﻿WEBVTT

00:01:06.616 --> 00:01:14.114
आज का दिवस, दिन,
मांगलिक दिन है।

00:01:14.138 --> 00:01:28.019
मांगलिक दिन का कारण ये (है कि)
जो इस काल की चौबीसी है,
चौबीस तीर्थंकर भगवान हो गये,

00:01:28.043 --> 00:01:50.370
उसमें प्रथम, पहले तीर्थंकर प्रभु
आदिनाथ भगवान का आज जन्म हो गया।
भारत का भाग्य आज खुल गया।

00:01:50.394 --> 00:02:06.732
भाग्य खुल गया (इसका अर्थ) क्या?
कई जीवों का मोक्ष भी हो गया उनके
निमित्त से, ऐसा अपूर्व बनाव बन गया।

00:02:06.756 --> 00:02:26.579
तो आज का दिन मांगलिक है। तीर्थंकर
भगवान का जो जन्म है वो प्राणी मात्र के
लिए हित का कारण है, प्राणी मात्र के लिए।

00:02:26.603 --> 00:02:43.085
तो आज का दिन मांगलिक है।
उसमें ये मांगलिक गाथा, १३ नंबर
की गाथा का स्वाध्याय चलता है।

00:02:43.109 --> 00:02:57.836
इसमें जो व्यवहारनय का जो विषय है,
नवतत्त्व का जो भेद है, जो परिणाम है,

00:02:57.860 --> 00:03:13.168
वो परिणाम, जीव नहीं होने पर भी
उसमें जीव का भ्रम हो गया है।

00:03:13.192 --> 00:03:22.739
तो सच्चा जीव, परमार्थ-जीव,
पारमार्थिक-जीव, भूतार्थ-जीव,
उसकी दृष्टि में आता नहीं है।

00:03:22.763 --> 00:03:36.134
वो परिणाम जीव नहीं है,
उसके दो कारण हैं।

00:03:36.158 --> 00:03:51.072
एक तो जो ये परिणाम है, वो अनित्य है,
नाशवान है; जीव तो अविनाशी तत्त्व है।

00:03:51.096 --> 00:04:08.236
दूसरा, वो जो परिणाम उत्पन्न होता है
वो कर्म के सद्भाव-अभाव के संबंध से
होता है इसलिए ये जो परिणाम हैं नौ,

00:04:08.260 --> 00:04:21.823
उनको परमात्मा ने कर्मकृत फरमाया है;
कर्म की अपेक्षा से उत्पन्न हुआ है,
इसलिए कर्मकृत कहा है।

00:04:21.847 --> 00:04:39.885
तो परिणाम में आत्मबुद्धि हो गई है,
परिणाम जीव नहीं होने पर भी, वो जीव है,
ऐसा भ्रम, भ्रांति - मिथ्यात्व हो गया है।

00:04:39.909 --> 00:04:53.761
आखिर में वो ऐसा भी तर्क करता है
कि व्यवहारनय से तो जीव है ना,
निश्चयनय (से) न हो तो न हो।

00:04:53.785 --> 00:05:08.016
ऐसे व्यवहारनय का पक्ष और लक्ष करके भी,
उसमें जीव की भ्रांति कर लेता है।

00:05:08.040 --> 00:05:15.725
एक माईल्ल धवल है,
उसका नयचक्र नाम का शास्त्र है।

00:05:15.749 --> 00:05:26.921
उसमें आचार्य भगवान फरमाते हैं
कि जीव ऐसा बोलते हैं, कहते हैं

00:05:26.945 --> 00:05:40.185
कि 'जो देह है, शरीर है, वो जीव है-
(ऐसा) मैं व्यवहारनय से कहता हूँ,
मैं कहाँ निश्चयनय से कहता हूँ?’;

00:05:40.209 --> 00:05:47.583
मगर वो देह को
निश्चय से जीव ही मान लेता है!

00:05:47.607 --> 00:05:59.076
ऐसे जो नवतत्त्व का भेद
- परिणाम है, व्यवहारनय का विषय है,
उसमें जीव का लक्षण नहीं है।

00:05:59.100 --> 00:06:06.063
जीव का लक्षण तो <b>निष्क्रिय:
शुद्धपारिणामिक: </b>(गाथा ३२०, समयसार,
तात्पर्यवृति टीका, जयसेनाचार्य पृष्ठ ५८२)

00:06:06.087 --> 00:06:18.881
वो उसका लक्षण है।
त्रिकाल शाश्वत, वो पारिणामिकभाव
से तन्मय है आत्मा, अनादि-अनंत।

00:06:18.905 --> 00:06:29.752
वो जो नवतत्त्व परिणाम है,
वो चार भाव स्वरूप है
तो किसी परिणाम में तो उदयभाव तन्मय है,

00:06:29.776 --> 00:06:39.565
किसी परिणाम में उपशमभाव तन्मय है,
किसी परिणाम में क्षयोपशमभाव तन्मय है,
किसी परिणाम में क्षायिकभाव तन्मय है।

00:06:39.589 --> 00:06:53.903
मगर उसमें, जीव का जो लक्षण शाश्वत
पारिणामिकभाव, उसका लक्षण नहीं है।
इसलिए वो जीव नहीं है, एक बात।

00:06:53.927 --> 00:07:05.588
दूसरी बात समयसार,
नियमसार में फरमाया

00:07:05.612 --> 00:07:19.565
(कि) ये जो सात-तत्वों का समूह है
अथवा नौ-पदार्थ, वो सब परद्रव्य है,
स्वद्रव्य नहीं है।

00:07:19.589 --> 00:07:29.501
जैसे परद्रव्य में मेरे अनंत गुण नहीं हैं,
मेरे जो अनंत गुण इधर (अंदर) हैं,
वो किसी परद्रव्य में मेरे अनंत गुण नहीं हैं।

00:07:29.525 --> 00:07:39.299
ऐसे परिणाम जो हैं, कोई भी
परिणाम ले लो, बंध और मोक्ष
दो प्रकार हैं। संक्षिप्त में, (short) में,

00:07:39.323 --> 00:07:48.988
बंध में पुण्य-पाप-आस्रव समाहित हो जाता
है (और) मोक्ष में संवर-निर्जरा समाहित
हो जाता है, शुद्धता की अपेक्षा (से)।

00:07:49.012 --> 00:07:56.774
ये बंध परिणाम,
भाव-बंध या भाव-मोक्ष है, वह परद्रव्य है।

00:07:56.798 --> 00:08:06.979
जैसे परिणाम के लक्ष से वीतरागता नहीं
होती है, ऐसे परद्रव्य के लक्ष से भी
वीतरागदशा प्रगट नहीं होती है।

00:08:07.003 --> 00:08:15.650
तो मेरा जो जीव-तत्त्व है,
आत्म-तत्त्व है, उसमें अनंत गुण हैं
मगर मोक्ष की पर्याय में अनंत गुण नहीं हैं;

00:08:15.674 --> 00:08:23.010
इसलिए वो परभाव है और परद्रव्य है,
इसलिए हेय है।

00:08:23.034 --> 00:08:33.356
हेय का अर्थ,
उसमें जीव-तत्त्व की भ्रांति छोड़ दे,
जीव नहीं है वो।

00:08:33.380 --> 00:08:42.570
तूने उसको जीव मान रखा है।
जैसे देह में जीव नहीं है,
वैसे परिणाम में भी जीव नहीं है।

00:08:42.594 --> 00:08:45.752
जीव उसमें आता ही नहीं है।

00:08:45.776 --> 00:08:57.336
जीव अपना मूल-स्वभाव छोड़कर
कोई अनित्य परिणाम में जाता नहीं है
और परिणाम द्रव्य में आता नहीं है।

00:08:57.360 --> 00:09:01.765
परिणाम, परिणाम में रहता है
और द्रव्य, द्रव्य में रहता है;

00:09:01.789 --> 00:09:14.739
ऐसे नय-विभाग की युक्ति से
विधि-निषेध करे जब आत्मा,
तब शुद्धात्मा का अनुभव होता है।

00:09:14.763 --> 00:09:20.036
तो इधर नवतत्त्व की बात
आ गई यहाँ तक, कि

00:09:20.060 --> 00:09:29.956
<b>जिनके लक्षण जीव, अजीव, पुण्य,
पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध और
मोक्ष है- उनमें</b>, ये नव में। आहाहा!

00:09:29.980 --> 00:09:40.543
नव के मध्य में, परिणाम के मध्य में
भगवान आत्मा विराजमान है।

00:09:40.567 --> 00:09:54.908
जैसे सोना है सोना, gold,
उसकी नव अवस्थायें होती हैं समझो,
तो इन अवस्थाओं में सोना नहीं है।

00:09:54.932 --> 00:10:05.174
अवस्था, सोना नहीं है।
वो अवस्था है एक समय की,
वो अवस्था तो नाशवान है, पलटती है।

00:10:05.198 --> 00:10:09.512
तो सोनी का लक्ष,
जवेरी का लक्ष, सोने (के) ऊपर है।

00:10:09.536 --> 00:10:14.428
और जो ग्राहक आता है,
उसका लक्ष ઘાટ (आकृति), अवस्था ऊपर है;

00:10:14.452 --> 00:10:22.001
तो कोई अवस्था ठीक लगती है और
कोई अवस्था अठीक लगती है, तो
विषम-भाव, राग-द्वेष उत्पन्न हो जाता है।

00:10:22.025 --> 00:10:29.007
सोना तो सदृश्य है,
वो सदृश्य पर लक्ष होने से
राग-द्वेष नहीं होता है।

00:10:29.031 --> 00:10:33.345
ऐसे भगवान आत्मा जीव-तत्त्व सामान्य है।

00:10:33.369 --> 00:10:39.985
वो तो प्रत्येक अवस्था होने पर भी
अपने सामान्य स्वभाव में आत्मा रहता है;

00:10:40.009 --> 00:10:48.198
विशेष में कभी आता ही नहीं है
क्योंकि विशेष (तो) परद्रव्य है।

00:10:48.222 --> 00:10:52.852
परद्रव्य का कारण (क्या)?
जैसे परद्रव्य के लक्ष से राग होता है,

00:10:52.876 --> 00:11:00.972
ऐसे परिणाम के लक्ष से
रागी प्राणी को राग होता है,
इसलिए उसको परद्रव्य कहा।

00:11:00.996 --> 00:11:13.074
जीव का (जो) परिणाम है वो 'जीव है’
ऐसा व्यवहारनय का कथन शास्त्र
में बहुत आता है, कथन तो आता है।

