एक चेतन है। 
आत्मा जाननेवाला चेतन है और 
रागादि जानने में आते हैं वे अचेतन हैं।

00:46:35.356 --> 00:46:40.270
स्वरूप की विपरीतता है इसलिए 
दोनों की सत्ता न्यारी-न्यारी है। आहाहा!

00:46:40.294 --> 00:46:45.812
आत्मा की सत्ता में ज्ञान होता है और 
पराश्रित पर्याय की सत्ता में राग होता है।

00:46:45.836 --> 00:46:56.047
आत्मा की सत्ता में ज्ञान होता है 
और पराश्रित पर्याय उसकी सत्ता में 
राग होता है। आहाहा!

00:46:56.071 --> 00:47:03.399
<b>अत्यन्त विरुद्ध होनेसे 
उनके परमार्थभूत आधारआधेयसम्बन्ध 
नहीं है। </b>आहाहा!

00:47:03.423 --> 00:47:08.114
आत्मा के आधार से राग नहीं है। 
राग अद्धर से होता है।

00:47:08.138 --> 00:47:17.319
राग होता है न, अद्धर से होता है। 
आत्मा कर्ता होता है इसलिए 
राग होता है ऐसा नहीं है।

00:47:17.343 --> 00:47:31.647
क्या कहा? सूक्ष्म बात है। 
आत्मा जो करे तो राग हो ऐसा नहीं है, 
राग स्वयं होता है।

00:47:31.671 --> 00:47:41.687
अज्ञानी का आत्मा भी कर्ता नहीं है 
क्योंकि राग को करने का 
आत्मा में स्वभाव ही नहीं है।

00:47:41.711 --> 00:47:46.074
आत्मा में कोई गुण ही नहीं है 
कि राग की रचना करे।

00:47:46.098 --> 00:47:56.216
हाँ! इतना सही है कि राग स्वयं उत्पन्न होता है, 
राग के ऊपर दृष्टि है तो अज्ञानी मान लेता 
है कि राग को मैं करनेवाला हूँ।

00:47:56.240 --> 00:47:59.687
तो कर्ताबुद्धि होती है 
तो अज्ञान होता है।

00:47:59.711 --> 00:48:09.190
एक दफे शिविर में कहा, 
राजकोट के शिविर में पंडित जी थे 
हुकुमचंद जी, पास में।

00:48:09.214 --> 00:48:15.216
बात निकली जैसे आज निकली ऐसी, 
अज्ञानी का आत्मा राग का कर्ता नहीं है।

00:48:15.240 --> 00:48:21.399
राग होता है तब मैं करनेवाला होता हूँ 
उसका नाम अज्ञान है।

00:48:21.423 --> 00:48:24.625
अज्ञानी है इसलिए राग करता है, 
ऐसा नहीं है।

00:48:24.649 --> 00:48:30.314
राग होता है स्वयं, मानता है कि 
मैंने किया तो अज्ञानी बन जाता है।

00:48:30.338 --> 00:48:41.674
राग के करने से अज्ञानी बना ऐसा नहीं है। 
कर्ता ही नहीं है आत्मा। 
समझ में आया कुछ?

00:48:41.698 --> 00:48:51.447
राग स्वयं होता है, होने योग्य होता है। 
अपने स्वकाल में, स्वभाव में प्रगट होता है। 
जन्मक्षण है उसका।

00:48:51.471 --> 00:49:01.043
इधर ज्ञान प्रगट होता है, ज्ञान में वो ज्ञेय 
जानने में आता है, तो मैं जाननहार हूँ वो 
भूल गया; मैं रागी तो अज्ञानी बन जाता है।

00:49:01.067 --> 00:49:08.923
अज्ञानी है इसलिए राग का कर्ता है, ऐसा नहीं है। 
वो उपदेश कथन में ऐसा आता है कि 
अज्ञान है तब तक राग का कर्ता है।

00:49:08.947 --> 00:49:17.994
मालूम है सब हमको शास्त्र की भाषा। 
शास्त्र की भाषा है; आहाहा! 
आत्मा की भाषा जुदी है। आहाहा!

00:49:18.018 --> 00:49:27.834
समझाने के लिए क्या करें अज्ञानी राग 
का कर्ता है। नहीं! राग का कर्ता 
मानता है तो अज्ञानी बन जाता है।

00:49:27.858 --> 00:49:34.554
तो पंडित जी खुश हो गए। आहाहा! 
हुकुमचंदजी (ने कहा) 
वो बात आप की बराबर है।

00:49:34.578 --> 00:49:38.825
पंडित जी ने स्वीकार कर लिया। हो! 
बराबर (सही) है आपकी बात।

00:49:38.849 --> 00:49:45.074
आत्मा राग का कर्ता है तो-तो 
नित्य कर्तापना चालू रहे, 
तो छूटे ही नहीं।

00:49:45.098 --> 00:49:53.296
राग राग से होता है दृष्टि राग पर है, 
तो मैंने राग किया तो अज्ञानी बन जाता है।

00:49:53.320 --> 00:50:00.296
राग उत्पन्न होता है इसलिए अज्ञानी नहीं है। 
राग तो, राग की उत्पत्ति तो 
साधक को भी होती है कि नहीं?