00:11:13.098 --> 00:11:23.403
उसके लिए टोडरमल साहब ने जो
कुन्दकुन्द भगवान की ११वीं गाथा है, उसका
ही खुलासा टोडरमल साहब ने किया है

00:11:23.427 --> 00:11:35.749
कि <b>निश्चयनय से जो निरूपण किया
हो उसे तो सत्यार्थ मानकर उसका
श्रद्धान अंगीकार करना</b>

00:11:35.773 --> 00:11:45.309
<b>और व्यवहारनय से जो निरूपण किया
हो उसे असत्यार्थ मानकर उसका श्रद्धान
छोड़ना</b> (मोक्षमार्ग प्रकाशक पृष्ठ २५०)।

00:11:45.333 --> 00:11:57.456
परिणाम छोड़ने की बात नहीं है।
परिणाम छोड़ने का कार्य आत्मा नहीं करता है।

00:11:57.480 --> 00:12:04.109
जो उत्पन्न करे सो छोड़े।
वो ग्रहण भी नहीं करता है
और त्याग भी नहीं करता।

00:12:04.133 --> 00:12:14.189
उत्पाद-व्यय तो स्वयं अपने-आप,
अपने स्वसमय में, भगवान आत्मा की
अपेक्षा बिना उत्पाद-व्यय हो जाता है।

00:12:14.213 --> 00:12:19.203
उत्पाद-व्यय (की)
पर्याय द्रव्य को छूती नहीं है।

00:12:19.227 --> 00:12:26.043
प्रमाण के पक्ष में आने के बाद शुद्धनय
से जो आत्मा निकाले, तो अनुभव होता है।

00:12:26.067 --> 00:12:34.136
प्रमाण में अटकता है, यानि प्रमाणज्ञान का
जो विषय (है), <b>गुणपर्ययवत् द्रव्यं</b>
(तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय ५, सूत्र ३८)

00:12:34.160 --> 00:12:38.420
<b>उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्त्तं सत् </b>
(तत्त्वार्थसूत्र अध्याय ५, सूत्र ३०),
(वो) पदार्थ का स्वरूप है।

00:12:38.444 --> 00:12:43.100
केवल पदार्थ में अटकने से
प्रयोजन की सिद्धि नहीं होती है।

00:12:43.124 --> 00:12:47.643
केवल मौसंबी प्राप्त करने से
प्रयोजन की सिद्धि नहीं होती है।

00:12:47.667 --> 00:12:53.612
मौसंबी लाकर उसमें (से) रस खींचना
चाहिए और छिलका फेंक देना चाहिए।

00:12:53.636 --> 00:13:03.034
ऐसे नवतत्त्व जो हैं,
वो परस्वभाव हैं, परद्रव्य हैं,
इसलिए हेय हैं।

00:13:03.058 --> 00:13:08.016
यह ममत्वभाव छूटता नहीं था,
ममत्व छूटता नहीं था -

00:13:08.040 --> 00:13:15.514
'परिणाम तो आत्मा का है ना,
मेरा ही है ना, मेरे में होता है ना',
अनेक प्रकार का,

00:13:15.538 --> 00:13:24.154
पर्यायद्रष्टिवाला अनेक प्रकार का
तर्क-कुतर्क करके पर्यायदृष्टि छोड़ता
नहीं है, पर्याय में आत्मबुद्धि रखता है।

00:13:24.178 --> 00:13:30.314
'क्या परिणाम के बिना आत्मा होता है?
तो-तो सांख्यमत हो जायेगा,
तो स्वच्छंद हो जायेगा',

00:13:30.338 --> 00:13:39.043
ऐसे-ऐसे-ऐसे व्यवहार का
पक्ष कर लेता है, व्यवहार का पक्ष!

00:13:39.067 --> 00:13:47.892
व्यवहार के पक्षवाला
निश्चयनय का निषेध करता है,
तो ही व्यवहार का पक्ष आता है।

00:13:47.916 --> 00:13:59.829
व्यवहार का पक्ष श्रद्धा का दोष है,
व्यवहार चारित्र का दोष है,
गुण तो है ही नहीं! आहाहा!

00:13:59.853 --> 00:14:09.385
<b>उनमें </b>यानि कि
नौ प्रकार के परिणाम के जो भेद है,
<b>उनमें एकत्व</b>,

00:14:09.409 --> 00:14:14.972
वो नवपना (नौ-पना) था ना,
उसमें से एकपना निकालना चाहिए।

00:14:14.996 --> 00:14:21.038
<b>सर्व अवस्थाने विषे, न्यारो सदा जणाय; </b>
(आत्मसिद्धि गाथा ५४)

00:14:21.062 --> 00:14:31.638
<b>सर्व अवस्था</b> (में)
अनादि-अनंत अवस्था ले लेना। किसी
अवस्था को छोड़ना नहीं; छोड़ सकते ही नहीं।

00:14:31.662 --> 00:14:39.736
मगर <b>सर्व अवस्थाने विषे न्यारो</b>,
बस यहाँ जरा रुक जाना।

00:14:39.760 --> 00:14:48.932
यहाँ एक सेकंड के लिए रुक जाना।
<b>सर्व अवस्थाने विषे न्यारो</b>,

00:14:48.956 --> 00:14:55.900
यानि सर्व अवस्था से जुदा,
न्यारा यानि जुदा, बस यहाँ अटक जाना।

00:14:55.924 --> 00:15:02.852
जुदा ही है,
नवतत्त्व से आत्मा भिन्न ही है।

00:15:02.876 --> 00:15:15.323
अरे! नवतत्त्व से आत्मा अत्यंत भिन्न है,
ऐसा परम आगम का परम अमृतमय वचन है।

00:15:15.347 --> 00:15:29.940
'सर्वथा कहने से, अनेकांत का घात हो
जायेगा'। कि नहीं, सम्यक् अनेकांत
का ज्ञान प्रगट हो जायेगा। आहाहा!

00:15:29.964 --> 00:15:37.643
नवतत्त्व से आत्मा अनादि-अनंत भिन्न है,
परिणाम मात्र से आत्मा अनादि-अनंत भिन्न है।

00:15:37.667 --> 00:15:41.700
उस भिन्न का ध्यान-भान उसने नहीं किया।

00:15:41.724 --> 00:15:49.767
व्यवहारनय संयोग का ज्ञान कराता है
और निश्चयनय स्वभाव का भान कराता है।

00:15:49.791 --> 00:15:58.105
<b>उनमें एकत्व </b>ये नव हैं ना,
नव-भेद, उसमें <b>एकत्वविभक्त</b>
(समयसार गाथा ५), वहाँ से शुरू हुई है।

00:15:58.129 --> 00:16:07.034
<b>एकत्वविभक्त,</b>
एकत्व का अर्थ क्या है कि
अनंत गुण से एकत्व आत्मा है, एकपना है

00:16:07.058 --> 00:16:14.069
और विभक्त यानि प्रमत्त-अप्रमत्त
आदि दशाओं से जुदा है।

00:16:14.093 --> 00:16:19.843
जुदा करना नहीं है; जुदा है,
ऐसा भान नया होता है।

00:16:19.867 --> 00:16:26.847
अभिन्न है, ऐसा अज्ञान छूट जाता है
और भिन्न से भान हो जाता है।

00:16:26.871 --> 00:16:37.114
<b>उनमें एकत्व प्रगट करनेवाले</b>।
व्यवहारनय से नौ परिणाम दिखते हैं

00:16:37.138 --> 00:16:46.892
मगर उनमें <b>सर्व अवस्थाने विषे न्यारो</b>,
न्यारो यानि जुदा, ये दृष्टि का विषय आ गया।

00:16:46.916 --> 00:16:58.798
न्यारा, बस! <b>सदा जणाय</b>
(जानने में आता है)।
किसको जानने में आता है सदा? सबको।

00:16:58.822 --> 00:17:07.105
स्वीकार नहीं करता है
मगर उसको भगवान आत्मा,
<b>अनुभूतिस्वरूप भगवान आत्मा आबाल-गोपाल</b>

00:17:07.129 --> 00:17:15.252
सबको सदाकाल अपने ज्ञान में,
<b>अनुभव में</b> आता है,
प्रतिभासित होता है (समयसार गाथा १७-१८)।

00:17:15.276 --> 00:17:18.349
उस प्रतिभास को उपयोगात्मक नहीं करता है।

00:17:18.373 --> 00:17:28.576
जो प्रतिभास को उपयोगात्मक करे,
तो-तो सम्यग्दर्शन साक्षात् हो जावे।

00:17:28.600 --> 00:17:33.327
इस ज्ञान की पर्याय में
स्वपरप्रकाशक की ज्ञप्ति है।

00:17:33.351 --> 00:17:42.598
निगोद में भी है, एक इन्द्रिय, दो इन्द्रिय,
तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय, पाँच इन्द्रिय, संज्ञी,
असंज्ञी, (सबको) स्व-पर का प्रतिभास होता है।

00:17:42.622 --> 00:17:56.158
इतनी स्वच्छता तो जीव मात्र में रह गई है।
भले अज्ञानी मिथ्यादृष्टि हो तो भी
इतनी स्वच्छता रह गई है।

00:17:56.182 --> 00:18:03.785
शुद्धता नहीं स्वच्छता,
कि उसमें स्व-पर का प्रतिभास होता है।

00:18:03.809 --> 00:18:10.487
ये पंचास्तिकाय शास्त्र (गाथा १२१) में है,
कुन्दकुन्द भगवान के शास्त्र में।

00:18:10.511 --> 00:18:17.078
स्व-पर का जो प्रतिभास न हो,
तो बन्ध-मोक्ष की सिद्धि ही नहीं होती है।

00:18:17.102 --> 00:18:25.425
स्व-पर का प्रतिभास न हो,
तो किसी को मिथ्यात्व नहीं होवे
और किसी को सम्यग्दर्शन भी न हो।

00:18:25.449 --> 00:18:36.105
स्व-पर का प्रतिभास होने पर भी, सभी
जीवों (को) जब पर का प्रतिभास है (उस
समय) उसको उपयोगात्मक कर लेते हैं।

00:18:36.129 --> 00:18:41.563
यानि राग का प्रतिभास भी है और
ज्ञायक का प्रतिभास भी (है), एक साथ,

00:18:41.587 --> 00:18:48.176
एक समय में, युगपद् प्रतिभास,
एक में दो का प्रतिभास होता है।

00:18:48.200 --> 00:18:55.736
मगर राग का,
देह का प्रतिभास ज्ञान में देखकर, आहाहा!

00:18:55.760 --> 00:19:03.572
मैं रागी हूँ और मैं देह हूँ,
मैं मनुष्य हूँ, मैं नारकी हूँ,
मैं स्त्री, मैं पुरूष, आहाहा!

00:19:03.596 --> 00:19:14.745
ऐसे पर के प्रतिभास को
उपयोगात्मक करता है, तो विशेष ज्ञेयाकार
ज्ञान का आविर्भाव - अज्ञान हो जाता है।

00:19:14.769 --> 00:19:28.194
वो ही समय ज्ञायक का प्रतिभास तो था,
मगर मैं ज्ञायक हूँ
वो समय-समय पर भूल जाता है।

00:19:28.218 --> 00:19:32.838
वो अपना ज्ञायक का प्रतिभास तो होता ही है

00:19:32.862 --> 00:19:42.932
और पर का प्रतिभास होने पर भी
जो लक्ष छोड़ देवे, पर का लक्ष छोड़ देवे

00:19:42.956 --> 00:19:50.607
यानि बिम्ब का लक्ष छोड़े
और प्रतिबिम्ब का भी लक्ष छोड़ देवे,
क्या कहा?

00:19:50.631 --> 00:20:01.247
ज्ञान की पर्याय में परपदार्थ का
प्रतिबिम्ब होता है, झलकता है,
ज्ञान की पर्याय में परपदार्थ झलकता है

00:20:01.271 --> 00:20:14.776
तो 'परपदार्थ मैं हूँ’ ऐसा लक्ष कर लेता है
अथवा अंदर में देखे, तो जो
परपदार्थ का लक्ष आया, प्रतिभास हुआ,

00:20:14.800 --> 00:20:21.003
बिम्ब और प्रतिबिम्ब,
उस ज्ञान की पर्याय में
प्रतिबिम्ब हुआ

00:20:21.027 --> 00:20:28.069
तो ज्ञेयाकार ज्ञान में आत्मबुद्धि करता है
तो ज्ञेय में आत्मबुद्धि कहा जाता है।

00:20:28.093 --> 00:20:35.172
करता तो है (वो) पर्यायद्रष्टि,
पर्याय में आत्मबुद्धि करता है
मगर जो पर्याय में आत्मबुद्धि करता है,

00:20:35.196 --> 00:20:41.878
(तो) उस पर्याय का जो निमित्त है
उसमें भी आत्मबुद्धि स्वयं आ जाती है।

00:20:41.902 --> 00:20:50.225
अभी ऐसा स्वपरप्रकाशक का प्रतिभास
होने पर भी, कोई जीव, किसी समय (पर),

00:20:50.249 --> 00:21:01.523
अपनी योग्यता और आत्मज्ञानी गुरु के
संग से... गुरु फरमाते हैं कि तेरे ज्ञान
में भगवान आत्मा जानने में आ रहा है।

00:21:01.547 --> 00:21:10.496
कि साहब! कब?
अनुभव, सम्यग्दर्शन होने के बाद?
कि नहीं! अभी, तीनों काल। आहाहा!

00:21:10.520 --> 00:21:18.154
विश्वास कर, विश्वास कर।
ज्ञानी के वचन ऊपर
प्रथम विश्वास कर ले

00:21:18.178 --> 00:21:23.598
कि <b>जाननहार जानने में आता है,</b>
मुझे <b>वास्तव में पर जानने में नहीं
आता</b> (सिद्धांतों की सरवाणी, बोल १)।

00:21:23.622 --> 00:21:28.989
उसमें सम्यक्एकांत हो जायेगा।
आहाहा! अनुभव हो जायेगा।

00:21:29.013 --> 00:21:40.687
निश्चयाभासपना नहीं आयेगा,
सांख्यमत नहीं होगा (बल्कि)
तू सच्चा जैन बन जायेगा। आहाहा!

00:21:40.711 --> 00:21:53.807
तो जब ये कहें कि तेरे ज्ञान में,
वर्तमान वर्तते ज्ञान में आत्मा जानने में आता है
(तो) स्वीकार कर ले, विश्वास कर ले और प्रयोग कर।

00:21:53.831 --> 00:21:59.194
जो प्रतिभास हो रहा है,
उसको उपयोगात्मक कर ले।

00:21:59.218 --> 00:22:06.247
ज़्यादा से ज़्यादा छह महीने
Practise (अभ्यास) कर तो अनुभव हो जायेगा।

00:22:06.271 --> 00:22:11.372
तो जो पर के प्रतिभास को उपयोगात्मक
करता है, तो मिथ्यादृष्टि हो जाता है।

00:22:11.396 --> 00:22:19.532
जो देहादि, रागादि जानने में ही नहीं आवें
तो मिथ्यादर्शन की सिद्धि,
संसार की सिद्धि नहीं होती है।

00:22:19.556 --> 00:22:28.340
जानने में तो आता है मगर जाननेवाला
जानने में आता है, वो भूल जाता है। आहाहा!

00:22:28.364 --> 00:22:31.536
<b>જાણવાના લોભમાં સઘળોય આ સંસાર છે </b>
(जानने के लोभ में पूरा ये संसार है;
भेदज्ञान भजनावली आध्यात्मिक भक्ति ४५)।

00:22:31.560 --> 00:22:36.589
मुझे ये जानने में आता है,
ये जानने में आता है, ये जानने में आता है,
ये जानने में आता है। आहाहा!

00:22:36.613 --> 00:22:47.500
ये जानने में आता है, पर जानने में आता है,
राग जानने में आता है; ऐसे-ऐसे करके वो लक्ष
पर ऊपर रखता है, मिथ्यादृष्टि हो जाता है।

00:22:47.524 --> 00:22:59.780
अभी मिथ्यात्व के समय भी,
सम्यग्दर्शन होने का कारण तो मौजूद है।

00:22:59.804 --> 00:23:06.847
क्या कारण? कि उसकी ज्ञान की पर्याय
में ज्ञायक का प्रतिभास निरंतर होता है।

00:23:06.871 --> 00:23:17.158
ऐसा विश्वास करके ज्ञान की पर्याय
में जो पर जानने में आता है
ऐसे व्यवहार का निषेध करके,

00:23:17.182 --> 00:23:23.709
राग जानने में नहीं आता है,
देह जानने में नहीं आता है (बल्कि)
मेरा ज्ञान जानने में आता है,

00:23:23.733 --> 00:23:38.176
अरे! ज्ञायक जानने में आता है -
ऐसे अंतर्मुख करके विचार करके थोड़ी
जो स्थिरता आ जावे तो अनुभव हो जावे।

00:23:38.200 --> 00:23:48.829
रात्रि (में) पुत्र ने पिता को कहा
कि पिताजी ये मकान सारा दिन
में तो दिखने में आता है

00:23:48.853 --> 00:23:54.794
मगर रात में अँधेरा हो गया, अँधेरा,
तो मकान कोई दिखने में आता नहीं।

00:23:54.818 --> 00:24:05.540
(पिता:) अच्छा!
(पू. लालचंदभाई:) सबेरा हुआ। सबेरा होने के
बाद पुत्र ने कहा कि पिताजी ये मकान दिखता है।

00:24:05.564 --> 00:24:08.487
(पिता:) तेरे को रात्रि को नहीं दिखता था?
पुत्र:) कि नहीं दिखता था।

00:24:08.511 --> 00:24:11.620
(पिता:) अभी दिखता है?
(पुत्र:) कि हाँ! दिखता है।

00:24:11.644 --> 00:24:16.794
(पिता:) अच्छा! मकान दिखता है
कि कुछ और दिखता है?

00:24:16.818 --> 00:24:22.567
(पुत्र:) मकान ही दिखता है और कुछ क्या?
(उसका) तो प्रश्न ही नहीं है।
और (कुछ का) तो प्रश्न ही नहीं है।

00:24:22.591 --> 00:24:25.749
(पू. लालचंदभाई:) इतनी ज्ञान-शक्ति
अज्ञानी की बिड़ाई गयी है

00:24:25.773 --> 00:24:30.820
कि सम्यक् प्रकार से विचार
करने की शक्ति भी 'बिड़ाई गई है'
को क्या कहें (हिन्दी में)?

00:24:30.844 --> 00:24:39.616
'बिड़ाई गई', 'बिड़ाई गई'। आहाहा!
कुंठित हो गई, विचार करने की शक्ति।

00:24:39.640 --> 00:24:48.572
सुबह (पिता ने) कहा कि बेटा रात्रि में
मकान नहीं दिखता (था), अभी मकान
दिखता है कि और कुछ दिखता है?

00:24:48.596 --> 00:24:55.198
(पुत्र:) आप फरमाओ क्या है?
(पिता:) कि प्रकाश नहीं दिखता है?
(पुत्र:) हाँ! प्रकाश तो है पिताजी।

00:24:55.222 --> 00:24:58.532
(पिता:) रात्रि को प्रकाश था?
(पुत्र:) कि रात्रि को नहीं था।

00:24:58.556 --> 00:25:01.763
(पिता:) अभी तो प्रकाश दिखता है?
(पुत्र:) कि हाँ! प्रकाश तो दिखता है।

00:25:01.787 --> 00:25:09.096
(पिता:) अच्छा! तो प्रकाश दिखता है,
तो प्रकाश कहाँ से आता है?

00:25:09.120 --> 00:25:13.963
(पू. लालचंदभाई:) तो चारों दिशाओं में
वो (पुत्र) मुख फेरता है।
तो पूर्व-दिशा में से (प्रकाश आता था)।

00:25:13.987 --> 00:25:20.149
(पुत्र:) आहाहा!
(पिता:) अभी प्रकाश दिखता है
कि (कोई) और चीज दिखती है?