00:50:00.320 --> 00:50:06.274
पाँच महाव्रत का परिणाम? 
तो पाँच महाव्रत के परिणाम की 
उत्पत्ति अज्ञान नहीं है।

00:50:06.298 --> 00:50:17.879
उसको मैं करता हूँ, तो ज्ञान का 
अज्ञान हो जाता है और मैं जानता हूँ 
तो ज्ञान रह जाता है। आहाहा!

00:50:17.903 --> 00:50:24.999
<b>क्योंकि उनके</b>... <b>(अर्थात् 
ज्ञानका स्वरूप और क्रोधादिक तथा कर्म-
नोकर्मका स्वरूप अत्यन्त विरुद्ध होनेसे)</b>

00:50:25.023 --> 00:50:28.870
एक जड़ और (एक) चेतन, 
चेतन, चेतना।

00:50:28.894 --> 00:50:32.683
चेतन भी राग को नहीं करे और 
चेतना भी राग को नहीं करती है।

00:50:32.707 --> 00:50:42.145
चेतन तो द्रव्य है और चेतना तो 
ज्ञान की पर्याय है। ज्ञान की पर्याय 
भी राग को नहीं करे, आहाहा!

00:50:42.169 --> 00:50:52.367
क्योंकि ज्ञान की पर्याय में राग नहीं है 
इसलिए कर्ता नहीं है। ज्ञान की पर्याय 
में राग आ जावे तो-तो करे।

00:50:52.391 --> 00:51:00.225
ज्ञान की पर्याय में ही राग नहीं है तो 
ज्ञायक में तो राग कहाँ से आवे? आहाहा!

00:51:00.249 --> 00:51:03.141
राग को आत्मा में स्थाप दिया है। 
आहाहा!

00:51:03.165 --> 00:51:10.919
आत्मा में तो नहीं है मगर जो 
सामान्य उपयोग प्रगट होता है, 
उसमें भी राग नहीं है। आहाहा!

00:51:10.943 --> 00:51:16.456
सचमुच तो उपयोग में आत्मा जानने में 
आता है, राग जानने में आता नहीं है।

00:51:16.480 --> 00:51:19.754
मगर मैं राग को जानता हूँ 
तो अज्ञानी बन जाता है।

00:51:19.778 --> 00:51:27.287
राग को करता हूँ तो भी अज्ञानी और 
राग जानने में आया तो भी अज्ञानी है। 
आहाहा!

00:51:27.311 --> 00:51:31.736
ज्ञानी राग को नहीं जानता है, 
राग संबंधी अपने ज्ञान को जानता है।

00:51:31.760 --> 00:51:37.719
राग संबंधी अपने ज्ञान को जानता है 
कि जिस ज्ञान में ज्ञायक जानने में आता है, 
आहाहा!

00:51:37.743 --> 00:51:46.865
ऐसा ज्ञान की पर्याय का स्वभाव है।

00:51:46.889 --> 00:51:50.421
<b>अत्यंत विरुद्ध होनेसे उनके 
परमार्थभूत आधारआधेयसम्बन्ध नहीं है। </b>

00:51:50.445 --> 00:51:54.776
आत्मा के आधार से राग नहीं होता है, 
अद्धर से होता है।

00:51:54.800 --> 00:52:01.536
आधार-आधेय संबंध पर्याय के साथ है; 
षट्कारक कर्ता, कर्म, करण, 
करण यानि साधन, आहाहा!

00:52:01.560 --> 00:52:05.501
आधार है उसमें। 
आधार नाम का धर्म है पर्याय में।

00:52:05.525 --> 00:52:14.087
पर्याय में आधार नाम का धर्म है, 
कर्ता नाम का धर्म, कर्म, करण, संप्रदान, 
अपादान और अधिकरण यानि आधार।

00:52:14.111 --> 00:52:21.327
पर्याय के आधार से राग होता है, 
द्रव्य के आधार से राग होता नहीं है। 
आहाहा!

00:52:21.351 --> 00:52:28.096
ये उदयभाव पर्याय के साथ तन्मय है; 
ज्ञायक के साथ उदयभाव तन्मय नहीं रहता है।

00:52:28.120 --> 00:52:37.261
ज्ञायक के साथ तो पारिणामिकभाव तन्मय है 
और पर्याय का उदयभाव पर्याय के साथ तन्मय है।

00:52:37.285 --> 00:52:41.919
तन्मय एक समय जितना है। 
तो उदयभाव कहाँ तन्मय है?

00:52:41.943 --> 00:52:48.221
पर्याय में तन्मय है। 
द्रव्य में आता ही नहीं है राग आहाहा!

00:52:48.245 --> 00:52:55.705
द्रव्य उसको छूता ही नहीं है। 
एक जड़ और एक चेतन, परमार्थ का 
आधार-आधेय संबंध नहीं है - ऐसा पाठ है।

00:52:55.729 --> 00:53:03.720
उसमें लिखा है, उसका अर्थ चलता है। 
<b>परमार्थभूत आधारआधेयसम्बन्ध नहीं है।</b>