00:25:20.173 --> 00:25:24.314
(पुत्र:) कि प्रकाश गौण हो गया,
सूर्य दिखता है।

00:25:24.338 --> 00:25:30.052
(पू. लालचंदभाई:) यानि
पर्याय का लक्ष छूट गया।

00:25:30.076 --> 00:25:40.247
पर्याय के माध्यम से आगे बढ़ा
मगर जब सूर्य पर लक्ष जाता है,
तब पर्याय का लक्ष छूट जाता है।

00:25:40.271 --> 00:25:52.367
ऐसे परपदार्थ - रागादि, देहादि का प्रतिभास
तो होता है, बिम्ब और प्रतिबिम्ब,
ऐसा संबंध तो है ज्ञेय-ज्ञायक का।

00:25:52.391 --> 00:25:59.932
तो जो बिम्ब दिखता है तो अज्ञान,
प्रतिबिम्ब दिखता है तो भी अज्ञान

00:25:59.956 --> 00:26:06.585
और ज्ञान की पर्याय में अकेला ज्ञान
की पर्याय का भेद दिखे तो भी अज्ञान।

00:26:06.609 --> 00:26:18.536
ज्ञान की पर्याय में ज्ञायक दिखता है,
जब ज्ञायक को देखता है, तब परिणाम का भेद
अभेद हो जाता है (और) अनुभूति हो जाती है।

00:26:18.560 --> 00:26:23.540
परिणाम भिन्न होने पर भी कथंचित्
अनुभव के काल में अभिन्न होता है।

00:26:23.564 --> 00:26:32.780
इसलिए रहित का श्रद्धान और सहित का ज्ञान
एक समय में हो जाता है तो समयसार,
प्रवचनसार सब उसमें आ जाते हैं।

00:26:32.804 --> 00:26:36.487
ध्येय पूर्वक ज्ञेय होता है।

00:26:36.511 --> 00:26:43.976
ध्येय तो अभेद सामान्य अनंत
गुणात्मक पदार्थ है - <b>गुणसमुदायो
द्रव्यं </b>(पञ्चाध्यायी पूर्वार्द्ध गाथा ७३)

00:26:44.000 --> 00:26:54.732
और जब ध्येय का ध्यान आता है तब
अभेद होता है; परिणाम से कथंचित्
अभेद, सर्वथा अभेद नहीं। आहाहा!

00:26:54.756 --> 00:27:04.180
दृष्टि कथंचित् को नहीं स्वीकारती है
और ज्ञान कथंचित् को छोड़ता नहीं है।

00:27:04.204 --> 00:27:13.909
<b> आत्मा में स्याद्वाद का अभाव है</b>
मगर आत्मज्ञान <b>में स्याद्वाद का सद्भाव है</b>
(सिद्धांतों की सरवाणी, बोल ५)। आहाहा!

00:27:13.933 --> 00:27:18.029
ऐसा एक देवसेनाचार्य का नयचक्र है।

00:27:18.053 --> 00:27:27.518
गुरुदेव की उपस्थिति में ही
बहुत बार पढ़ा मैंने, मगर उसका
अनुवाद हमको बराबर- सही नहीं लगा।

00:27:27.542 --> 00:27:32.758
इसके लिए पंडितजी (डॉक्टर
हुकुमचंदजी भारिल्ल) को कहा कि
पंडितजी इतना मेरा काम कर दो।

00:27:32.782 --> 00:27:39.447
पूरी पुस्तक का अनुवाद करो
तो-तो बहुत अच्छी बात है,
मगर इतने अंश का,

00:27:39.471 --> 00:27:45.163
(३१-३२) पन्ने, दो पन्ने के
अनुवाद की मेरे को बहुत ज़रूरत है।

00:27:45.187 --> 00:27:51.465
पंडितजी ने कहा कि भाई साहब!
वो मेरे ऊपर छोड़ो,

00:27:51.489 --> 00:28:00.878
जब मैं बिल्कुल मानसिक (रूप से) free
(मुक्त) हो जाता हूँ, तब उसका
अनुवाद करके आपको मैं दूँगा।

00:28:00.902 --> 00:28:09.172
गुरुदेव की उपस्थिति की बात है,
पंद्रह साल पहले की बात है;
तो उन्होंने अनुवाद करके दिया।

00:28:09.196 --> 00:28:19.434
मैंने कहा धन्यवाद आपको।
(मैंने) पढ़ा और कई विद्वानों
को भी उसकी Copy (नकल) मैंने दी थी।

00:28:19.458 --> 00:28:28.758
उसमें ऐसा लिखा है कि भगवान आत्मा में भी
<b>स्याद्वाद का अभाव होने पर भी निश्चयाभासपना
आता नहीं है</b> (नयचक्र तत्त्वचर्चा, पृष्ठ २)।

00:28:28.782 --> 00:28:36.314
निश्चयाभासपना आता नहीं है,
वो संतो की वाणी है,
मेरी बात कुछ नहीं है।

00:28:36.338 --> 00:28:43.176
अभी तो ये पुस्तक भी
निकल चुकी है नागपुर से।
वो जो पंडितजी के शिष्य, आहाहा!

00:28:43.200 --> 00:28:50.269
जयपुर के, राकेश हैं ना?
राकेश भैया ने अनुवाद करके निकाला है।

00:28:50.293 --> 00:29:01.500
इधर स्टॉल में (अगर) मिलता होगा तो ले लेना,
नयचक्र है, 'श्रुत-भवन-दीपिका नयचक्र’
- देवसेनाचार्य का है।

00:29:01.524 --> 00:29:04.714
जिसने, देवसेनाचार्य ने
(दर्शनसार में) लिखा कि

00:29:04.738 --> 00:29:19.025
'हे कुन्दकुन्द आचार्य भगवान! आप महा
विदेहक्षेत्र जाकर, ये जो बात आप न लाये
होते तो हमारे जैसे मुनियों का क्या होता!’

00:29:19.049 --> 00:29:28.229
भावलिंगी संत फरमाते हैं।
समयसार, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय,
अष्टपाहुड़ (शास्त्र है)। आहाहा!

00:29:28.253 --> 00:29:35.612
ऐसे देवसेन आचार्य भगवान ने ये लिखा है
कि <b>स्याद्वाद का अभाव होने पर भी</b>

00:29:35.636 --> 00:29:43.958
.... दृष्टि के विषय में स्याद्वाद कहाँ है?
कथंचित् नहीं, वो तो सर्वथा है। आहाहा!

00:29:43.982 --> 00:29:48.887
मगर जहाँ सर्वथा आया
वहाँ भड़क जाता है जीव।

00:29:48.911 --> 00:29:57.309
किसी अपेक्षा से अपने
साध्य की सिद्धि करने के लिए
वस्तु की स्थिति ऐसी है, वस्तु ऐसी है।

00:29:57.333 --> 00:30:03.727
- स्याद्वाद, भगवान त्रिकाल
- दृष्टि के विषय में स्याद्वाद नहीं है।

00:30:03.751 --> 00:30:10.003
मगर जिसको दृष्टि का विषय दृष्टि
में आता है और ज्ञान प्रगट होता है,

00:30:10.027 --> 00:30:22.158
उसको साथ-साथ में सम्यग्ज्ञान प्रगट हुआ,
उस आत्मज्ञान में स्याद्वाद का जन्म होता है
और स्याद्वाद का जन्म अनुभव में ही होता है।

00:30:22.182 --> 00:30:30.940
शास्त्र से स्याद्वाद का
यथार्थ ज्ञान होता नहीं है।
ये (तो) अनुभव की चीज है। आहाहा!

00:30:30.964 --> 00:30:38.056
तो शांति से सुनना चाहिए।
अपनी कोई बात अंदर में,
दिमाग (में) रखी हो

00:30:38.080 --> 00:30:45.616
और नई बात कोई आचार्य भगवान की
मिले तो उसमें अपने (को) गहराई
से विचार करके बैठाना चाहिए।

00:30:45.640 --> 00:30:50.483
अपने हित के लिए वो लिख गए हैं,
अपने लिए लिख गए हैं।

00:30:50.507 --> 00:30:58.318
वो तो अपना काम करके चले गए
और ज्ञानी कहते जाते हैं और चले जाते हैं।

00:30:58.342 --> 00:31:07.576
ज्ञानी कहते जाते हैं और चले जाते हैं,
रुकते नहीं। ज्ञानी हमारे लिए रुकते नहीं।

00:31:07.600 --> 00:31:15.065
अपना काम कर लेते हैं।
कहते जाते हैं सत्य;
जो अपने आत्मा का अनुभव हुआ,

00:31:15.089 --> 00:31:20.825
तो वो अनुभव से कलम चलाकर
ताड़पत्र पर लिखकर चले जाते हैं। आहाहा!

00:31:20.849 --> 00:31:23.363
कहते जाते हैं और चले जाते हैं।

00:31:23.387 --> 00:31:31.225
कहते जाते हैं और कोई सुनता है और
कोई सुनता (नहीं है) और कोई सुनता है,
उसमें कोई अनुभव भी कर लेता है।

00:31:31.249 --> 00:31:35.638
ऐसी परंपरा भारत में चालू है।

00:31:35.662 --> 00:31:42.420
यहाँ कहते हैं कि नवतत्त्व में एक
शुद्धात्मा, <b>एकत्व प्रगट करनेवाले</b>।

00:31:42.444 --> 00:31:49.780
उस नयचक्र के अंदर वो अंश होगा।
लिया हें ने? ... उसमें डाला है?
अंदर पूरा? अच्छा!

00:31:49.804 --> 00:31:54.896
देवसेनाचार्य की अभी जो बात की ना,
यह quotation (संदर्भ) उसमें आया (है)।

00:31:54.920 --> 00:32:09.403
नयचक्र ले लेना, इधर स्टॉल में मिलता होगा,
बिक्री में। मिलता है ना? मिलता है।
आहाहा! बिक्री में है। बोलो! आहाहा!

00:32:09.427 --> 00:32:15.287
अरे! जो आत्मा के पीछे पड़ता है,
उसको आत्मा की प्राप्ति अवश्य होती है

00:32:15.311 --> 00:32:19.927
और परपदार्थ के पीछे पड़ता है,
तो परपदार्थ मिलता ही नहीं है।

00:32:19.951 --> 00:32:25.256
कथंचित् मिले और कथंचित् नहीं मिले,
ऐसा उसमें स्याद्वाद है नहीं।

00:32:25.280 --> 00:32:33.020
आत्मा मिलता है और परपदार्थ किसी
को आज तक मिला नहीं है। आहाहा!

00:32:33.044 --> 00:32:38.803
परपदार्थ मिले आत्मा को?
कि आत्मा का ज्ञान मिले आत्मा को?

00:32:38.827 --> 00:32:55.003
जो आत्मा में हो तो मिलता है
मगर आत्मा में जो नहीं है,
(वो) नहीं मिलता है। पंकज? अच्छा!

00:32:55.027 --> 00:33:07.176
ये सर्वार्थसिद्धि के देव का नाम क्या?
सौधर्म इंद्र का पाठ। अच्छा!

00:33:07.200 --> 00:33:15.989
एक, <b>उनमें एकत्व प्रगट करनेवाले, </b>
एक, एक, एकोऽहम्, एकोऽहम्,
एकोऽहम्, एक शुद्धात्मा है।

00:33:16.013 --> 00:33:22.443
एक में अनेक की नास्ति है,
शुद्ध में अशुद्धता की नास्ति है,
ऐसी अस्ति एक की है।

00:33:22.467 --> 00:33:24.696
एक में अनेक की नास्ति है।

00:33:24.720 --> 00:33:32.158
अनेक, अनेकपने भले हो, अनेक,
अनंत पर्याय भले हों,
अनंत द्रव्य भी भले हों, हों तो हों।

00:33:32.182 --> 00:33:39.496
हमारे कार्य की सिद्धि
उसके लक्ष से होती नहीं है
इसलिए हमारे लिए तो एक ही ज्ञेय है।

00:33:39.520 --> 00:33:48.932
छह द्रव्य हमारा ज्ञेय नहीं हैं,
नवतत्त्व हमारे ज्ञेय भी नहीं हैं।
अरे! ज्ञेय में से निकाला (निकाल दिया)?

00:33:48.956 --> 00:33:54.954
उपादेय में से तो निकाला (वो तो) ठीक है।
उपादेय तो नहीं है।

00:33:54.978 --> 00:33:59.607
मगर जानने लायक तो है कि नहीं?
ज्ञेय तो है कि नहीं?

00:33:59.631 --> 00:34:10.696
आहाहा! कि पर्याय है,
पर्याय जानने लायक है, जाननी तो
चाहिए ना। ऐसा गुरुदेव ने बता दिया है।

00:34:10.720 --> 00:34:26.305
फिर से ज़रा एक बार (ले लेते हैं)।
उसमें कोई पुनरुक्ति दोष आता नहीं है।
आहाहा!

00:34:26.329 --> 00:34:31.816
प्रवचन रत्नाकर भाग १
(गुजराती) १४६ (हिन्दी १४९),

00:34:31.840 --> 00:34:35.318
<b>और कोई ऐसा भी कह सकता है</b>,

00:34:35.342 --> 00:34:45.336
<b> और कोई ऐसा भी कह सकता है -
'पर्याय है, उसका ज्ञान करना चाहिए न?'</b>
आहाहा!

00:34:45.360 --> 00:34:50.647
उसका ज्ञान करना चाहिए
कि ज्ञायक का ज्ञान करना चाहिए?
ये भूल गया।

00:34:50.671 --> 00:34:56.158
उसके ज्ञान में रुक गया,
पर्याय के ज्ञान में रुक गया।

00:34:56.182 --> 00:35:03.087
चौदह गुणस्थान, मार्गणास्थान,
आठ-कर्म, १४८ कर्म-प्रकृति। आहाहा!

00:35:03.111 --> 00:35:10.367
ये सत्ता में हैं, इतनी अभी उदय में हैं,
इतनी वियुच्छुती है, उदीरणा है। आहाहा!

00:35:10.391 --> 00:35:17.469
कहाँ गया तेरा लक्ष? पर में गया।
तो क्या अभ्यास नहीं करना?

00:35:17.493 --> 00:35:19.918
अरे! प्रथम <b>आत्मा को जानना</b>
(समयसार गाथा १७-१८),

00:35:19.942 --> 00:35:28.416
बाद में सब जानने की बात बनाओ;
नहीं तो ये मनुष्य-भव हार जायेगा।

00:35:28.440 --> 00:35:33.394
<b>पर्याय है, उसका ज्ञान करना चाहिए न? </b>
क्योंकि (उसका) ज्ञान नहीं करे
तो निश्चयाभास (हो जाएगा)।

00:35:33.418 --> 00:35:37.185
अनेक प्रकार का तर्क-वितर्क
करके भटककर मरता है जीव।

00:35:37.209 --> 00:35:39.447
<b>उसका ज्ञान करना चाहिए न</b>,

00:35:39.471 --> 00:35:48.834
<b>पर्याय जानना चाहिए, पर्याय जानना चाहिए,
पर्याय को विषय बनाना चाहिए</b>। आहाहा!

00:35:48.858 --> 00:35:53.900
ज्ञायक को विषय बनाना चाहिए
कि पर्याय को? वो भूल गया।

00:35:53.924 --> 00:35:58.652
<b>अन्यथा एकांत हो जायेगा। </b>आहाहा!
पर्याय को विषय नहीं बनावें,

00:35:58.676 --> 00:36:06.878
पर्याय जाने नहीं तो एकांत हो जाये
- ऐसा तर्क करता है अज्ञानी मिथ्याद्रष्टि,
मिथ्यात्व रखने के लिए।

00:36:06.902 --> 00:36:17.558
<b>पर्याय भी वस्तु है, अवस्तु नहीं है,
ऐसा शास्त्र में भी कहा है। </b>आहाहा!

00:36:17.582 --> 00:36:25.003
शास्त्र के बहाने भी
(मिथ्यात्व पुष्ट करता है)। आहाहा!

00:36:25.027 --> 00:36:31.980
<b>कार्य तो पर्याय में होता है न?</b>
इतना बोल लिया है।
कार्य तो पर्याय में होता है।

00:36:32.004 --> 00:36:38.803
हमको तो कार्य का काम है।
निष्क्रिय क्या, (वो तो) हमको
उपयोग में (ही) नहीं आता है।

00:36:38.827 --> 00:36:41.967
उपयोग तो पर्याय का आता है ना,
आनंद तो पर्याय में आता है ना?

00:36:41.991 --> 00:36:48.820
पर्याय प्रगट करनी है तो पर्याय के
सामने देखना तो चाहिए ना? आहाहा! देखो!

00:36:48.844 --> 00:36:56.456
<b>कार्य तो पर्याय में होता है न?
पर्याय के बिना कहीं कार्य होता है क्या?</b>
पर्याय बिना कार्य नहीं होता।

00:36:56.480 --> 00:37:04.256
पर्याय बिना कोई कार्य होता नहीं
<b>- ऐसा पर्याय का पक्ष करके</b>,
पर्याय का ज्ञाता नहीं है।

00:37:04.280 --> 00:37:10.496
द्रव्य के ज्ञाता बिना कोई भी जीव
पर्याय का ज्ञाता (हो),
ऐसा व्यवहार उत्पन्न हो सकता नहीं।

00:37:10.520 --> 00:37:15.389
प्रथम ज्ञायक का ज्ञाता हो,
वह सविकल्पदशा में भेद का ज्ञाता होता है।

00:37:15.413 --> 00:37:21.629
निर्विकल्पध्यान में तो अभेद का ज्ञाता
हो जाता है, पुनः। थोड़ी देर
के लिए भेद का ज्ञाता होता है।

00:37:21.653 --> 00:37:23.936
थोड़े Time (समय) के लिए सविकल्पदशा है।

00:37:23.960 --> 00:37:26.465
<b>किसी-किसी को किसी काल में</b> जाना हुआ
<b>प्रयोजनवान है </b>(समयसार गाथा १२),

00:37:26.489 --> 00:37:34.074
सभी काल में जाना हुआ प्रयोजनवान
– (ऐसा) नहीं लिखा है भेद। आहाहा!

00:37:34.098 --> 00:37:44.052
<b>ऐसा पर्याय का पक्ष करके,
पर्याय का पक्ष करके परस्पर व्यवहार के
पक्षरूप उपदेश करके</b> व्यवहार का उपदेश नहीं।

00:37:44.076 --> 00:37:50.403
<b>व्यवहार के पक्षरूप उपदेश
करके मिथ्यात्व पुष्ट करते रहा हैं।</b>

00:37:50.427 --> 00:37:58.292
अज्ञानी प्राणी जानने के बहाने से भी
आत्मा को जानना छोड़कर.... (लेकिन)
हमने आत्मा को जानना कहाँ छोड़ा है?

00:37:58.316 --> 00:38:01.229
आत्मा को जानते-जानते
पर्याय की बात करता हूँ।

00:38:01.253 --> 00:38:05.172
परंतु आत्मा को जाना तूने तो आनंद आया?

00:38:05.196 --> 00:38:11.154
(तो कहें) कि आनंद तो धीमे-धीमे,
बाद में कभी भी आएगा परंतु
पर्याय को तो पहले जान लें।

00:38:11.178 --> 00:38:15.954
पर्याय को जानते ज्ञान बढ़ता जाता है,
क्षयोपशम बढ़ जाता है। आहाहा!

00:38:15.978 --> 00:38:21.727
क्षयोपशम बढ़ता है कि अज्ञान बढ़ता है?
(मुमुक्षु: अज्ञान।)

00:38:21.751 --> 00:38:32.669
ऐसे नवतत्त्व में, नवतत्त्व का
लक्ष छोड़ दे एक दफे। नवतत्त्व हैं,
नवतत्त्व हैं मगर लक्ष छोड़ दे उसका।

00:38:32.693 --> 00:38:37.572
नवतत्त्व तेरा ज्ञेय नहीं है।
आहाहा!

00:38:37.596 --> 00:38:48.389
छह द्रव्य और नवतत्त्व
जहाँ तक ज्ञेय बनेंगे तहाँ तक
भगवान आत्मा ज्ञेय बनेगा नहीं;

00:38:48.413 --> 00:38:53.656
और जो ज्ञेय नहीं बनेगा
तो ध्येय भी बननेवाला नहीं है;

00:38:53.680 --> 00:39:01.696
जो ध्येय नहीं बनता है तो ध्यान भी प्रगट
होता नहीं है और ध्याता भी होता नहीं है।

00:39:01.720 --> 00:39:07.816
ये ज्ञेय (को) फेर दो, ज्ञेय फेर दो।
आहाहा! लक्ष फेर दो।

00:39:07.840 --> 00:39:15.336
पुण्य-पाप का लक्ष छोड़ दे,
पुण्य-पाप छोड़ने की बात नहीं है।
छोड़े कौन? आहाहा!

00:39:15.360 --> 00:39:19.096
लक्ष छोड़ दे।
लक्ष इधर (अंदर) ले ले। आहाहा!

00:39:19.120 --> 00:39:22.754
कि <b>जाननहार जानने में आता है,
(वास्तव में) पर जानने में नहीं आता</b>
(सिद्धांतों की सरवाणी बोल १)।

00:39:22.778 --> 00:39:32.687
हाय! हाय! पर जानने में नहीं आता?
स्वपरप्रकाशक हमारा ज्ञान है, उसका
क्या होगा? कि तेरा काम हो जाएगा।

00:39:32.711 --> 00:39:39.038
स्वपरप्रकाशक के तीन प्रकार - भेद हैं।
एक (प्रकार का) स्वपरप्रकाशक नहीं (है)।

00:39:39.062 --> 00:39:50.069
एक तो स्व-पर का प्रतिभास होता है, भव्य
-अभव्य की ज्ञान की पर्याय में स्वपरप्रकाश
का प्रतिभास होता है, अज्ञानी मात्र (को)।

00:39:50.093 --> 00:40:01.238
वो सम्यग्ज्ञान नहीं है, मिथ्याज्ञान है।
स्वपरप्रकाशक होने पर भी
ज्ञान मिथ्यात्व है, मिथ्याज्ञान है।

00:40:01.262 --> 00:40:08.349
अभी उसमें से ही,
स्वपरप्रकाशक प्रतिभास में (से),
उसमें से ही पर्याय का लक्ष छोड़कर

00:40:08.373 --> 00:40:15.509
जब अकेला ज्ञायक का लक्ष आत्मा करता है
तो ज्ञान की पर्याय का निश्चय प्रगट होता है।

00:40:15.533 --> 00:40:20.785
ज्ञान की पर्याय के निश्चय की ये रीति है कि
अकेला सामान्य का अवलोकन करता है

00:40:20.809 --> 00:40:29.158
और विशेष को जानना बंद कर देता है;
उसका नाम निश्चय से स्वप्रकाशकज्ञान है।

00:40:29.182 --> 00:40:35.478
उस स्वप्रकाशकज्ञान,
ऐसे लक्षण से आत्मा लक्षगत हो जाता है।

00:40:35.502 --> 00:40:40.576
तो स्वप्रकाशक हुआ उसमें अनुभव हुआ
(और) उपादेयरूप आत्मा जानने में आया।

00:40:40.600 --> 00:40:48.816
उस ही समय आनंद आया,
उस ही समय, तो अंदर का
स्वपरप्रकाशक ज्ञान प्रगट हो गया।

00:40:48.840 --> 00:40:56.914
स्वप्रकाशक जिसको प्रगट होता है,
उसको ही सम्यक् प्रकार से
स्वपरप्रकाशक प्रगट हो जाता है।

00:40:56.938 --> 00:41:05.256
वो निश्चय है, अंदर का।
ज्ञान ज्ञान को जाने (और) ज्ञान आनंद
को जाने - (ये) अंदर का स्वपरप्रकाशक।

00:41:05.280 --> 00:41:09.372
एक स्वपरप्रकाशक आया अभी एक,
अभी दूसरा।

00:41:09.396 --> 00:41:15.780
साधक, सविकल्पदशा में आता है
तो आत्मा भी जानने में आता है
और परपदार्थ का प्रतिभास (भी) होता है

00:41:15.804 --> 00:41:22.318
- ऐसी ज्ञान की पर्याय भी जानने में आती है,
तो वो स्वपरप्रकाशक-व्यवहार हो गया।

00:41:22.342 --> 00:41:28.527
स्वप्रकाशक-निश्चय,
स्वपरप्रकाशक-निश्चय
और स्वपरप्रकाशक-व्यवहार।

00:41:28.551 --> 00:41:32.532
और चोथा (बिन्दु),
जो तीसरा स्वपरप्रकाश है,
वो तो अज्ञानी मात्र (को है);

00:41:32.556 --> 00:41:36.629
निगोद में भी है,
उसमें सम्यग्ज्ञान नहीं है,
वह तो मिथ्याज्ञान है।

00:41:36.653 --> 00:41:43.398
स्वपरप्रकाशक कहने पर भी
वो ज्ञान मिथ्या है।
भेदज्ञान नहीं करता है।

00:41:43.422 --> 00:41:48.723
स्व-पर के प्रतिभास में
'स्व जानने में आता है
और पर जानने में नहीं आता है'

00:41:48.747 --> 00:41:55.625
ऐसा विधि-निषेध
निश्चय-व्यवहार का करता नहीं है,
तो उपयोग अंदर में ढलता नहीं है।

00:41:55.649 --> 00:42:01.985
<b>तो उनमें एकत्व प्रगट
करनेवाले भूतार्थनयसे</b>, आहाहा!

00:42:02.009 --> 00:42:08.754
भूतार्थनय यानि जो नय अपने त्रिकाल
सामान्य एकरूप स्वभाव को प्रसिद्ध करे,

00:42:08.778 --> 00:42:19.843
उसको बतावे, ज्ञान अपने शुद्धात्मा को
विषय करे, उस नय का नाम, परमार्थनय,
निश्चयनय, भूतार्थनय कहा जाता है।

00:42:19.867 --> 00:42:28.869
<b>भूतार्थनयसे एकत्व प्राप्त करके,</b>
अभूतार्थनय से नौ प्रगट होते हैं,
भूतार्थनय से एक प्रगट हो गया।

00:42:28.893 --> 00:42:35.567
<b>शुद्धनयरूपसे स्थापित आत्मा की अनुभूति</b>,
जो शुद्धनय का विषय है शुद्धात्मा,

00:42:35.591 --> 00:42:45.536
उसकी, ऐसे आत्मा की जो अनुभूति हुई,
स्वानुभवदशा हुई <b>जिसका</b>
नाम <b>लक्षण आत्मख्याति है</b>।

00:42:45.560 --> 00:42:54.327
आत्मा का जो अनुभव हुआ उसका नाम ही
आत्मख्याति (है); आत्मा की प्रसिद्धि हो गई।

00:42:54.351 --> 00:43:02.496
राग से आत्मा जानने में नहीं आता है,
शास्त्रज्ञान से आत्मा जानने में नहीं आता है;

00:43:02.520 --> 00:43:11.949
आत्मज्ञान से आत्मा अनुभव में आ जाता है,
तो उसका नाम आत्मख्याति।
उसकी <b>प्राप्ति होती है</b>।

00:43:11.973 --> 00:43:15.140
अनंतकाल से आत्मा का लक्ष नहीं किया (था)।

00:43:15.164 --> 00:43:26.376
अभी आज भगवान का जन्म-दिवस है
तो भेदज्ञान का विचार करके अभेद
के सन्मुख होने से, प्रयत्न करना, आहाहा!

00:43:26.400 --> 00:43:31.425
ઉતાવળ (जल्दी) भी नहीं (करना)
और प्रमाद भी नहीं (करना)। 

00:43:31.449 --> 00:43:41.132
जल्दी करने से कर्ताबुद्धि होती है और
प्रमाद करने से तो पुरुषार्थ खंड हो जाता है।

00:43:41.156 --> 00:43:48.518
जल्दी भी नहीं और प्रमाद भी नहीं।
आहाहा!

00:43:48.542 --> 00:43:53.989
<b>(शुद्धनयसे नवतत्त्वों को जाननेसे
आत्माकी अनुभूति होती है
इस हेतुसे ये नियम कहा है।)</b>

00:43:54.013 --> 00:43:58.225
शुद्धनय का विषय शुद्धात्मा है,
पर्याय नहीं है।

00:43:58.249 --> 00:44:06.092
पर्याय है मगर पर्याय का लक्ष छूटकर
त्रिकाली सामान्य अंदर में
चिदानंद आत्मा विराजमान है,

00:44:06.116 --> 00:44:13.985
नित्य-निरावरण है, उसको भावकर्म
का आवरण कभी हुआ नहीं (और)
कभी होनेवाला (भी) नहीं (है)।

00:44:14.009 --> 00:44:23.265
उसने कर्म बाँधा ही नहीं है तो छोड़ता भी
नहीं है। द्रव्य-बंध उसको हुआ ही
नहीं है, भाव-बंध भी हुआ नहीं है।

00:44:23.289 --> 00:44:30.674
वो तो भाव-बंध से, द्रव्यकर्म के
बंध से भी निराला है, अनादि-अनंत है।

00:44:30.698 --> 00:44:35.296
आत्मा के साथ कर्म का
निमित्त-नैमित्तिक संबंध नहीं है।

00:44:35.320 --> 00:44:40.029
परिणाम के साथ निमित्त-नैमित्तिक संबंध है
और परिणाम से तो आत्मा भिन्न है,

00:44:40.053 --> 00:44:48.723
इसलिए आत्मा के साथ
निमित्त-नैमित्तिक संबंध का त्रिकाल
अभाव है। आहाहा!

00:44:48.747 --> 00:44:59.727
<b>(शुद्धनयसे नवतत्त्वों को जाननेसे
आत्माकी अनुभूति होती है इस हेतुसे </b>ये,
इस कारण से ये <b>नियम कहा है।) वहाँ,</b> आहाहा!

00:44:59.751 --> 00:45:07.092
देखो! ये जो भूतार्थनय से नवतत्त्व जाना
हुआ सम्यग्दर्शन है, मूल में है मूल में।

00:45:07.116 --> 00:45:14.687
कुन्दकुन्द भगवान की गाथा में है।
भूतार्थनय से नवतत्त्व जाना
हुआ सम्यग्दर्शन (है, ऐसा) नियम है।

00:45:14.711 --> 00:45:17.163
उसका अभी टीकाकार अर्थ करते हैं।

00:45:17.187 --> 00:45:28.292
भूतार्थनय जो शब्द लगाया है, विशेषण आगे,
उसका टीकाकार अभी अर्थ खोलते हैं।
उसका ही अर्थ खोलते हैं।

00:45:28.316 --> 00:45:35.789
<b>विकारी होने योग्य</b>,
पुण्य और पाप का जो परिणाम है
विकृत-भाव है, विभाव है।

00:45:35.813 --> 00:45:41.252
<b>विकारी होने योग्य</b>,
आहाहा!

00:45:41.276 --> 00:45:51.598
आत्मा उपादानपने पुण्य-पाप को
करनेवाला (नहीं है) और आत्मा
पुण्य-पाप का निमित्त भी नहीं है।

00:45:51.622 --> 00:45:59.318
पुण्य-पाप के परिणाम आत्मा
के आश्रय से नहीं होते हैं,
इसलिए निमित्त भी नहीं है।

00:45:59.342 --> 00:46:03.812
निमित्त-कर्ता भी नहीं
और उपादान-कर्ता भी नहीं है।

00:46:03.836 --> 00:46:09.349
तो परिणाम तो उत्पन्न होता है, <b>
विकारी होने योग्य</b>। आहाहा!

00:46:09.373 --> 00:46:15.234
होने योग्य। <b>होने योग्य होता है</b>
(सिद्धांतों की सरवाणी बोल २) सब। आहाहा!

00:46:15.258 --> 00:46:23.452
कोई उसका करनेवाला, पुण्य-पाप
का करनेवाला उपादानरूप से
तो कोई इस जगत में है ही नहीं;

00:46:23.476 --> 00:46:29.007
न तो कर्म से उत्पन्न होता है राग,
न आत्मा से उत्पन्न होता है।

00:46:29.031 --> 00:46:35.789
आत्मा राग का उत्पादक नहीं है
और कर्म भी उत्पादक नहीं है।
<b>होने योग्य होता है</b>।

00:46:35.813 --> 00:46:45.558
होने योग्य, स्वयं, निसर्गज - एक शब्द है।
अध्यवसान आदि कैसे उत्पन्न होते हैं?

00:46:45.582 --> 00:46:54.754
टीकाकार फरमाते हैं कि निसर्गज
होता है और संवर-निर्जरा की
जब निर्मल पर्याय उत्पन्न होती है, निर्मल,

00:46:54.778 --> 00:47:02.767
वो <b>स्वयमुच्छलन्ति, स्वयमुच्छलन्ति</b>
(समयसार कलश १४१) आहाहा!
स्वयं प्रगट होती है।

00:47:02.791 --> 00:47:04.620
कोई उसका करनेवाला नहीं।

00:47:04.644 --> 00:47:11.820
प्रभु! अकर्ता ऐसे ज्ञायक को,
अकर्ता ऐसे ज्ञायक को लक्ष में लिया नहीं

00:47:11.844 --> 00:47:22.069
और आत्मा ज्ञाता होने पर भी
उसको कर्ता मान बैठा है, परंतु वह कर्ता
हो सकता नहीं, उसकी बुद्धि भ्रष्ट होती है।

00:47:22.093 --> 00:47:28.163
ज्ञान का अज्ञान हो गया परंतु आत्मा
अकर्तापना को छोड़कर एक
समय मात्र (भी) कर्ता होगा नहीं।

00:47:28.187 --> 00:47:36.816
तेरी बुद्धि बिगड़ेगी परंतु भगवान
आत्मा अपना अकर्ता-स्वभाव,
ज्ञाता-स्वभाव छोड़नेवाला नहीं है। आहाहा!

00:47:36.840 --> 00:47:43.327
मेहनत बहुत की, अनंतकाल गया (ऐसा
मानते कि) मैं कर्ता हूँ, कर्ता हूँ, इसका करूँ,
इसका करूँ, ऐसा करूँ, वैसा करूँ। आहाहा!

00:47:43.351 --> 00:47:49.425
आखिर में आया। बाहर का तो नहीं
परंतु (अपने) परिणाम को तो करे
ना और परिणाम को भोगवे ना?

00:47:49.449 --> 00:47:59.358
अरे! कर्ता-धर्म को जाने कि कर्ता-धर्म को करे?
भोक्ता-धर्म को जाने कि भोक्ता-धर्म को भोगे?

00:47:59.382 --> 00:48:05.132
विचार तो कर (कि) क्या है?
कर्ता-धर्म और भोक्ता-धर्म परिणाम में हैं।

00:48:05.156 --> 00:48:17.323
मगर परिणाम का कर्ता प्रभु! भगवान आत्मा
पवित्र परमात्मा को कहना कि राग का करनेवाला
आत्मा है, (इस) पवित्र परमात्मा को, आहाहा!

00:48:17.347 --> 00:48:22.043
(उसका) अनादर मत कर।
अनादर (करेगा तो) तुझे नुकसान हो जायेगा।

00:48:22.067 --> 00:48:28.238
वो करेगा तो नहीं, करेगा तो नहीं
(क्योंकि) अकर्तापना छूटता नहीं है।

00:48:28.262 --> 00:48:32.554
निजभाव को छोड़े नहीं
और परभाव में जाये नहीं।
आहाहा!

00:48:32.578 --> 00:48:37.829
अज्ञानी तो करता है कि नहीं?
अज्ञानी करता है इसका अर्थ क्या?

00:48:37.853 --> 00:48:43.229
अज्ञानी का शुद्धात्मा जो अकारक है,
अकर्ता है, वो कर्ता है?

00:48:43.253 --> 00:48:52.216
कि परिणाम परिणाम को करता है,
उपचार से आत्मा कर्ता है - ऐसा
व्यवहारनय अन्यथा कथन करता है। आहाहा!

00:48:52.240 --> 00:48:54.985
व्यवहारनय असत्यार्थ कथन करता है।

00:48:55.009 --> 00:49:03.385
कर्ता-धर्म तो पर्याय में (है),
क्रिया का कारक पर्याय में है।
क्रिया का कारक द्रव्य में नहीं है।

00:49:03.409 --> 00:49:11.620
<b>निष्क्रिय: शुद्धपारिणामिक:</b>
ऐसा कषायपाहुड़ का श्लोक है, आहाहा!

00:49:11.644 --> 00:49:16.518
जयसेनाचार्य भगवान ने
(गाथा ३२०, समयसार, तात्पर्यवृति टीका)
उसके अंदर लिखा है। आहाहा!

00:49:16.542 --> 00:49:25.016
और निष्क्रिय आत्मा वो पंचास्तिकाय में
अमृतचंद्राचार्य ने बहुत जगह पर भी
लिखा है - निष्क्रिय! आहाहा!

00:49:25.040 --> 00:49:31.856
क्रिया से रहित!
क्रिया से रहित द्रव्य
होने पर भी परिणाम क्रियावान है।

00:49:31.880 --> 00:49:40.736
एक समय भी वो पर्याय निष्क्रिय नहीं होती है;
क्रिया होती है। पर आश्रय से करे तो
राग और स्वाश्रय (से) वीतरागभाव।

00:49:40.760 --> 00:49:48.816
क्रिया बिना परिणाम नहीं है
और क्रियावाला द्रव्य होता नहीं है,
तीनों काल। अच्छा!

00:49:48.840 --> 00:50:00.580
ऐसे द्रव्य और पर्याय के
बीच में भेदज्ञान करके....
कर्ता-धर्म का प्रतिभास ज्ञान में आया।

00:50:00.604 --> 00:50:08.145
राग का करनेवाला परिणाम है,
षट्कारक से। अभी ये लिया था
(समयसार कलश टीका) १७५ श्लोक में।

00:50:08.169 --> 00:50:18.540
१७४ श्लोक में आया कि ये रागादि
परिणाम होते हैं, वो कर्मबंध का कारण हैं।
वो तो मैंने जाना (और) माना।

00:50:18.564 --> 00:50:29.127
लेकिन आप फरमाते हो कि शुद्धात्मा से
राग भिन्न है तो राग का कारण कौन है?
उपादान-कारण, निमित्त-कारण कौन है?

00:50:29.151 --> 00:50:36.203
वहाँ जवाब दे दिया कि अंतर्गर्भित
<b>पर्यायरूप परिणमनशक्ति</b>
उपादान-कारण है।

00:50:36.227 --> 00:50:39.425
दर्शनमोह और चारित्रमोह
निमित्त-कारण हैं।

00:50:39.449 --> 00:50:48.900
देखो! वहाँ निमित्त-कारण का उल्लेख किया
और उपादान-कारण अपने से होता है, वो
ही बात इसमें १३ नम्बर की गाथा में है।

00:50:48.924 --> 00:50:56.367
वो तो राजमल जी ने लिखा है। ठीक!
राजमल जी ने लिखा है तो क्या झूठा है?
आहाहा!

00:50:56.391 --> 00:51:03.705
परम सत्य है। अनुभव के अंदर
से आई वाणी, भाव सम्यक् होता है।

00:51:03.729 --> 00:51:08.598
तेरी नजर नहीं पहुँचती है
वहाँ वो अलग बात है।

00:51:08.622 --> 00:51:13.865
बाकी ज्ञानी के ज्ञान में जो
अनुभव की बात आती है,
मूल प्रयोजनभूत बात (वो सत्य है)।

00:51:13.889 --> 00:51:19.678
अप्रयोजनभूत बात में कोई
फेरफार हो तो-तो क्षम्य है।
आहाहा!

00:51:19.702 --> 00:51:22.958
प्रयोजनभूत बात में
कभी फेर होता नहीं है।

00:51:22.982 --> 00:51:32.572
अनुभव का विषय और अनुभव कैसे हो,
उसमें तीनों काल एक मत होता है,
सभी ज्ञानियों का।

00:51:32.596 --> 00:51:41.105
तो इधर <b>विकारी होने योग्य</b>,
करने से, करता है आत्मा और
होता है - ऐसा तीनकाल में है नहीं।

00:51:41.129 --> 00:51:47.647
कर्ताबुद्धिवालों को होने योग्य बैठता नहीं है
और जिसको <b>होने योग्य होता है</b>
(ऐसा बैठता है),

00:51:47.671 --> 00:51:52.869
उसकी दृष्टि अकारक ज्ञायक पर जाती है
और अनुभव होता है।

00:51:52.893 --> 00:51:57.732
अनुभवी जानता है कि पर्याय तो
<b>होने योग्य होती है</b>।

00:51:57.756 --> 00:52:03.500
ऐसा आता है ना, तू किस बात से अधीरा?
होने योग्य होता है, ऐसा आता है ना?

00:52:03.524 --> 00:52:13.336
मुमुक्षु: काहे होत अधीरा रे, 
तू सब बाते पूरा।  
पू. लालचंदभाई: हाँ हाँ, वो चाहिए मेरे को।

00:52:13.360 --> 00:52:16.576
मुमुक्षु: जो जो देखी वीतरागने 
सो सो होसी वीरा रे 
(भैया भगवतीदास जी)

00:52:16.600 --> 00:52:21.820
पू. लालचंदभाई: जो वीतरागी ने देखा है, 
उस ही प्रमाण से सब हो रहा है। आहाहा!

00:52:21.844 --> 00:52:28.909
तू किसलिए मुफ़्त में कर्ताबुद्धि कर रहा है? 
और तेरा ज्ञान का अज्ञान तू 
किसलिए कर रहा है? आहाहा!

00:52:28.933 --> 00:52:38.372
वीतराग भगवान, सर्वज्ञ भगवान ने 
(जो) देखा (है), वैसा ही होता है। 
जैसा होता है, वैसा देखा है। आहाहा!

00:52:38.396 --> 00:52:43.785
क्रमबद्धपर्याय है। 
किसी पर्याय का कर्ता आत्मा नहीं है

00:52:43.809 --> 00:52:56.554
मगर कर्ताबुद्धि छूटना, 
वो भी बहुत उसमें पुरुषार्थ चाहिए 
आत्मसन्मुखता का, तब छूटती है;

00:52:56.578 --> 00:53:01.247
केवल शास्त्र सन्मुख के पुरुषार्थ से 
कर्ताबुद्धि छूटती (नहीं है)।

00:53:01.271 --> 00:53:09.905
अरे! निर्णय भी आत्मा के सन्मुख होकर आता है 
और अनुभव भी (आत्मा के) सन्मुख से होता है।

00:53:09.929 --> 00:53:19.065
<b>विकारी होने योग्य </b>पुण्य-पाप 
<b>और विकार करनेवाला</b>, निमित्त-कर्ता 
कौन और उपादान-कर्ता कौन?

00:53:19.089 --> 00:53:26.829
परिणाम का उपादान-कर्ता परिणाम (है)। 
निमित्त-कर्ता कौन? 
कि पुराना कर्म का उदय।

00:53:26.853 --> 00:53:32.038
सारे नौ ही तत्त्वों में पुराना कर्म लिया है, 
पुराना कर्म लिया है।

00:53:32.062 --> 00:53:38.429
वो परिणाम नया कर्म-बंध का कारण है 
ऐसा नहीं लिया है।

00:53:38.453 --> 00:53:46.807
ये श्रृंखला टूट जाती है; 
जब भूतार्थनय से सम्यग्दर्शन होता है,

00:53:46.831 --> 00:53:55.198
तो जो परिणाम नये कर्म के बंध का कारण 
होता था अज्ञानी जीव का अज्ञान-मिथ्यात्व,

00:53:55.222 --> 00:54:02.683
वो चला गया, 
तो नए कर्म-बंध का 
वो निमित्त-कारण नहीं है।

00:54:02.707 --> 00:54:08.278
वो परिणाम उत्पन्न होता है पुण्य-पाप का, 
उसका निमित्त-कारण पुराना कर्म है।

00:54:08.302 --> 00:54:18.425
भगवान आत्मा कारण नहीं है। 
पर्याय का कारण पर्याय है। 
निमित्त-कारण पुराने कर्म का उदय आदि है।

00:54:18.449 --> 00:54:24.816
<b>होने योग्य और करनेवाला</b>, 
<b>विकार करनेवाला</b>,

00:54:24.840 --> 00:54:29.789
यहाँ व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध नहीं है; 
निमित्त-नैमित्तिक संबंध है।

00:54:29.813 --> 00:54:34.007
पुराने कर्म के साथ 
निमित्त-नैमित्तिक संबंध है।

00:54:34.031 --> 00:54:45.034
निमित्त-नैमित्तिक संबंध किसके साथ होता है? 
परिणाम के साथ होता है कि 
भगवान के साथ होता है? आहाहा!

00:54:45.058 --> 00:54:51.594
पवित्र परमात्मा 
पर का लक्ष ही नहीं करता है। 
ओहोहो!

00:54:51.618 --> 00:54:58.340
तो निमित्त-नैमित्तिक संबंध 
कहाँ से उसमें होता है? 
परिणाम में होता है, एक समय के लिये।

00:54:58.364 --> 00:55:06.629
तो वो बताते हैं कि 
<b>होने योग्य और विकार करनेवाला</b>, 
विकार करनेवाला यानि निमित्त-कर्ता।

00:55:06.653 --> 00:55:13.620
उपादान-कर्ता परिणाम, 
निमित्त-कर्ता पुराना कर्म का उदय आदि।

00:55:13.644 --> 00:55:17.727
वे <b>दोनों पुण्य हैं, तथा दोनों पाप हैं</b>। 
आहाहा!

00:55:17.751 --> 00:55:28.300
एक जीव का परिणाम और एक कर्म का उदय, 
एक जीव-भाव और एक द्रव्य-भाव, 
एक जीव और दूसरा अजीव।

00:55:28.324 --> 00:55:42.612
जीव यानि, जीव के परिणाम को 
उपचार से जीव कहा जाता है; वास्तव 
में वो पुण्य-तत्त्व (है), जीव-तत्त्व नहीं है।

00:55:42.636 --> 00:55:50.367
परिणमता है ना, इसलिए उसका 
परिणाम भी कहा जाता है; मगर उसकी 
जुदाई तो अंदर में वैसी की वैसी (है)।

00:55:50.391 --> 00:55:57.900
माने तो जुदा और न माने तो भी जुदा। 
आत्मा और आस्रव कभी एक होनेवाले (नहीं हैं)।

00:55:57.924 --> 00:56:06.567
जड़ और चेतन कभी एक हो जायें 
तो राग और आत्मा एक हो जायें। 
जड़ और चेतन तो एक होनेवाले (नहीं हैं)।

00:56:06.591 --> 00:56:14.314
<b>जड़ भावे जड़ परिणमे, चेतन-चेतन भाव</b>;
<b>कोई कोई पलटे नहीं, छोड़ी आप स्वभाव</b>.

00:56:14.338 --> 00:56:18.380
आहाहा! हमारे चंदूभाई वो बोलते हैं। 
बहुत अच्छा बोलते हैं!

00:56:18.404 --> 00:56:23.549
वहाँ तो बोलते हैं, 
इधर चंदूभाई हैं कि नहीं? 
बोलो न, जरा बोलो।

00:56:23.573 --> 00:56:28.745
<b>जड़ भावे जड़ परिणमे</b>, 
बहुत अच्छी बात है। 
श्रीमद्(राजचन्द्र)जी की है। तात्विक बात है।

00:56:28.769 --> 00:56:59.558
चंदूभाई:<b>जड़ भावे जड़ परिणमे, चेतन-चेतन भाव;</b>
<b>कोई कोई पलटे नहीं, छोड़ी आप स्वभाव. १ </b>

00:56:59.582 --> 00:57:24.278
<b>जड़ ते जड़ त्रण कालमां, चेतन चेतन तेम;</b>
<b>प्रगट अनुभवरूप छे, संशय तेमां केम? २ </b>

00:57:24.302 --> 00:57:59.909
<b>जो जड़ छे त्रण कालमां, चेतन चेतन होय;</b>
<b>बंध- मोक्ष तो नहि घटे, निवृत्ति प्रवृत्ति न्होय. ३ </b>
<b>जड़ भावे जड़ परिणमे, चेतन-चेतनभाव;</b>

00:57:59.933 --> 00:58:04.052
चेतन जड़रूप नहीं होता है 
और जड़ चेतनरूप (नहीं होता है)।

00:58:04.076 --> 00:58:12.456
छठवीं गाथा में 
आचार्य भगवान छठी का लेख 
लिखते-लिखते.... छठी का लेख है, अफर है।

00:58:12.480 --> 00:58:30.718
उसमें लिखा, आहाहा! देखो छठवीं गाथा। 
आत्मा रागरूप तीनकाल में होता नहीं है, 
शुभाशुभरूप होता नहीं है।

00:58:30.742 --> 00:58:33.843
(यदि) हो जाये, तो (आत्मा) जड़ हो जाये। 
आहाहा!

00:58:33.867 --> 00:58:42.065
तो जड़ का मैं कर्ता हूँ, 
आत्मा राग का कर्ता है वो अज्ञानी के 
अज्ञान के घर में से आई (हुई) बात है;

00:58:42.089 --> 00:58:44.687
सर्वज्ञ भगवान ने ऐसा कहा नहीं है।

00:58:44.711 --> 00:58:55.518
सर्वज्ञ भगवान (अगर) कर्ता कहें तो 
कहें कि ज्ञान का कर्ता है, ऐसा कहें; 
मगर राग का कर्ता (नहीं है)। आहाहा!

00:58:55.542 --> 00:59:00.576
है ही नहीं ऐसा स्वरूप।

00:59:00.600 --> 00:59:05.625
<b>आत्मा का स्वभाव ज्ञान है 
और ज्ञान का स्वभाव आत्मा को जानना है</b> 
(सिद्धांतों की सरवाणी बोल १०)।

00:59:05.649 --> 00:59:14.314
आत्मा को जब जानता है ज्ञान, 
ज्ञानरूप परिणमता है, तो ज्ञान का 
कर्ता उपचार से कहा जाता है।

00:59:14.338 --> 00:59:23.496
मगर राग का कर्ता कहा जाता नहीं है, 
वह तो अज्ञान-भाव है। 
अप्रतिबुद्ध का लक्षण है। आया है सब।

00:59:23.520 --> 00:59:31.838
आत्मा में राग होता है और राग का कर्ता है 
और दुःख का भोक्ता है (ये) अप्रतिबुद्ध 
का लक्षण है, अज्ञानी का लक्षण है।

00:59:31.862 --> 00:59:39.812
वाणी से उसका माप निकलता है 
कि पर्यायदृष्टि है।

00:59:39.836 --> 00:59:47.709
देखो! इसमें लिखा है कि जो <b>पुण्य-पाप को 
उत्पन्न करनेवाले समस्त अनेकरूप शुभाशुभभाव,</b>

00:59:47.733 --> 00:59:49.758
<b>उनके स्वभावरूप परिणमित नहीं होता</b> 
(समयसार गाथा ६)।

00:59:49.782 --> 01:00:00.780
भगवान आत्मा, शुभाशुभभाव भले पर्याय में हो, 
पर्याय में होने पर भी द्रव्य वो जड़-भाव
रूप होता नहीं है, वो तो चेतनभाव है।

01:00:00.804 --> 01:00:04.754
<b>जड़ भावे जड़ परिणमे, चेतन-चेतनभाव</b> 
(श्रीमद्जी)।

01:00:04.778 --> 01:00:18.847
ये राग जड़ है, पुद्गल के परिणाम में 
कठिनाई हो तो जड़ तो ले कि उसमें 
स्वपरप्रकाशक-शक्ति का अभाव है। आहाहा!

01:00:18.871 --> 01:00:29.229
पुद्गलकृत तेरे को नहीं बैठे तो जीवकृत नहीं है, 
कर्मकृत भी नहीं है, मगर पर्यायकृत है 
ऐसा तो बिठा दे। आहाहा!

01:00:29.253 --> 01:00:35.069
कर्मकृत नहीं बैठे तो कोई नहीं, 
जीवकृत तो नहीं है, 
मगर पर्यायकृत (है)।

01:00:35.093 --> 01:00:45.385
कार्य है तो उसका कोई करनेवाला होता है, 
उसके षट्कारक से प्रगट होती है पर्याय। 
आहाहा! ये भेदज्ञान है।

01:00:45.409 --> 01:00:50.465
शुभाशुभरूप आत्मा होता ही नहीं है, 
परिणमता नहीं है यानि होता नहीं है।

01:00:50.489 --> 01:00:54.860
<b>ज्ञायकभाव से जड़भावरूप नहीं होता</b> 
(समयसार गाथा ६)। 
आहाहा!

01:00:54.884 --> 01:01:01.078
आज तो जन्म-दिवस है, 
भगवान का जन्म-दिवस है।

01:01:01.102 --> 01:01:10.474
जिसको आत्मा में सम्यग्दर्शन का 
जन्म होता है, वो अल्पकाल में 
केवलज्ञान की प्राप्ति कर लेता है।

01:01:10.498 --> 01:01:16.920
ऐसा जन्म दिवस है आज का, उज्ज्वल। 
Time (समय) हो गया।